“या
रब, न वो समझे हैं, न समझेंगे मेरी बात। दे और दिल उनको, जो न दे मुझको ज़ुबाँ
और।।” अब या
तो इस शेर को उसकी तात्पर्य-वृत्ति के अनुकूल समझा जाए और तीखे व्यंग्य की दाद दी
जाए। या फिर यूँ हो कि ग़ालिब को इस हेकड़ी के लिए ख़ूब खरीखोटी सुनाई जाए- “अमाँ मियाँ ये ग़ालिब भी न,
बड़े ख़ब्ती क़िस्म के शायर थे। चले न जाने आँगन टेढ़ा। ख़ुद तो सीधी-सादी बात को
बेवजह घुमा-फिरा कर कहते हैं और इल्ज़ाम पाठक पर मँढ़ते हैं।” मतलब यह कि जो भी बात समझ में
न आए, वो बकवास है। अच्छा है कि ग़ालिब हमारे ज़माने में न हुए, वरना अपना सिर पीट
लेते। वैसे ग़ालिब के ज़माने में आज जैसे क़द्रदान भी न हुए, वरना वो ‘दीवान’ क्या खाकर लिखते! ख़ैर, ग़ालिब का ये शेर हमेशा
मेरी ज़ुबान पर कुछ इस अंदाज़ में होता है, जैसे बाँध तोड़ने पर उतारू कोई उफनती
हुई नदी। मुश्किल ये कि बार-बार दुहराऊँ तो ‘ख़ब्ती’ कहे जाने का डर है। और ज़ुबाँ
पर काबू रखूँ तो बेचारा दिल रुआँसा हुआ जाता है। दिमाग़ है कि ढाढ़स बँधाने की
बजाय दिल को कोंचने में ज़्यादा मज़ा पाता है। कभी-कभी खीझ इतनी ज़्यादा बढ़ जाती
है कि सिर के बाल नोंचने लगता हूँ। कई बार तो तन्हाई में ख़ुद को तमाचा भी जड़
चुका हूँ। लेकिन कोई फ़ायदा नहीं!
दिल-दिमाग भारतीय लोकतंत्र के दो दलों की तरह बर्ताव करने से परहेज़ बरतने को तैयार
ही नहीं होते! दिल
और दिमाग की नूरा-कुश्ती थमती ही नहीं!
समझौते की तमाम कोशिशें नाकाम। समझ में नहीं आता, क्या करूँ? कई बार सोचा कि दिल-दिमाग के
झमेले में जिस्म को ही तकलीफ़ क्यों हो?
लेकिन जिस्म ‘ऑथोरिटी’ नहीं
है। ये ‘पॉवर’ तो दिमाग के ही पास है। दिल
उसी ‘पॉवर’ में हिस्सेदारी चाहता है।
इसलिए बात-बेबात हस्तक्षेप करता रहता है। वैसे दिल की बात भी वाजिब है। जिस भाषा
को लोग समझते ही नहीं, उस भाषा में कुछ कहने की ज़रूरत क्या है? लेकिन दिमाग़ है कि ज़िद ठाने
बैठा है! कहता
है- “अभिव्यक्ति
के अनुकूल भाषा तो होनी ही चाहिए। जो लोग अभिधा-व्यंजना में फ़र्क़ नहीं कर सकते,
उनके लिए हलकान होने की ज़रूरत नहीं है।”
मंगलवार, 21 जुलाई 2015
शनिवार, 11 जुलाई 2015
मालिकों का बोझ ढोता मीडिया
दो विवाद और चार मीडिया समूह। पहला विवाद ‘इंडियाज़ डॉटर’ डॉक्यूमेंट्री से जुड़ा है तो दूसरे का रिश्ता ‘वक़्त ने किया क्या हसीं सितम’ धारावाहिक से है। प्रत्यक्ष रूप से जो प्रदर्शित
किया गया, वह यह था कि विवाद का सम्बंध ‘इंडियाज़
डॉटर’ और ‘वक़्त ने किया क्या हसीं सितम’ के कंटेंट से है। दोनों ही मामलों में ‘राष्ट्र की छवि’ और ‘राष्ट्रवाद’ की आड़ लेकर प्रतिस्पर्धी मीडिया समूहों ने
अपने-अपने क्षुद्र हितों का पोषण करने की नापाक़ कोशिश की। नतीज़ा क्या निकला? हम-आप से छुपा नहीं है। टाइम्स और एनडीटीवी समूह
के बीच व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा की चरम परिणति केन्द्र सरकार के उस बचकाना फैसले
में हुई, जिसकी वैश्विक स्तर पर आलोचना हुई। जिन्हें डॉक्यूमेंट्री में दिलचस्पी
नहीं भी हो सकती थी, वैसे लोगों ने भी प्रतिबंध के कारण उत्सुकता के अतिरेक में
देख लिया और एनडीटीवी ने तो डॉक्यूमेंट्री के लिए निश्चित प्रसारण समय पर अपना
स्क्रीन भी ब्लैक रखा। टाइम्स नाउ पर अर्णब गोस्वामी ने दावा किया कि ‘इंडियाज़ डॉटर’ वास्तव में भारत की छवि धूमिल करने वाला वृत्तचित्र
है, जबकि देश के बहुसंख्यक बुद्धिजीवी तबके की सोच इसके विपरीत थी। जनसत्ता के
संपादक ओम थानवी की प्रतिक्रिया थी कि “जिस
किसी ने बीबीसी की डॉक्युमेंट्री 'इंडियाज़
डॉटर' देख ली है, उसने बड़ी सहजता से इस बलात्कार-विरोधी फिल्म को
भारत में प्रतिबंधित करवाने वाली मानसिकता और अभिव्यक्ति का गला घोंटकर दुनिया भर
में भारत की नाक कटवाने वाली बुद्धि पर तरस ही खाया होगा।” बहरहाल यह एपिसोड अब लगभग ख़त्म हो चुका है और
अगर मैं ग़लत नहीं हूँ तो हममें से ज़्यादातर लोग इसको भूल भी चुके हैं!
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ (Atom)
Featured Post
'साक्षी है इतिहास' तथा अन्य चार कविताएँ
1. साक्षी है इतिहास ( मार्टिन नीमोलर को समर्पित) जानता हूँ आप जहमत नहीं उठाएँगे अपनी सलीब पर टँगे रहने का लुत्फ बेग़...
-
लोकतंत्र है। अर्थतंत्र है। भेंड़तंत्र है। भीड़तंत्र है। लूटतंत्र है। सर्वत्र फैला ढोंगतंत्र है। यंत्रवाद है। बौद्धिक साम्राज्यवाद है। सिय...
-
उमस और ऊब का माहौल मन को कोंचते... ख़्वाहिस को बढ़ाते... बिल्कुल प्यास की तरह । जबकि नल की ट...
-
बाढ़ का पानी अब उतार पर था। जलमग्न धरती कहीं-कहीं अपना कूबड़ दिखाने लगी थी। छोटी-छोटी मछलियों की छलमलाहट बढ़ गई थी। वही जल-धारा, जो कल...

