दो विवाद और चार मीडिया समूह। पहला विवाद ‘इंडियाज़ डॉटर’ डॉक्यूमेंट्री से जुड़ा है तो दूसरे का रिश्ता ‘वक़्त ने किया क्या हसीं सितम’ धारावाहिक से है। प्रत्यक्ष रूप से जो प्रदर्शित
किया गया, वह यह था कि विवाद का सम्बंध ‘इंडियाज़
डॉटर’ और ‘वक़्त ने किया क्या हसीं सितम’ के कंटेंट से है। दोनों ही मामलों में ‘राष्ट्र की छवि’ और ‘राष्ट्रवाद’ की आड़ लेकर प्रतिस्पर्धी मीडिया समूहों ने
अपने-अपने क्षुद्र हितों का पोषण करने की नापाक़ कोशिश की। नतीज़ा क्या निकला? हम-आप से छुपा नहीं है। टाइम्स और एनडीटीवी समूह
के बीच व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा की चरम परिणति केन्द्र सरकार के उस बचकाना फैसले
में हुई, जिसकी वैश्विक स्तर पर आलोचना हुई। जिन्हें डॉक्यूमेंट्री में दिलचस्पी
नहीं भी हो सकती थी, वैसे लोगों ने भी प्रतिबंध के कारण उत्सुकता के अतिरेक में
देख लिया और एनडीटीवी ने तो डॉक्यूमेंट्री के लिए निश्चित प्रसारण समय पर अपना
स्क्रीन भी ब्लैक रखा। टाइम्स नाउ पर अर्णब गोस्वामी ने दावा किया कि ‘इंडियाज़ डॉटर’ वास्तव में भारत की छवि धूमिल करने वाला वृत्तचित्र
है, जबकि देश के बहुसंख्यक बुद्धिजीवी तबके की सोच इसके विपरीत थी। जनसत्ता के
संपादक ओम थानवी की प्रतिक्रिया थी कि “जिस
किसी ने बीबीसी की डॉक्युमेंट्री 'इंडियाज़
डॉटर' देख ली है, उसने बड़ी सहजता से इस बलात्कार-विरोधी फिल्म को
भारत में प्रतिबंधित करवाने वाली मानसिकता और अभिव्यक्ति का गला घोंटकर दुनिया भर
में भारत की नाक कटवाने वाली बुद्धि पर तरस ही खाया होगा।” बहरहाल यह एपिसोड अब लगभग ख़त्म हो चुका है और
अगर मैं ग़लत नहीं हूँ तो हममें से ज़्यादातर लोग इसको भूल भी चुके हैं!
दूसरा विवाद अपेक्षाकृत ताज़ा है। ज़ी-समूह का एक चैनल है- ‘ज़िन्दगी’। ‘ज़िन्दगी’ पर पाकिस्तानी धारावाहिकों का प्रसारण होता है और इस चैनल ने अल्पसमय में ही अपने क्वालिटी कंटेंट के कारण दर्शकों में ख़ूब लोकप्रियता हासिल की है। इसी चैनल पर भारत विभाजन की पृष्ठभूमि से जुड़े धारावाहिक ‘वक़्त ने किया क्या हसीं सितम’ का प्रसारण हो रहा है। ‘फोकस न्यूज़’ को अचानक ही यह धारावाहिक राष्ट्रविरोधी लगा और उसने पैनल डिस्कशन शुरू कर दिया। ‘फोकस न्यूज़’ की एंकर बार-बार बहस को राष्ट्रहित, राष्ट्रवाद और भारतीय लोगों की आहत भावना की दिशा में ले जाने की कोशिश कर रही थी। मामला तूल पकड़ सके, नेताओं के कुछ कड़े-कड़वे बयान आ सकें और ज़ी-समूह को कठघरे में खड़ा कर उसकी लानत-मलामत की जा सके, ऐसी कोशिशें उनकी तरफ से होती रहीं। लेकिन दुर्भाग्य (फोकस न्यूज़ का) यह रहा कि एंकर की लाख कोशिशों के बावजूद मामला अभिव्यक्ति की आज़ादी, साहित्य और रचनात्मक स्वायत्तता के इर्द-गिर्द ही सिमटी रही और फोकस न्यूज़ अपने मालिक का हित पोषित करने में लगभग असफल रहा। लगभग इसलिए, क्योंकि इस मामले में केन्द्र सरकार ने कोई तत्परता नहीं दिखाई और न ही धारावाहिक के प्रसारण पर रोक लगने जैसी स्थिति ही आ पाई। फोकस न्यूज़ का इरादा था कि भारतीयों के मन में जो पाकिस्तान विरोधी भावना है, उसका इस्तेमाल ज़ी-समूह के ख़िलाफ़ एक सशक्त हथियार के रूप में करके वह उसको व्यावसायिक झटका दे, लेकिन ऐसा हो नहीं सका। हाँ, इस मसले पर कुछ अन्य चैनलों, अख़बारों और वेबसाइट्स पर छिटपुट आलेख और ख़बरें ज़रूर छपीं। बीबीसी ने तो बजाब्ता धारावाहिक के निर्देशक हिसाम हुसैन और चैनल की बिजनेस हेड प्रियंका दत्ता का पक्ष भी प्रस्तुत किया।
दूसरा विवाद अपेक्षाकृत ताज़ा है। ज़ी-समूह का एक चैनल है- ‘ज़िन्दगी’। ‘ज़िन्दगी’ पर पाकिस्तानी धारावाहिकों का प्रसारण होता है और इस चैनल ने अल्पसमय में ही अपने क्वालिटी कंटेंट के कारण दर्शकों में ख़ूब लोकप्रियता हासिल की है। इसी चैनल पर भारत विभाजन की पृष्ठभूमि से जुड़े धारावाहिक ‘वक़्त ने किया क्या हसीं सितम’ का प्रसारण हो रहा है। ‘फोकस न्यूज़’ को अचानक ही यह धारावाहिक राष्ट्रविरोधी लगा और उसने पैनल डिस्कशन शुरू कर दिया। ‘फोकस न्यूज़’ की एंकर बार-बार बहस को राष्ट्रहित, राष्ट्रवाद और भारतीय लोगों की आहत भावना की दिशा में ले जाने की कोशिश कर रही थी। मामला तूल पकड़ सके, नेताओं के कुछ कड़े-कड़वे बयान आ सकें और ज़ी-समूह को कठघरे में खड़ा कर उसकी लानत-मलामत की जा सके, ऐसी कोशिशें उनकी तरफ से होती रहीं। लेकिन दुर्भाग्य (फोकस न्यूज़ का) यह रहा कि एंकर की लाख कोशिशों के बावजूद मामला अभिव्यक्ति की आज़ादी, साहित्य और रचनात्मक स्वायत्तता के इर्द-गिर्द ही सिमटी रही और फोकस न्यूज़ अपने मालिक का हित पोषित करने में लगभग असफल रहा। लगभग इसलिए, क्योंकि इस मामले में केन्द्र सरकार ने कोई तत्परता नहीं दिखाई और न ही धारावाहिक के प्रसारण पर रोक लगने जैसी स्थिति ही आ पाई। फोकस न्यूज़ का इरादा था कि भारतीयों के मन में जो पाकिस्तान विरोधी भावना है, उसका इस्तेमाल ज़ी-समूह के ख़िलाफ़ एक सशक्त हथियार के रूप में करके वह उसको व्यावसायिक झटका दे, लेकिन ऐसा हो नहीं सका। हाँ, इस मसले पर कुछ अन्य चैनलों, अख़बारों और वेबसाइट्स पर छिटपुट आलेख और ख़बरें ज़रूर छपीं। बीबीसी ने तो बजाब्ता धारावाहिक के निर्देशक हिसाम हुसैन और चैनल की बिजनेस हेड प्रियंका दत्ता का पक्ष भी प्रस्तुत किया।
दोनों विवादों का हश्र बहुत हद तक ‘खोदा पहाड़ निकली चुहिया’ जैसा हुआ। होना भी चाहिए था क्योंकि दोनों ही
मामले विशुद्ध व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा और ‘बदले की भावना’ से उत्प्रेरित और संचालित थे। अब प्रश्न यह उठता
है कि आख़िर फोकस न्यूज़ की ज़ी-समूह से और ज़ी-समूह की फोकस न्यूज़ से क्या
दुश्मनी है? क्योंकि दोनों ही
एक-दूसरे को नीचा दिखाने या ग़लत साबित करने या फिर व्यावसायिक हितों को प्रभावित
करने का कोई भी मौका नहीं चूकते। पूर्व की कई घटनाएँ इसका प्रमाण हैं। यहाँ पर
उनकी चर्चा अनावश्यक है। किन्तु हाँ, फोकस न्यूज़ के पुनर्जन्म और ज़ी-न्यूज़ के
प्रति शत्रुता का कारण दर्ज करना ज़रूरी है।
नवीन जिंदल ने अक्टूबर 2012 में ज़ी-न्यूज़ पर
ब्लैकमेलिंग का आरोप लगाया था। पहली बार पासा उल्टा पड़ा था और स्टिंग करने वाला
मीडिया ख़ुद ही स्टिंग का शिकार हो गया था। ज़ी-न्यूज़ के संपादक सुधीर चौधरी को
जेल की हवा भी खानी पड़ी थी। जंग का प्रस्थान बिन्दु यही था। इसके बाद ज़ी-न्यूज़
ने नवीन जिंदल और उनकी कम्पनियों के खिलाफ मुहिम छेड़ दी और अंततः ‘लोहा लोहे को काटता है’ की तर्ज पर नवीन जिंदल ने भी अपनी मीडिया कम्पनी
खड़ी कर ली और तभी से ये ‘साँप-सीढ़ी
का खेल’ चल रहा है। वैसे कहा जाता है
कि जेसिका लाल हत्याकांड के बाद अपने बेटे मनु शर्मा के ख़िलाफ़ ‘मीडिया ट्रायल’ से खिन्न होकर ही विनोद शर्मा ने ‘इंडिया न्यूज़’ शुरू किया था। यहाँ भी औक़ात दिखाने की मंशा ही
प्रमुख थी। यह भी जगजाहिर है कि देश के शक्तिशाली उद्योगपतियों में शुमार मुकेश
अंबानी द्वारा विभिन्न मीडिया समूहों के शेयरों की खरीद और टीवी 18 तथा ईनाडु समूह
हस्तगत करने के पीछे भी व्यावसायिक हित ही महत्वपूर्ण कारक थे। और यह भी इत्तेफाक
नहीं था कि अंबानी द्वारा हस्तगत किए जाते ही आईबीएन से राजदीप सरदेसाई और करण
थापर जैसे चेहरों की छुट्टी हो गई। कारण भी ढंका-छुपा नहीं है। इन दोनों ने आईबीएन
के मुकेश की मिल्कियत बनने से पहले इंटरव्यू के दौरान गुजरात के तत्कालीन
मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी से कई असहज सवाल पूछे थे।
किस्साकोताह यह कि एक-दो चैनल ही ऐसे हैं (हालांकि
अब वहाँ भी निष्पक्षता की गुंजाईश कम ही बची है), जिनके अस्तित्व का प्राथमिक कारण
समाचार-सम्प्रेषण है। अब राजनीतिक पक्षधरता, प्रॉपगंडा और कॉर्पोरेट हित ही मीडिया
समूहों के वास्तविक ध्येय बन चुके हैं। ऐसे में ख़बरों की सत्यता एवं औचित्य तथा सामाजिक
दायित्व के निर्वहन का प्रश्न ही कहाँ उठता है! कुलदीप नैयर ने अपनी जीवनी ‘एक ज़िन्दगी काफी नहीं’ में बिल्कुल सही लिखा है कि “वास्तविक खतरा कॉरपोरेट जगत की तरफ से है, जो अब यह तय करने की कोशिश कर रहा है कि कौन कॉलम
लिखेगा और क्या लिखेगा।” सोचने की बात है कि जब
कॉरपोरेट ही ‘कौन और क्या लिखे’ तय करेगा तो फिर संपादकीय विवेक की उपयोगिता क्या
रह जाती है? समाचारों की विश्वसनीयता
कैसे अक्षुण्ण रह सकेगी? मीडिया एथिक्स का
झुनझुना कौन और क्यों बजाएगा? एक
कहावत है- 'ज्यों-ज्यों मुर्गी बढ़ती है,
त्यों-त्यों दुम सुकड़ाती है'। मुख्यधारा की मीडिया पर यह बिल्कुल सटीक बैठती है।
कॉरपोरेटीकरण की प्रक्रिया में मीडिया का दायरा बढ़ने की बजाय लगातार संकुचित ही
होता गया है। दलील दी गई थी कि जब मीडिया में बड़ी मछलियाँ आएँगी तो पत्रकारिता का
क्षेत्र-विस्तार होगा। प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और संसाधन के अभाव में जो बहुत सी
ख़बरें छूट जाती थीं या छोड़नी पड़ती थीं, उनको भी कवरेज मिल पाएगा। लेकिन हुआ
क्या? बिल्कुल उल्टा। ग्रामीण क्षेत्र तो पहले ही
उपेक्षित था, अब शहरों में भी वर्ग-विशेष पर ही मीडिया का फोकस है। राज्यसभा टीवी
के लिए अमृता राय के साथ बातचीत में पी साईंनाथ ने बिल्कुल सही कहा कि “मुख्यधारा की मीडिया में काम करने की जगह तेज़ी से
सिकुड़ रही है। आज टीवी में रेवेन्यु मोड आ चुका है। आजकल फ़ोर्थ एस्टेट और रीयल
एस्टेट में कोई फ़र्क नहीं रह गया है। इनके बीच की रेखा आज अख़बारों से ग़ायब हो
चुकी है। टीवी चैलनों पर 12 घंटे की पैनल बहस तो चलती है लेकिन फ़ील्ड रिपोर्टिंग
खत्म हो चुकी है।”
स्पष्ट
है कि जब फोर्थ एस्टेट का रीयल एस्टेट में रूपांतरण होगा तो उद्देश्य भी प्रभावित
होंगे। लागत और मुनाफे का अनुपात भी प्रभावित होगा। फील्ड रिपोर्टिंग के लिए अधिक
संवाददाता और संसाधन की आवश्यकता होगी;
अर्थात लागत बढ़ेगी। जबकि कॉरपोरेट कल्चर जिसको कहते हैं, वह न्यूनतम लागत पर अधिकतम
मुनाफे की परिपाटी द्वारा पोषित है। पिछले कुछ वर्षों में सचमुच फील्ड रिपोर्टिंग
लगभग खत्म हो चुकी है और उसकी जगह या तो प्रॉपगंडा या फिर अर्थहीन मुद्दों पर पैनल
डिस्कशन का चलन तेज़ी से बढ़ा है। पैनल डिस्कशन में भी विमर्श को किसी अर्थपूर्ण
निष्कर्ष तक पहुँचाने की बजाय उसे चिल्ल-पों या नोंक-झोंक की दिशा में ले जाने की
युक्ति काम में लाई जाती है। ‘वक्त ने किया क्या हसीं सितम’
को लेकर फोकस टीवी पर जो बहस हो रही थी, उसमें भी एंकर की पूरी कोशिश यही थी। मूल
बात यह कि जब निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए न्यूज़ चैनल खोले जाएँगे, जब बदले
की भावना से प्रेरित होकर न्यूज़ चैनल खोले जाएंगे, जब मीडिया के मुँह पर लगाम के
लिए पूँजी का निवेश किया जाएगा, जब व्यावसायिक प्रतिस्पर्धी को नीचा दिखाने या
उसकी छवि धूमिल करने के उद्देश्य से तथ्य तोड़े-मरोड़े, पकड़े या छोड़े जाएँगे तो
ऐसे में इनसे जनहित से जुड़ी ख़बरों के प्रसारण की उम्मीद रखना बेमानी ही है।
9वें
दशक में मीडिया पर कटाक्ष करते हुए मीडिया विश्लेषक कहा करते थे कि ‘विज्ञापन
की पीठ पर खबर लिखी जा रही है।’ अब हालात बदल चुके हैं। विज्ञापन को तो
आना ही है क्योंकि मीडिया हाउस के संचालक खुद ही कई कई कम्पनियों के मालिक हैं। टीआरपी
की मूल्यवत्ता भी अब अधिक मायने नहीं रखती क्योंकि ‘अब
मालिक के इशारे पर ख़बर दिखाई जाती है।’ मालिक कौन?
कॉरपोरेट्स। कॉरपोरेट्स का सीधा सम्बंध सत्ता और सियासी तंत्र से है इसलिए
विज्ञापन तो आना ही है। कोई रेगुलेटरी ऑथोरिटी नहीं है जो इनकी बेइमानियों पर
अंकुश लगा सके। तमाम तरह की भ्रामक, पक्षपातपूर्ण और अनुपयोगी खबरों के प्रसारण के
बावजूद किसी भी न्यूज़ चैनल का बाल तक बांका नहीं होता, आख़िर क्यों?
शायद आपको सन 2007 का फर्जी स्टिंग कांड याद हो!
यह अपने आप में अनूठी घटना थी। दिल्ली की एक स्कूल टीचर उमा खुराना का ‘लाइव
इंडिया’ ने फर्जी स्टिंग प्रसारित किया था। जाँच के बाद सूचना और
प्रसारण मंत्रालय ने पहली बार किसी न्यूज़ चैनल के ख़िलाफ़ कार्रवाई करते हुए उस
पर एक महीने का प्रतिबंध लगाया था। क्या सूचना और प्रसारण मंत्रालय का यह बैन
स्वयं उसके अपने विवेक का परिणाम था? उत्तर है- नहीं। दिल्ली हाई कोर्ट के
कड़े रुख़ के कारण मंत्रालय को ऐसा करने पर मजबूर होना पड़ा था। तब लाइव इंडिया के
सीईओ और संपादक पद पर सुधीर चौधरी ही विराजमान थे। ये वही सुधीर चौधरी हैं जो बाद
में ज़ी-न्यूज़ के संपादक बने और जिन पर साल 2012 में कोयला घोटाले से जुड़ी ख़बर को
दबाने के बदले में उद्योगपति नवीन जिंदल से सौ करोड़ रूपये की माँग का आरोप लगा। इस
मामले में सुधीर चौधरी तो गिरफ्तार किए गए, लेकिन ज़ी-न्यूज़ के ख़िलाफ कोई
कार्रवाई नहीं हुई। बस हुआ यह कि बीईए ने ज़ी-न्यूज़ के संपादक की प्राथमिक सदस्यता
समाप्त कर दी। लेकिन इससे ज़ी-न्यूज़ या उसके संपादक की सेहत पर क्या कोई फ़र्क़
पड़ा? जवाब है- नहीं। वैसे यह तथ्य भी कम दिलचस्प नहीं है कि लाइव
इंडिया फर्जी स्टिंग कांड को अंजाम देने वाले रिपोर्टर प्रकाश सिंह को घटना के कुछ
ही दिनों बाद नवीन जिंदल ने अपना मीडिया सलाहकार बना लिया था।
बताने
की ज़रूरत नहीं कि मीडिया की वर्तमान दशा और दिशा क्या है?
मीडिया अपनी परम्परागत परिभाषा के खांचे से कब की बाहर निकल चुकी है। मीडिया का
मुख्य काम अब ख़बर दिखाना है ही नहीं। या तो वह प्रॉपगंडा सेटिंग में व्यस्त है या
फिर अपने प्रतिस्पर्धी की टाँग खींचने में। पेड न्यूज़ पर हाय-तौबा वाला दौर भी
काफी पीछे छूट चुका है। हालात यहाँ तक आ पहुँचे कि आम चुनाव के दौरान एक बड़े
मीडिया समूह का मालिक अपनी कोर्ट पर पार्टी विशेष का चुनाव चिन्ह टांक कर नई पीढ़ी
को सफलता के मंत्र दे रहा था। मीडिया हाउसों में निष्पक्षता बरतने की बात तो दूर
अब निष्पक्ष दिखने की लालसा भी शेष नहीं रही। ऐसे में सामाजिक उत्तरदायित्व के
निर्वहन की उम्मीद बहुत दूर की कौड़ी ही है। अंजनी कुमार की एक कविता की कुछ
पंक्तियाँ याद आती है-
यह जानते हुए भी कि खबरें बनाई गई हैं
शब्द में, चित्र
में, कोड में ढलने से पहले
तराशी गई हैं बाजार के लिए
पाठक की आंख में घुसने से पहले
घुसपैठिये होंगे विज्ञापन
और फिर भीतर घुसता हुआ उनका तर्क
फिर भी मैं सारी खबरों से गुजर जाना चाहता हूं,
मेरे पैसे का भुगतान सिर्फ इतना भर नहीं है कि
खबरें चुभती हुई गुजर जाएं आंख से,
मैं वसूल करना चाहता हूं वह हिकारत
जो अब भी फैली हुई है खबर के हर हर्फ़ पर
मैं उतनी ही हिकारत से पढ़ना चाहता हूं खबर
और उतनी ही शिद्दत से चूमना चाहता हूं शब्द
जो तुम्हारा प्रोडक्ट बनने में कुचल दिए गए हैं।

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