हमारे एक मित्र हैं। पेशे से चिकित्सक
हैं। एक दिन बातचीत हो रही थी। बातचीत के दौरान उन्होंने शिकायत की। उनकी शिकायत
थी कि पत्रकार बेलगाम हो रहे हैं। मैंने उनका वाक्य सुधारा, 'पत्रकार
नहीं मीडिया बेलगाम हो रहा है।' मित्र ने दलील दी, 'दोनों
एक ही बात है। मीडिया अपने-आप में कोई ऐक्टिंग अथॉरिटी नहीं है।'
मैंने विरोध किया, 'यह कोई तर्क नहीं है।' उसने उदाहरण पेश करते हुए कहा, 'मान
लो कार से कोई दुर्घटना होती है तो इसका मतलब यह तो नहीं कि कार को दोषी ठहराया
जाए! बल्कि किसी से भी पूछो तो वह यही कहेगा कि ड्राइवर की बदमाशी
या लापरवाही के कारण हादसा हुआ। यानी दुर्घटना की स्थिति में कार नहीं ड्राइवर
दोषी होता है। इस लिहाज़ से अगर मीडिया बेलगाम है तो साफ है कि मीडियाकर्मी बेलगाम
हैं।' मैंने कहा, ‘इसका मतलब आप की निगाह में मीडियाकर्मी
ही मीडिया का निर्देशक है?’ मित्र ने मुस्कराते हुए कहा, 'बिल्कुल।' मैंने थोड़ा तुनकने वाले अंदाज़ में
कहा, 'जी नहीं। मीडिया कोई कार नहीं है, और न ही कोई मीडियाकर्मी ही
ड्राइवर है। यह आपकी निजी सोच है।' मित्र मानने को तैयार नहीं हुए।
उन्होंने आरोप लगाया, 'तुम मीडिया में काम कर चुके हो इसलिए अपनी बिरादरी की असलियत
छुपाने की कोशिश कर रहे हो।' मुझे बुरा लगा। मैंने विरोध जताया, 'ऐसा
बिल्कुल भी नहीं है। मैं मीडियाकर्मी रहा हूँ इसलिए जानता हूँ कि मीडिया और
मीडियाकर्मी दोनों पर्यायवाची नहीं हैं। दोनों में बहुत फ़र्क़ है।'
मित्र ने निर्णयात्मक स्वर में कहा, 'क्या तुम इस बात से भी इनकार करोगे कि
मीडियाकर्मी ही मीडिया रूपी भवन के निर्माण के लिए ईंटें तैयार करते हैं?'
मैंने दृढ़ता का प्रदर्शन किया, 'हाँ, बिल्कुल करूँगा क्योंकि मैं जानता
हूँ कि मीडियाकर्मी मीडिया रूपी भवन के लिए ईंटों का निर्माण नहीं करते बल्कि वे
स्वयं ईंट के रूप में इस्तेमाल किए जाते हैं।' मित्र ने ज़ोरदार ठहाका लगाया, 'अच्छा
मज़ाक है।'
मैंने टोका, 'यह मज़ाक नहीं हक़ीक़त है। मीडियाकर्मी
टूल ही है।' मित्र उत्तेजित हो उठे, 'मतलब मीडिया के नाम पर जो अंधेरगर्दी
मची है, उसमें मीडियाकर्मी का कोई योगदान नहीं है?' मैंने सफाई पेश की, 'ऐसा
मैंने कब कहा? मैं तो यह कह रहा हूँ कि मीडियाकर्मी बेलगाम नहीं हैं। बल्कि
उनकी लगाम तो मालिकों ने इस बुरी तरह से कस रखी है कि बेचारों के जबड़े तक नहीं
हिलते और होंठों से हमेशा ताड़न का रक्त रिसता रहता है। और वे सबकुछ यंत्रवत करते
जाते हैं जो उनसे कहा जाता है।' इस बार मैंने मित्र को बीच में टोकने
का कोई मौक़ा नहीं दिया और जुनूनी अंदाज़ में कहता ही गया, 'और
हाँ, ये जो मीडिया की आलीशान इमारतें आपको नज़र आती हैं उसमें जो ईंटें हैं वे
ज़्यादातर यही मीडियाकर्मी हैं। इन्हें ठीक उन्हीं जगहों पर फिट होना है, जहाँ फिट
होने की उनसे उम्मीद की जाती है या निर्देश दिया जाता है। निर्देश का पालन मजबूरी
है। ज़िन्दा रहने के लिए रोटी ज़रूरी है। अगर उन्होंने मालिक की मर्ज़ी की जगह
ख़ुद को फिट नहीं किया तो ठीक उसी तरह क़तार से बाहर फेंक दिए जाएँगे जैसे झामा या
ज़्यादा पकने के कारण ऐंचे-ताने हो गए ईंटों के साथ होता है।'
मित्र मीडियाकर्मियों के प्रति पूर्वाग्रह से बुरी तरह ग्रस्त थे और उन्हें मेरी
बात सच से कोसों दूर नज़र आ रही थी। वे यह मानने के लिए तैयार ही नहीं थे कि
अधिकांश मीडियाकर्मी अपनी प्रज्ञा से नहीं बल्कि मालिक की आज्ञा से संचालित होते
हैं और जो मीडियाकर्मी प्रज्ञा से काम लेने की कोशिश करता है उसे बहुत कष्ट उठाना
पड़ता है। उसको या तो नौकरी से हाथ धोना पड़ता है या फिर ऐसी परिस्थितियाँ पैदा कर
दी जाती हैं कि वह ख़ुद ही नौकरी से तौबा कर लेता है। उसको ऐसे दायित्व सौंप दिए
जाते हैं जो उसकी योग्यता और अनुभव के अनुरूप नहीं होते। मैंने कई उदाहरण भी दिए
और बताया कि फलां-फलां मीडियाकर्मी ने प्रापगैन्डा सेटिंग और निष्पक्षता जैसे
मुद्दों को उठाया तो उन्हें संस्थान से निकाल दिया गया। लेकिन मित्र संतुष्ट नहीं
हुए, 'तो इससे तो साफ़ जाहिर होता है कि ज़्यादातर मीडियाकर्मी
बेईमान हैं।' मैंने विरोध किया, 'बेईमान नहीं मजबूर हैं।'
मित्र ने तंज़ कसा, 'ओ-होहो! क्या मजबूरी है! भई वाह! मीडियाकर्मियों का बड़ा तबका मजबूर है!
फिर तो तुम्हारे इन मजबूर मीडियाकर्मियों से ज्यादा बेहतर फैक्ट्रियों में काम
करने वाले मजदूर हैं जो कम-से-कम अपने हित के लिए आवाज़ बुलंद करने का हौसला तो रखते
हैं।' मैंने धीमी आवाज़ में कहा, 'हाँ, सचमुच। वे मीडियाकर्मियों से
ज्यादा बेहतर स्थिति में हैं। उनके पास संगठन है। लड़ने की हिम्मत है।'
मित्र ने टोका, ‘किसी भी मीडिया संस्थान में काम करने वाले मीडियाकर्मियों का
समूह भी तो अप्रत्यक्ष रूप से एक संगठन ही है। और जो सभी मीडियाकर्मी एक साथ अपने हक़
के लिए खड़े हो जाएँ तो मीडिया मालिकों की क्या मजाल जो आँख भी दिखा सकें।’
मैंने ऐतराज़ जताया, 'तुम मीडिया में नहीं हो ना इसलिए ऐसी बातें कर रहे हो। जो
मीडिया में होते तो पता चलता।' मित्र तुनक उठे, 'तो
ये जनता की आवाज़ बनने का ढोंग क्यों करते हो? ख़ुद को न्याय का पैरोकार क्यों कहते
हो? और वैसे भी जब तुम अपने हक़ के लिए नहीं लड़ सकते तो फिर
देश-दुनिया का ठेका क्यों ले रखा है?' मैं महसूस कर रहा था कि मैं कमज़ोर पड़
रहा हूँ लेकिन मुझे यह भी लग रहा था कि मेरा मित्र दरअसल वही बातें कह रहा है जो
मीडिया के नाम पर लोक में भ्रांति-रूप में प्रचलित हैं। मैं चाहता तो उसे मीडिया
के इतिहास से कुछ और उदाहरण देकर यह सिद्ध करने की कोशिश कर सकता था कि ‘मीडिया
शुरू से ही जन-पक्षधर होने का दावा करती रही है, लेकिन केवल सिद्धांत रूप में,
व्यवहार रूप में नहीं।’ मैं उनको 'बंगाल गजट'
और 'इंडिया गजट' के भेद समझा सकता था। बता सकता था कि
जेम्स ऑगस्टस हिक्की को इस्ट इंडिया कम्पनी ने जबरन इंग्लैंड वापस क्यों भेज दिया
था। लेकिन ऐसा करना बेमानी लगा। मैं जानता था कि वह भी उन्हीं लोगों की जमात में
से है जो स्वतंत्रता-पूर्व की पत्रकारिता को आदर्श के रूप में देखने का आदि है।
स्वतंत्रता आंदोलन का रोमान ही ऐसा है कि वह सोच को इस दिशा में बढ़ने ही नहीं
देता कि उस दौर में भी मीडिया प्रापगैंडा द्वारा ही संचालित था। हाँ, फ़र्क़ बस यह
था कि वह प्रापगैंडा जनता की आकांक्षा का पोषण करता था जबकि आजकल जिस प्रकार का
प्रापगैंडा होता है वह या तो राजनीतिक अथवा आर्थिक हित की पुष्टि का निमित्त बनता
है। जनता चूँकि राजनीति और अर्थनीति में कहीं है ही नहीं, इसलिए आक्रोश स्वाभाविक
है। मैंने अंतिम कोशिश की, ‘आप स्क्रीन और अख़बार के पन्नों के आधार
पर मीडियाकर्मी की हक़ीक़त नहीं समझ सकते। अगर सच्चाई जाननी है तो आपको मीडिया
संस्थानों के अंदर झांकना होगा।’ उन्होंने व्यंग्य किया, ‘तो
क्या अब मीडियाकर्मियों की टुच्चई को जानने-समझने के लिए मैं अपना पेशा छोड़
मीडियाकर्मी बन जाऊँ?’ मैंने ऐतराज़ जताया, ‘ऐसा मैंने कब कहा?
मैं तो बस यह चाहता हूँ कि आप मीडियाकर्मियों के प्रति अपना पूर्वाग्रह छोड़ें और
उनकी स्थिति और नियति को समझने की कोशिश मानवीय स्तर पर करें।’
मित्र ने हस्तक्षेप किया, ‘ठीक है मैं ऐसा करने के लिए तैयार हूँ। तुम समझाने की कोशिश
करो।’ मित्र का अंदाज़ बिल्कुल चुनौती देने वाला था, फिर भी मैंने
राहत की साँस ली क्योंकि अब वह मीडिया के ‘टॉक शोज’ वाली शैली छोड़, कम-से-कम सुनने-समझने
को तैयार तो था! मैंने कहा कि देखो ‘मीडियाकर्मियों की दो जमात है। एक जमात
जो मालिकों के हस्तक्षेप को यथार्थ मानकर समर्पण कर चुकी है अर्थात स्वामी जो
कहेगा वही करेंगे। जबकि दूसरी जमात को अब भी विश्वास है कि समस्या का हल समर्पण
नहीं है। इस स्थिति से उबरने के लिए संघर्ष ज़रूरी है। हाँ, ये अलग बात है कि
दूसरी जमात की हालत बिल्कुल खस्ता है। वे या तो मीडिया की मुख्यधारा से बाहर हैं
या फिर हाशिये पर।’ मित्र के चेहरे पर जो भाव आ-जा रहे थे, उससे जाहिर था कि उसे
मेरी बातें हवा-हवाई लग रही थीं लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी। मैंने अपनी बात
जारी रखी, ‘मीडियाकर्मियों को लेकर जो ग़लत छवि बन रही है उसके लिए
जिम्मेदार पहली जमात वाले लोग ही हैं। उनके लिए मीडियाकर्मी होना सामाज के प्रति
जवाबदेह होना नहीं बल्कि अपने संस्थान और मालिकान के प्रति जवाबदेह होना है। उनको
इस बात से फ़र्क़ बिल्कुल भी नहीं पड़ता कि वे ख़बर को जिस नज़रिए से लिख या दिखा
रहे हैं, वह ग़लत है या सही। बल्कि सच कहूँ तो वे ख़ुद को मीडियाकर्मी मानते ही
नहीं।’ ऐसा कहते वक़्त मुझे अचानक याद आया कि नियुक्ति के लिए
इंटरव्यू लेते समय अब अभ्यर्थी के विचार और समझ की परख भी कहाँ की जाती है!
बल्कि भाषा-ज्ञान भी अब वैसी अहमियत नहीं रखता। अब तो यदि आप अख़बार में नौकरी के
लिए जाते हैं तो लिखित-मौखिक परीक्षा से पहले यह देखा जाता है कि बंदा पेज बना
सकता है या नहीं। ठीक इसी तरह यदि आप टीवी न्यूज़ के अभ्यर्थी हैं तो आपकी पहली
अहर्त्ता टंकन क्षमता ही है। मीडिया को विचारवान कर्मी की आवश्यकता नहीं है। बल्कि
किसी ख़बर को लेकर अगर आपने ज़्यादा ज़िच की तो सीधा फरमान, ‘भई
तुम अपने काम से काम रखो। ज़्यादा दिमाग लगाने की ज़रूरत नहीं है।’
‘क्या हुआ? तुम अचानक चुप क्यों हो गए?’
मेरे चिकित्सक मित्र ने टोका तो मेरी तन्द्रा टूटी। मैं अचकचाया, ‘नहीं-नहीं
कुछ नहीं।’ मित्र हँसे, ‘बिल्कुल सही कह रहे हो। तुम्हारे पास
बचाव का कोई तर्क है ही नहीं।’ मित्र की बात बुरी तो लगी लेकिन कुछ
कहा नहीं। कहता भी क्या, ग़लती मेरी ही थी। जो बात मैं मन-ही-मन सोच रहा था, वह
सीधे मुँह कह भी तो सकता था! ख़ैर, मैंने इस उकसावे की कार्रवाई को
नज़रअंदाज़ करते हुए संवाद का सिरा पकड़ा, ‘दूसरी जमात के मीडियाकर्मी उम्मीद जगाते
हैं। लेकिन जिन झंझावातों और ख़तरों से वे जूझते हैं, वे किसी दुःस्वप्न से कम
नहीं होते। वैसे यह बात सिर्फ मीडियाकर्मियों पर ही लागू नहीं होती, बल्कि हर उस
इंसान पर लागू होती है जो नीति और न्याय की अवधारणा को यथार्थ बनाने की कोशिश करता
है, क्योंकि व्यवस्था की एकमात्र शर्त है, अनुकूलित हो जाओ। अनुकूलित होने का अर्थ
है, व्यवस्था (जो कि अपने वास्तविक चरित्र में जनविरोधी है) के टूल बन जाओ। बन गए
तो रोटी, कपड़ा और मकान की समस्या आसानी से हल हो जाएगी और बहुत हद तक आप निरापद
जीवन भी जी सकते हैं। लेकिन यदि आपने ऐसा करने से इनकार कर दिया तो फिर आपकी
ज़िन्दगी भी ख़तरे में पड़ सकती है।’ ऐसा कहते समय मेरे मानसपटल पर कई दृश्य
उभरे। पहला दृश्य उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर के पत्रकार जगेन्द्र सिंह का था, वह
बुरी तरह से झुलसा हुआ कह रहा था, ‘गिरफ्तार करना था तो गिरफ्तार कर लेते।
मुझे मारा क्यों। आग क्यों लगा दी?’ मुझे याद आया कि उसने अपने क़ातिलों का
नाम भी लिया था। उसके क़ातिल कोई पेशेवर अपराधी नहीं बल्कि पेशेवर पुलिसकर्मी थे।
उसने यह भी बताया कि सबकुछ एक मंत्री के इशारे पर हुआ था। ऐन इसी वक़्त मुझे
प्रियदर्शन का कथन याद आया, ‘उसने किसी के घोटाले को सीधे घोटाला
लिखा, उसने बलात्कार को सीधे बलात्कार लिखा,
उसने नाम लेकर आरोप लगाए। यह बहुत हिम्मत का काम है। यह हिम्मत हमारे समय में कोई
नहीं दिखाता। उसने दिखाई और उसे उसकी हैसियत बता दी गई। उसे धमकी दी गई,
उसे जला दिया गया।’ उसे जला दिया गया क्योंकि वह साधारण पत्रकार था। तो क्या कोई
पत्रकार असाधारण भी होता है? पत्रकार साधारण-असाधारण नहीं होता।
साधारण या असाधारण परिस्थितियाँ और माध्यम होते हैं। जगेन्द्र अनुकूलित नहीं हुआ
मारा गया। मध्य प्रदेश के बेलाघाट का संदीप कोठारी भी मारा गया। संदीप की पुलिस ने
नहीं खनन माफियाओं ने हत्या की और जला भी दिया। उसका भी यही अपराध था कि वह साधारण
पत्रकार होकर भी असाधारण काम कर रहा था, इसलिए जला दिया गया। मुम्बई में मीरा रोड
पर वाइट हाउस बीयर बार में चलने वाले ग़ैरक़ानूनी क्रिया-व्यापारों की रिपोर्टिंग
का परिणाम राघवेन्द्र को भी तो अपनी जान गवांकर चुकानी पड़ी। उसे भी मार डाला गया।
ये सब साधारण पत्रकार थे इसलिए इनकी हत्या कर दी गई। ये अगर हिम्मत नहीं दिखाते तो
ज़िन्दा रहते!
प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के मुताबिक
पिछले ढाई वर्षों में कुल सत्तर पत्रकारों की हत्या कर दी गई। ये वैसी ईंटें थीं
जो मुख्यधारा की मीडिया-दीवार में ढंग से फिट नहीं हो सकी थीं। ये वैसी ईंटें थीं
जो सिस्टम के खांचे में फिट नहीं हो सकी थीं। ये वैसी ईंटें थीं जो जन-विरोधी
ताक़तों की राह में रोड़े की तरह आ पड़ी थीं। ये वैसे पत्रकार थे जो इस अवधारणा को
यथार्थ मान बैठे थे कि मीडियाकर्म हिम्मत का काम है। अक्षय सिंह भी हिम्मती था। यह
अलग बात है कि वह साधारण पत्रकार नहीं था। वह तो आजतक जैसे बड़े मीडिया संस्थान का
स्टार रिपोर्टर था। फिर वह क्यों मारा गया? ओह! हाँ, वह मारा नहीं गया बल्कि उसकी तो
संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। यक़ीन न हो तो पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट देख
लीजिए। अक्षय सिंह उस वक्त मरा जब वह व्यापम घोटाले पर रिपोर्ट तैयार करने
मध्यप्रदेश के झाबुआ गया हुआ था। यानी जो साधारण पत्रकार होते हैं उनकी हत्या होती
है और जो असाधारण पत्रकार होते हैं वे ख़ुद ही मर जाते हैं। ‘तो
फिर ये जो ज़िन्दा बचे पत्रकार हैं, वे किस श्रेणी में आते हैं?’
पता नहीं कैसे यह प्रश्न एक शोर की तरह मेरे मुँह से निकला और मेरे चिकित्सक मित्र
बिल्कुल अवाक् से मेरी तरफ़ देखने लगे। उनको निश्चित ही यह शक हुआ है कि हो-न-हो
मैं अपना मानसिक संतुलन गवाँ चुका हूँ क्योंकि प्रश्न का उत्तर देना मेरा दायित्व
तय किया गया था और मैं हूँ कि उल्टे प्रश्न उछाल रहा हूँ!
उन्होंने कहा कि तुम अभी घर जाओ। मैं कल आऊँगा, फिर इस विषय पर बात करेंगे। मैंने
फीकी हँसी के साथ पूछा, ‘क्या आपको अब भी लगता है कि मीडियाकर्मी बेलगाम हैं?’
मेरे चिकित्सक मित्र ने कोई जवाब नहीं दिया। वे उठे और विपरीत दिशा में चल पड़े।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें