उपन्यास
का नाम है- ‘चिरकुट’ और इत्तेफ़ाक़ देखिए कि
शीर्षक को छोड़, उपन्यास में कहीं और ये शब्द इस्तेमाल नहीं किया गया। लिहाजा मन
में उठा यह सवाल वाजिब था कि आख़िर क्यों हितेन्द्र पटेल ने अपने उपन्यास का नाम ‘चिरकुट’ रखा? क्या इसलिए कि वो जिस
सांस्कृतिक समाज का अंग रहे हैं, उसमें यह शब्द आमफ़हम है? या कि कथा-नायक अथवा कथा में
विन्यस्त घटनाएँ, प्रवृत्तियाँ और जीवन-दशाएँ ऐसी हैं, जो अपनी समग्रता में ‘चिरकुट’ शब्द के अर्थ एवं अभिप्राय को
भाव-गम्य बनाती हैं? जब
ये सवाल मेरे मन को मथने लगा तो हमने शब्दकोश की मदद ली। पता चला कि ‘चिरकुट’ शब्द दरअसल दो शब्दों के बड़े
टुकड़ों का योग है। अर्थात चिरना+कुटना=चिरकुट(यहाँ ‘ना’ नियत है)। शाब्दिक अर्थों में
फटा-पुराना कपड़ा, चिथड़ा, कपड़े का छोटा सा टुकड़ा। लेकिन मन संतुष्ट नहीं हुआ
क्योंकि साहित्य महज शब्द और उसके रूढ़ अर्थों से निर्देशित नहीं होता, बल्कि इसका
नियंता, ‘भाव’ होता है। ‘चिरकुट’ शब्द से जो भाव ध्वनित होता
है, वह उसके शब्दकोशीय अर्थ से साम्य नहीं रखता। ऐसे में ‘चिरकुट’ शब्द का वास्तविक अर्थ जानने
के लिए ‘लोक’ में जाना होगा और वहाँ से ‘चिरकुट’ शब्द का वाजिब अर्थ ग्रहण करना
होगा। गाँव-मोहल्ले में वैसा व्यक्ति ‘चिरकुट’ कहलाता है, जो छोटी-छोटी
बेवकूफ़ियाँ, चालाकियाँ, होशियारियाँ या साजिशें करता है और ऐसे कृत्यों से उसका
कोई ख़ास भला तो होता नहीं, उल्टे वह लोगों की नज़र में आ जाता है। या फिर वैसा
व्यक्ति ‘चिरकुट’ कहलाता है, जो समाज में
गरिष्ठ और निम्न अथवा हेय समझे जाने वाले क्रिया-व्यापारों में लिप्त रहता है।
कभी-कभार हम व्यक्ति से इतर किसी काम को भी ‘चिरकुट’ शब्द से अभिहित करते हैं।
मसलन- ‘अरे
यार! एक
चिरकुट से काम के लिए तुम इतने परेशान क्यों हो? ये तो बस यूँ चुटकी बजाते ही हो जाएगा।’ ख़ैर, इस माथापच्ची के बाद ‘चिरकुट’ को लेकर मेरी सामान्य
जिज्ञासा तो संतुष्ट हो गई है, लेकिन अब भी मेरी कथित बौद्धिक-दृष्टि इस बात को
लेकर पशोपेश में है और ज़िद ठाने बैठी है कि उपन्यासकार ने यहाँ ‘चिरकुट’ शब्द का इस्तेमाल महज इसलिए
नहीं किया है कि इसका अर्थ लोग सहज ही लगा लेंगे, बल्कि वह इसके माध्यम से कुछ और
ही कहना चाहता है। तो क्या ‘चिरकुट’ शब्द का निहितार्थ जीवन-जगत
से जुड़ी वैसी छोटी-छोटी घटनाएँ और व्यवहार-विचार सरणियाँ हैं, जिनके बग़ैर जीवन
संभव नहीं है, फिर भी उनका लेखा रखने की ज़रूरत इतिहास महसूस नहीं करता? मेरे संशय को तब और बल मिलता
है, जब रामचन्द्र शुक्ल लिखते हैं कि ‘संसार
में मनुष्य-जीवन संबंधी बहुत सी ऐसी-ऐसी बातें नित्य होती रहती हैं, जिनका इतिहास
लेखा नहीं रख सकता, पर जो बड़े महत्व की होती हैं। व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन,
इन्हीं छोटी-छोटी घटनाओं का जोड़ है। पर बड़े से बड़े इतिहास और बड़े से बड़े
जीवन-चरित्र में भी इन घटनाओं का समावेश नहीं हो सकता।’(रामचन्द्र शुक्ल,
चिन्तामणि-3, प्र.सं. 1983, पृ.सं.102) अपने इसी निबंध(उपन्यास) में वो फिर लिखते
हैं कि ‘मानव
जीवन के अनेक रूपों का परिचय कराना उपन्यास का काम है। यह उन सूक्ष्म से सूक्ष्म घटनाओं
को प्रत्यक्ष करने का यत्न करता है, जिनसे मनुष्य का जीवन बनता है और जो इतिहास
आदि की पहुँच के बाहर हैं।’(वही,
पृ.सं.102) यहीं पर यह राज़ भी फ़ाश होता है कि आख़िर हितेन्द्र पटेल जैसा
इतिहासकार अपनी अभिव्यक्ति के लिए साहित्य की सबसे महत्वपूर्ण विधा ‘उपन्यास’ को क्यों चुनता है? और यही मेरे उस सवाल का भी
जवाब है कि आख़िर उपन्यास का शीर्षक ‘चिरकुट’ क्यों रखा गया?
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