उपन्यास
का नाम है- ‘चिरकुट’ और इत्तेफ़ाक़ देखिए कि
शीर्षक को छोड़, उपन्यास में कहीं और ये शब्द इस्तेमाल नहीं किया गया। लिहाजा मन
में उठा यह सवाल वाजिब था कि आख़िर क्यों हितेन्द्र पटेल ने अपने उपन्यास का नाम ‘चिरकुट’ रखा? क्या इसलिए कि वो जिस
सांस्कृतिक समाज का अंग रहे हैं, उसमें यह शब्द आमफ़हम है? या कि कथा-नायक अथवा कथा में
विन्यस्त घटनाएँ, प्रवृत्तियाँ और जीवन-दशाएँ ऐसी हैं, जो अपनी समग्रता में ‘चिरकुट’ शब्द के अर्थ एवं अभिप्राय को
भाव-गम्य बनाती हैं? जब
ये सवाल मेरे मन को मथने लगा तो हमने शब्दकोश की मदद ली। पता चला कि ‘चिरकुट’ शब्द दरअसल दो शब्दों के बड़े
टुकड़ों का योग है। अर्थात चिरना+कुटना=चिरकुट(यहाँ ‘ना’ नियत है)। शाब्दिक अर्थों में
फटा-पुराना कपड़ा, चिथड़ा, कपड़े का छोटा सा टुकड़ा। लेकिन मन संतुष्ट नहीं हुआ
क्योंकि साहित्य महज शब्द और उसके रूढ़ अर्थों से निर्देशित नहीं होता, बल्कि इसका
नियंता, ‘भाव’ होता है। ‘चिरकुट’ शब्द से जो भाव ध्वनित होता
है, वह उसके शब्दकोशीय अर्थ से साम्य नहीं रखता। ऐसे में ‘चिरकुट’ शब्द का वास्तविक अर्थ जानने
के लिए ‘लोक’ में जाना होगा और वहाँ से ‘चिरकुट’ शब्द का वाजिब अर्थ ग्रहण करना
होगा। गाँव-मोहल्ले में वैसा व्यक्ति ‘चिरकुट’ कहलाता है, जो छोटी-छोटी
बेवकूफ़ियाँ, चालाकियाँ, होशियारियाँ या साजिशें करता है और ऐसे कृत्यों से उसका
कोई ख़ास भला तो होता नहीं, उल्टे वह लोगों की नज़र में आ जाता है। या फिर वैसा
व्यक्ति ‘चिरकुट’ कहलाता है, जो समाज में
गरिष्ठ और निम्न अथवा हेय समझे जाने वाले क्रिया-व्यापारों में लिप्त रहता है।
कभी-कभार हम व्यक्ति से इतर किसी काम को भी ‘चिरकुट’ शब्द से अभिहित करते हैं।
मसलन- ‘अरे
यार! एक
चिरकुट से काम के लिए तुम इतने परेशान क्यों हो? ये तो बस यूँ चुटकी बजाते ही हो जाएगा।’ ख़ैर, इस माथापच्ची के बाद ‘चिरकुट’ को लेकर मेरी सामान्य
जिज्ञासा तो संतुष्ट हो गई है, लेकिन अब भी मेरी कथित बौद्धिक-दृष्टि इस बात को
लेकर पशोपेश में है और ज़िद ठाने बैठी है कि उपन्यासकार ने यहाँ ‘चिरकुट’ शब्द का इस्तेमाल महज इसलिए
नहीं किया है कि इसका अर्थ लोग सहज ही लगा लेंगे, बल्कि वह इसके माध्यम से कुछ और
ही कहना चाहता है। तो क्या ‘चिरकुट’ शब्द का निहितार्थ जीवन-जगत
से जुड़ी वैसी छोटी-छोटी घटनाएँ और व्यवहार-विचार सरणियाँ हैं, जिनके बग़ैर जीवन
संभव नहीं है, फिर भी उनका लेखा रखने की ज़रूरत इतिहास महसूस नहीं करता? मेरे संशय को तब और बल मिलता
है, जब रामचन्द्र शुक्ल लिखते हैं कि ‘संसार
में मनुष्य-जीवन संबंधी बहुत सी ऐसी-ऐसी बातें नित्य होती रहती हैं, जिनका इतिहास
लेखा नहीं रख सकता, पर जो बड़े महत्व की होती हैं। व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन,
इन्हीं छोटी-छोटी घटनाओं का जोड़ है। पर बड़े से बड़े इतिहास और बड़े से बड़े
जीवन-चरित्र में भी इन घटनाओं का समावेश नहीं हो सकता।’(रामचन्द्र शुक्ल,
चिन्तामणि-3, प्र.सं. 1983, पृ.सं.102) अपने इसी निबंध(उपन्यास) में वो फिर लिखते
हैं कि ‘मानव
जीवन के अनेक रूपों का परिचय कराना उपन्यास का काम है। यह उन सूक्ष्म से सूक्ष्म घटनाओं
को प्रत्यक्ष करने का यत्न करता है, जिनसे मनुष्य का जीवन बनता है और जो इतिहास
आदि की पहुँच के बाहर हैं।’(वही,
पृ.सं.102) यहीं पर यह राज़ भी फ़ाश होता है कि आख़िर हितेन्द्र पटेल जैसा
इतिहासकार अपनी अभिव्यक्ति के लिए साहित्य की सबसे महत्वपूर्ण विधा ‘उपन्यास’ को क्यों चुनता है? और यही मेरे उस सवाल का भी
जवाब है कि आख़िर उपन्यास का शीर्षक ‘चिरकुट’ क्यों रखा गया?
अगर हमारे पाठक अन्यथा न लें
तो हम एक बार फिर रामचन्द्र शुक्ल के हवाले से यह कहना चाहेंगे कि ‘उच्च श्रेणी के उपन्यासों में
वर्णित छोटी-छोटी घटनाओं पर यदि विचार किया जाए तो जान पड़ेगा कि वे यथार्थ में
सृष्टि के असंख्य और अपरिमित व्यापारों से छाँटे हुए नमूने हैं।’(वही, पृ.सं.102) अब बताने की
ज़रूरत नहीं कि यहाँ ‘चिरकुट’ शब्द ऋणात्मक अर्थों में
प्रयुक्त नहीं है। उपन्यासकार ने ‘चिरकुट’ शब्द का इस्तेमाल ठीक वैसे ही
किया है, जैसे कि रामचन्द्र शुक्ल ने ‘नमूने’ का इस्तेमाल किया है। यानी
दोनों ही सकारात्मक अर्थ में प्रयुक्त हैं और दोनों का एक ही निहितार्थ है-
जीवन-जगत की वैसी घटनाओं का चयन, जो इतिहास के लिए तो त्याज्य और तुच्छ हैं, लेकिन
जीवन-जगत के अंतर्संबंधों और क्रिया-व्यापारों को समझने के लिए बेहद अहम। ऐसे में
आलोच्य उपन्यास को पढ़ते वक़्त जितने क़िस्म की शंकाएँ सिर उठाती हैं, उन सभी का
स्वतः ही समाहार हो जाता है, मसलन- कथा-विन्यास का बिखराव, कथा-सूत्रों में
तारतम्य का अभाव, वैचारिक प्रच्छन्नता, स्त्री-पुरुष संबंध, राजनीतिक-सामाजिक
विमर्श का संकेतन मात्र आदि। वैसे भी उपन्यासकार का काम इतिहास लिखना नहीं होता।
उसका काम घटनाओं का सिलसिलेवार ब्यौरा प्रस्तुत करना भी नहीं होता। वह तो सामाजिक-सांस्कृतिक
जीवन की प्रवृत्तियों में से वैसे नमूनों अथवा चिरकुटों का चयन करता है, जिसके
आलोक में कोई सहृदय पाठक उस युग की त्वरा को महसूस कर सके। इतिहास और साहित्य के
बीच का फांक भी यहीं पर स्पष्ट होता है- इतिहास जहाँ बहुश्रुत और चर्चित घटनाओं और
कालखंडों पर अपनी दृष्टि केन्द्रित रखता है, वहीं उपन्यास उन घटनाओं एवं कालखंडों
पर, जो कि सामान्यतः ‘सामान्य’ की श्रेणी में रख-कर उपेक्षित
कर दिए जाते हैं।
निस्संदेह
‘चिरकुट’ हमारी ज़िन्दगी के चुनिंदा ‘शेड्स’ का दस्तावेज़ीकरण है। जैसा कि
हम जानते हैं जीवन सरल-रेखीय नहीं होता। उसकी वक्रताओं के बीच हम फंसे रहते हैं और
किसी तरह खींच-खांच कर उसको सीधा करने की कोशिशों में आजीवन जुटे रहते हैं। बाक़ी
तमाम चीज़ें इसी संघर्ष की ‘बाइ-प्रोडक्ट’ हैं। जटिलताओं का अंदाज़ा इस
बात से भी लगाया जाता है कि अक्सर हम ख़ुद को ऐसी प्रतिकूल परस्थितियों से घिरा
पाते हैं, जिसको हम ठीक-ठीक अनुभूत तो कर रहे होते हैं, लेकिन उसको अभिव्यक्त कर
पाने में स्वंय को अक्षम पाते हैं। यह अक्षमता दरअसल तब आती है, जब हम अपने भूत (इतिहास)
से बिल्कुल कट जाते हैं। एक नये सांस्कृतिक समाज का अंग बन जाने के बाद भी अपनी
विरासत से अलगाव की त्रासद पीड़ा से संबंध नहीं तोड़ पाते। अपनी विरासत से
संबंध-विच्छेद संभव है भी नहीं। यानी हम जो हैं, वो होना नहीं चाहते और जो होना
चाहते हैं, वो हो नहीं सकते। ऐसे में अभिव्यक्ति में वक्रता सहज-संभाव्य है। यही
वजह है कि कथा-नायक दिलीप शहर छोड़ने से पहले ‘कथा’ लिखना चाहता है, लेकिन इसके
लिए उसके पास न तो उचित ‘फॉर्म’ है और न ही उचित ‘भाषा’। ऐसे में वह लाइब्रेरी में
ग्रंथों पर पड़ी धूल उड़ाता नज़र आता है। ‘मैं
एक कथा लिखना चाहता हूँ। मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि कैसे लिखूँ। प्रॉपर फॉर्म
की तलाश में मैं किताबें पढ़ता रहा हूँ। अब भी मुझे ठीक से समझ में नहीं आ रहा है
कि मुझे कैसे लिखना चाहिए?’(चिरकुट,
भूमिका, पृ.सं.9) यह
कथा का कंट्रास्ट है। ‘भाषा
की खोज’ तो
समाज में होनी थी, क्योंकि भाषा का उत्स समाज ही है। ‘फॉर्म’ की तलाश जीवन में होनी थी,
क्योंकि तमाम क्रिया-व्यापारों का सबसे विश्वसनीय प्रत्यक्षदर्शी एवं भुक्तभोगी तो
जीवन ही है। लेकिन कथा-नायक लाइब्रेरी में भटक रहा है। वैसे यही कंट्रास्ट एक ऐसे अवसर
को जन्म देता है, जो अभिव्यक्ति को यथार्थ में तब्दील करता है। उसकी कथा-वाचक से मुलाकात
होती है और दिलीप की ‘कथा’ पुस्तक रूप में हम तक पहुँचती
है। ये सच है कि अपनी जड़ से उखड़े व्यक्ति को अक्सर यह लगता है कि उसके पास
अभिव्यक्ति का जो साधन था, वह कहीं खो गया है, कि वह अब उसके पास नहीं है। लेकिन
इस तथ्य का कथा-नायक के इस कथन से कोई साम्य नहीं है कि ‘हमारी भाषा खो गई है...। हमारा
जीवन बस देह और मन का ही जीवन रह गया है, असली
चेतना को कहीं भीतर रौंदा जा रहा है...। जिसे हम भाषा समझते हैं और जिसे हमने
ईश्वर का स्थानापन्न बनाने की कोशिश की, उसमें
चेतना को व्यक्त करना असंभव है...। हमें लौटना होगा उस भाषा के पास, जहाँ हमारी ‘जीवात्मा’ अभिव्यक्ति पा सके। हम भटक रहे
हैं और समझ रहे हैं कि हम कहीं पहुँच चुके हैं या पहुँच रहे हैं...।’ (चिरकुट, भूमिका, पृ.सं.12) कथा-नायक का यह अनुभव प्रसूत
कथन वस्तुतः भूमंडलीकरण की आगोश में उदारीकरण की शह पर पनपी उस बाज़ारवादी
संस्कृति के साइड इफेक्ट्स की तरफ संकेत करता है, जिसने प्रेम, त्याग, गोपन-अगोपन,
सामाजिकता, संस्कृति, राजनीति, विश्वास और सफलता, सभी का अर्थ परिवर्तित कर दिया
है। वर्तमान वस्तुस्थितियों को समझने के लिए पुराने शब्दकोश और भाव-मंजूषा से काम
नहीं चल सकता। इसके लिए अभिव्यक्ति के नये ढब का विकास ज़रूरी है। संदेह नहीं कि
बाज़ार ने हमारे अंतर्जगत के कपाट बंद कर दिए हैं और अब बाह्य-जगत के ग्लैमर ने,
चकाचौंध ने हमसे हमारा ‘आप’ छीन लिया है। शरीर केन्द्रित
बाज़ार में ‘जीवात्मा’ का गूँगापन अप्रत्याशित
बिल्कुल भी नहीं है। हाँ, अतीत को लौटा लाना भी संभव नहीं है क्योंकि समय-चक्र कोई
‘स्टैटिक सिस्टम’ नहीं है। उत्तर-आधुनिक युग
में जीवन भी शेयर-सूचकांक की तरह अस्थिर है, ऐसे में ‘कथा’ में तारतम्यता की तलाश बेमानी
है। बेमानी तो अतीत को लौटा लाने की नादान ख़्वाहिश भी है जो दिलीप के मन में
कुंडली मारे बैठी है। ‘दिलीप
जब बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में छात्र था, उसे एक किताब मिली, जिसमें कुछ
दिलचस्प जीवन-चरित्रों का उल्लेख था। एक ऐसे बाबा के बारे में पढ़कर उसे यह सूझा
कि क्यों न इस देश के उन बाबाओं के बारे में जाना जाए जो आध्यात्मिकता की ओर न
जाकर सामाजिकता पर बल देते थे। उसके पास ऐसे अनेक उदाहरण थे, जिनके आधार पर उसने
पाया कि इस देश में ऐसे सामाजिक साधुओं की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही है। साधु
बोलते ही दुनिया से कटे, आध्यात्मिकता में लीन एक व्यक्ति की कल्पना कर ली जाती
है। यह गलत है।’
(चिरकुट, गुरू प्रसंग, पृ.सं.16-17) दिलीप की सोच से इत्तेफ़ाक रखने के बावजूद
मेरी नज़रों में वर्तमान परिवेश ज्यादा अहम है। जिस दौर में सामाजिक साधु हुआ करते
थे, वो दौर आज़ादी के पहले और उसके तुरंत बाद का दौर है, जब देश समाजवादी दृष्टि
के अनुकूल अपनी संरचना-निर्मित करने में लगा था। तब बाज़ार और पूँजी का दबाव नहीं
था। आज सामाजिक साधु या तो आतंकवादी या फिर नक्सली करार दिया जा सकता है। उस पर देशद्रोह
का आरोप लगाया जा सकता है क्योंकि विश्व की लोकतांत्रिक व्यवस्था अब ‘लोक-कल्याण’ की भावना से अभिप्रेरित नहीं,
बल्कि पूँजीवादी शक्तियों द्वारा निर्देशित-संचालित है। ऐसे में शोषण पर आधारित
व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष अपरिहार्य रूप से राष्ट्र-विरोधी कृत्य ही माना जाएगा।
लिहाजा ‘गुरू-प्रसंग’ यदि पाठक को काल्पनिक लगता है
तो स्वभाविक ही है। लेकिन थोड़ी सावधानी बरतें तो स्पष्ट होगा कि यह यह लेखकीय
युक्ति है जिसके माध्यम से वह न केवल बिहार के किसान-आंदोलन का पूरा इतिहास प्रस्तुत
करता है, बल्कि आधुनिक समाज के सामने जो दायित्व है, उसकी तरफ़ ध्यानाकर्षण में भी
सफल होता है। ‘1940
के बाद जब किसान-आंदोलनों का प्रभाव कम हुआ और किसान-सभा के भीतर नेतृत्व को लेकर
भयंकर फूट पड़ गई, यह तरुण गायब हो गया था। स्वामीजी के देहांत के बाद अचानक उनके
शव को प्रणाम करने वह उपस्थित हुआ और उसने अवरुद्ध कंठ से यह घोषणा की थी कि इस
देश में अब कृषक-क्रांति नहीं होगी। अब लिखने-पढ़ने वाले लोगों को ही देश को बचाना
होगा।’(वही,
पृ.सं.16) लेकिन तरुण कृषक-नेता की अंतिम अपील की तरफ क्या हमारे बुद्धिजीवी वर्ग
अथवा पढ़े-लिखे तबके का ध्यान गया?
उत्तर नकारात्मक ही है। राष्ट्र की समस्याओं, ग़रीबी, बेरोज़गारी, अशिक्षा, शोषण,
जातिवाद, सामंतवाद आदि आज भी कमोबेश अक्षुण्णावस्था में ही हैं क्योंकि जिस वर्ग
पर बदलाव का दायित्व था, उसका रुख़ पलायनवादी ही रहा है। बड़े-बड़े ग्रंथों की
रचनाएं हुई हैं (लाइब्रेरियाँ इसकी गवाह हैं।), गूढ़ विषयों पर बौद्धिक विमर्शों
का कार्यक्रम अनिश्चितकाल से जारी है। कर्म से अधिक महत्वपूर्ण कथन है और कथन से
अधिक महत्वपूर्ण है शिल्प। तभी दिलीप की ‘कथा’ बुद्धिजीवियों को हजम नहीं
होती। किसी को शिल्प में नयापन नहीं दिखता तो किसी को लगता है कि ‘अब ऐसी कहानी या ऐसे उपन्यासों
में गरीब-गुरबा लोग ही टंगे रहते हैं। अब भी हिन्दी में लोग इसी तरह की चीज़ें
कैसे लिखते रह सकते हैं?
अब इस तरह की कहानी लिखने का कोई मतलब नहीं है।’(वही, भूमिका, पृ.सं.10) अर्थात समाज बदले न बदले,
देश बदले न बदले, समस्याएँ बदलें न बदलें, कहानी-उपन्यासों को बदलते रहना चाहिए।
तो क्या यूरोप और अमेरिकी बदलावों के आधार पर भारत को भी बदल गया मान लिया जाना
चाहिए और अनावश्यक एवं आयातित समस्याओं के स्वागत में हमें अपने यथार्थ की तरफ पीठ
कर लेनी चाहिए?
दिलीप और उस जैसे यथार्थवादी लेखकों की यही समस्या है। जो बात अपनी क़लम में है,
वह उधार की क़लम में कदापि नहीं हो सकती। इसका संकेत उपन्यासकार ने बड़ी चतुराई से
किया है। ‘वह
मेरी क़लम लेकर कुछ देर लिखता रहा। लेकिन उसे शायद मेरी कलम से लिखने में वैसा
आनंद नहीं आ रहा था।’(वही,
भूमिका, पृ.सं.9) हमारा विद्वत-जगत ज्ञान के रेगिस्तान का शुतुरमुर्ग हो गया है,
जिसको ये लगता है कि ‘ज्वॉयस’, ‘प्रूस्त’ और ‘क्लॉड सिमॉन’ की पीठ पर सवार होकर वह देशज
समस्याओं की आँधी से बच जाएगा, या कि उसे आभासी करार दे सकने में सफल हो जाएगा।
इसीलिए उसकी सम्पन्न दृष्टि, यथार्थ पर नहीं बल्कि नागर-बोध और ग्राम्य-बोध के
असंतुलन और दोनों के घालमेल से साहित्य के बिगड़े स्वाद पर केन्द्रित रहती है।
उसके लिए साहित्य में राजनीति का समावेश भी अरुचिकर हो जाता है और सेक्सुअलिटी पर
विचार के विस्तार की आवश्यकता महसूस होती है। सच कहूँ तो उपन्यास भारतीय बौद्धिक
जगत पर कड़ी टिप्पणी करता है। हाँ, समझने वाले की समझ पर निर्भर है कि वह इसकी
त्वरा को कितनी गहराई और शिद्दत से महसूस कर पाता है। गुटों और समूहों में घूमने
वाले साहित्य के आखेटक, सत्ता-केन्द्र से अपनी निकटता और उसके एवज़ में मिलने वाले
लाभ के कारण न सिर्फ अपनी गरिमा, बल्कि अपना प्रभाव और आत्मबल भी खो चुके हैं। हालांकि इसके लिए हमारा
शक्तिपूजक समाज भी कम जिम्मेवार नहीं है। ‘लोग
किसी तरह के विचारों को तभी स्वीकार करते हैं, जब दूसरी तरह के विचारों को रखने
वाला उनसे ज्यादा शक्तिशाली हो। पिछले सालों में यहाँ कोई किसी की बात को सुनता
नहीं है। बौद्धिक लोगों के बीच की अधिकतर बातचीत डरे हुए लोगों की बुदबुदाहटों के
रूप में ही देखी जा सकती है, भले ही उसे बोलते हुए बौद्धिक ज़ोर से बोल रहा हो!’(वही, पृ.सं.53)
उपन्यास
में भाषा-विमर्श को ख़ासी तरजीह मिली है। इसी बहाने भारतीय मानस को न सिर्फ समझने
का प्रयास किया गया है, बल्कि उसकी वास्तविक छवि भी हमारे सामने उभारने की कोशिश
हुई है। तरुण कृषक-नेता यानी गोप बाबा की तलाश में दिलीप की मुलाक़ात विभूति मिश्र
से होती है और यात्रा के दौरान उनसे वार्तालाप में कई महत्वपूर्ण बातें सामने आती
हैं। विभूति जी स्पष्ट कहते हैं कि ‘बिहारी
कहीं भी जाए, बंगाली से दबेगा ही। ठीक वैसे ही, जैसे बंगाली जहाँ भी जाए अँग्रेज
से दबेगा ही।‘(वही,
पृ.सं.51) दिलीप के प्रतिरोध पर वो कहते हैं कि ‘देखिए, दबाव हमेशा सीधे नहीं आते। अँग्रेजों को गए
तो इतने बरस हो गए, पर आपको नहीं लगता कि हम अँग्रेजों के दबाव में अभी भी हैं? यह एक मनोवैज्ञानिक बात है कि
लगातार अधीनस्थ रहते हुए, अधीनस्थ लोग वर्चस्वशाली वर्ग को मानसिक रूप से अनुकरणीय
मान लेते हैं और सीधे-सीधे वर्चस्वशाली वर्ग के नियंत्रण में न रहते हुए भी उनके
अनुकरण में लगे रहते हैं।’(वही,
पृ.सं.53) इसी वार्तालाप के दौरान एक और तथ्य उद्घाटित होता है जो हमारे जैसे
सामान्य लोगों के लिए बिल्कुल ‘एक्सक्लूसिव’ हैं। मसलन ‘1947 के बाद भी कलकत्ता के
प्रति, बंगाल के प्रति बिहारी नेताओं-विद्वानों का आकर्षण कितना अधिक था, इसकी
पुष्टि इस बात से होती है कि श्रीकृष्ण सिंह जैसे लोग बंगाल-बिहार को एक ही राज्य
के रूप में स्वीकार कर लेना चाहते थे और खुद विधानचन्द्र राय के मुख्यमंत्रित्व
में उप-मुख्यमंत्री बनने तक को तैयार थे।’(वही,
पृ.सं.54) बंगला साहित्य आज भी हिन्दी-पट्टी के लिए उत्कृष्ट है (हालांकि यहाँ यह
स्वीकार करने में हिचक नहीं है कि बंगला साहित्य में न जाति-बिरादरी और न ही गुटीय
प्रवृत्ति अभी उस हद तक पहुँच पाई है, जिसका हिन्दी साहित्य अपने प्रारंभ से ही
शिकार रहा है। गुणवत्ता की एक वजह यह भी हो सकती है।), कारण अब बताने की ज़रूरत
नहीं रही। अँग्रेज़ी में घासलेटी साहित्य की रचना करने वाला भी हिन्दी के मूर्धन्य
साहित्यकारों से अधिक लोकप्रिय और समादृत क्यों है? इसका भी जवाब स्वतः ही मिल जाता है। उत्तर-आधुनिक
युग में भाषा भी सत्ता-विमर्श का अंग है और हिन्दी हलके में दुर्भाग्य से लोगों की
दृष्टि अभी इस तरफ़ नहीं गई है या फिर जान-बूझकर अनदेखा किया गया है! राष्ट्रभाषा होने के बावजूद
हिन्दी की स्थिति अँग्रेजी के ‘अन्य’ की ही बनी हुई है। हिन्दी के
कई विद्वान गाहे-बगाहे सार्वजनिक मंचों से इस बात की घोषणा करते आपको मिल जाएँगे
कि हिन्दी कि गिने-चुने दिन ही शेष बचे हैं। जबकि यह वस्तुगत सच्चाई है कि जो
सभ्यता उधार की भाषा पर जीती है, उसकी उम्र लंबी नहीं होती। हम न केवल
पूँजी-निर्देशित युग में जी रहे हैं, बल्कि उसके इशारे पर ताता-थैया भी कर रहे हैं
और अपनी पैर पर आप ही कुल्हाड़ी भी मार रहे हैं। वर्तमान परिदृश्य में मुझे न जाने
क्यों ‘कालीदास’ से जुड़ी वो किंन्वदंती कोरी-कल्पना
प्रतीत होने लगी है कि वह पहले मूर्ख था और जिस डाल पर बैठा था, उसी को काट रहा
था। दृष्टांतों का दोहराव न हो तो उसे मेरे ख्याल से क्षेपक मान लेने में कोई हर्ज
नहीं है। और उस पर तुर्रा देखिए कि अँग्रेज़ी की जर्जर नौका पर सवार होकर आधुनिक
भारत विकसित राष्ट्रों की श्रेणी में पहुँचने का ख़्वाब पाले बैठा है। कहने को हम ‘रेशनल युग’ में जी रहे हैं, लेकिन हमारा
सामाजिक और बौद्धिक विकास पाला-ग्रस्त फसल की तरह हो रहा है। प्रभु-वर्ग नित नये
ढोंगियों को धर्म-गुरु बना रहा है और हम ‘बाबा’, ‘सांइँ’, ‘पीर’ आदि के सामने आँखें बंद किए,
हाथ जोड़े कृपा की प्रतीक्षा में बैठे हैं। औद्योगीकरण और बाजारीकरण की गति के साथ ही
धर्मांधता और चमत्कारों में विश्वास की प्रवृत्ति का नित बढ़ते जाना इसी का तो
संकेत है। तभी एक पाखंडी कहीं भी अवतरित हो जाता है और बिना किसी साक्ष्य के लोग
यह मान लेते हैं कि ‘लगभग
चौबीस बरस तक हिमालय में तपस्या करने के बाद यहाँ लौटकर आए थे। वे सिर्फ कंदमूल
खाते थे, महीने में दो दिन भोजन ग्रहण करते थे और हर गुरुवार को उनका प्रवचन होता
था। वे सुंदर तरीके से देखते थे, बहुत ही प्रभावशाली ढंग से बैठते थे और एकबारगी
उनको देखकर मन प्रसन्न हो जाता था।’
(वही, पृ.सं.55) ऐसे साधु का सम्मान और रूतबा तो हमारे समाज में है, लेकिन गोप
बाबा के प्रति लोगों का दृष्टिकोण क्या है?
‘लोग तरह-तरह की बातें
करते हैं। कहते हैं, किसी देवदासी के चक्कर में पड़ गए थे। वही बाद में उन्हें
छोड़ गई। बाद में परेशान होकर वापस सिमुलतला आए। कुछ दिन रहकर किसी पुराने मित्र
की सहायता से राजनीति करने लगे। पर 1967 के बाद राजनीति छोड़ दी और जन जागरण के
काम में जुट गए। अभी एक संस्था चलाते हैं, जिसमें देश भर के नौजवान आते हैं। कुछ
लोगों का कहना है कि गोप बाबा को सीआईए से दस करोड़ रूपये सालाना मिलता है। वे
किसी से पैसे भी नहीं लेते और उनका आश्रम भी खूब फल-फूल रहा है। उनकी आमदनी का कोई
ज़रिया लोगों को नहीं मालूम। कहने वाले तो यहाँ तक कहते हैं कि गोप बाबा दक्षिण के
एक मंदिर से दस किलो सोना लेकर भागे हैं। उसी पैसे से ये सब नाम-ध्यान चल रहा है।’(वही, पृ.सं.56) क्या इसके बाद
भी दिलीप जैसे लोगों को निराश नहीं होना चाहिए?
लेकिन यहीं पर एक और सवाल सिर उठाता है कि ठीक है, आमजन अभी परिपक्व नहीं हुआ और
समाज का शातिर वर्ग उनका इस्तेमाल अपने हित में करता है और प्रत्येक अच्छी कोशिश
को संदेहास्पद बनाकर, अपने पर मंडराने वाले ख़तरे को शून्य कर देता है। लेकिन क्या
इन साजिशों के सामने हमें नतमस्तक हो जाना चाहिए? क्या हमें भी गोप बाबा की तरह हार मानकर ख़ुद को
एक ऐसे घेरे में क़ैद कर लेना चाहिए, जिसका समाज से सीधा सम्पर्क संभव ही न हो? समाज से विलग होकर ऐसे किसी
आदर्श वातावरण में प्रयोग का क्या अर्थ?
जिस तरह का वातावरण गोप बाबा के आश्रम में है, अगर वही वातावरण पूरे देश में हो,
तो समस्या का समाधान स्वयंमेव हो जाएगा। आश्रम में प्रार्थना का मूल लक्ष्य ही यही
है कि ‘सबलोग
अपने को भूल कर एक-दूसरे से मिलें।’
क्योंकि बकौल गुरूजी ‘इस
समाज ने सामाजिक सह-अस्तित्व की धारणा को सामूहिक रूप से त्याग दिया है और उन्नति
की धारणा का अनुशरण करना शुरू कर दिया है। उन्नति से उनका अभिप्राय है कि ऐसी
प्रक्रिया, जिसमें व्यक्ति की ओर से उन्नति को बढ़ावा देना संभव हो। हर व्यक्ति
अपनी उन्नति के लिए संघर्षशील होगा और कुल मिलाकर समाज आगे बढ़ेगा।’(वही, पृ.सं.64) गोप बाबा की
बात बिल्कुल सही है। वह उस त्रासद स्थिति को भी समझते हैं और उसका इज़हार भी करते
हैं कि ‘यह
हमारी प्राचीन सोच की एक विडंबनापूर्ण स्थिति है, जहाँ यह पहले ही मान लिया जाता
है कि दर्शन, उच्च जीवन, उच्चादर्श सबके लिए नहीं है, कुछ लोगों के लिए है।’(वही, पृ.सं.65) लेकिन वो ख़ुद
क्या कर रहे हैं? इस
परिस्थिति को लाने में गोप बाबा जैसे लोगों का योगदान भी तो है। स्वयं दिलीप का
अनुभव भी यही है ‘हिन्दी
की जिस तरह की सभा-सोसाइटियों में वह जाता था, वहाँ उसे कुछ भी सुनने को नहीं
मिलता था, जो उसे समाज से जुड़ा लगे। एक वायवीय किस्म की बौद्धिकता का चारों ओर
चलन था।’(वही,
पृ.सं.80) तो
समाज से कटा हुआ बुद्धिजीवी समाज में परिवर्तन का कारक तो कम से कम नहीं ही बन
सकता। वह सिर्फ सत्ता में अपनी भागीदारी चाहता है और ऐसे ही वायवीय विमर्शों में
लगा रहता है। ‘हमारा
ध्यान समाज को नियंत्रित करने वाले तंत्र पर अधिक इसलिए रहता है, क्योंकि यह तंत्र
सभी प्रक्रियाओं को प्रभावित करता है। इस तंत्र की यह खूबी है कि यह कुछ
प्रक्रियाओं को अंततः यथास्थितिवाद के समर्थक के रूप में देखता है। धर्म,
अध्यात्म, दर्शन जैसे विषयों पर विचार करते रहने, मिलने-जुलने और यहाँ तक कि संगठन
करने को भी यह तंत्र बढावा देता है, क्योंकि अंततः ये समाज को बदलने की ओर उन्मुख
होने वाली प्रक्रियाएँ नहीं हैं। समाज का जो मूल ढाँचा है, मूल प्रवृत्तियाँ हैं,
मूल चरित्र है, उस पर इन प्रक्रियाओं का दूरगामी प्रभाव नहीं पड़ता है। कुछ समय तक
लोगों को प्रभावित करता है, फिर यह खत्म हो जाता है।’(वही, पृ.सं.79) बल्कि इस
मामले में गोप बाबा से अधिक तथ्यात्मक तो लिंका एंड्रूज का यह निष्कर्ष है कि ‘दुनिया में असली संकट ‘संसाधन’ का नहीं, ‘कम्युनिकेशन’ का है। लोग एक-दूसरे से
प्रेमपूर्वक जुड़ें और आपसी संवाद कायम करें तो दुनिया में प्रेम का साम्राज्य
स्थापित हो जाएगा।’(वही,
पृ.सं.18) लेकिन ये कम्युनिकेशन संभव तो तभी होगा, जब लोग अपने दायरों से निकलेंगे! लोग अपने दायरों में क़ैद
हैं, निकलना नहीं चाहते। समस्याएँ हैं, समाधान भी है, लेकिन समाधान के रास्ते
थोड़े पेचीदा हैं और हमारा आराम-तलब बौद्धिक समाज बदलाव को लेकर अधिक उत्सुक नहीं
है। उसकी जिज्ञासा लिंका एंड्रूज के रिपोर्ट की टाइटिल है- ‘इंडिया नीड्स वन करोड़ ह्वाइट
कॉलर जॉब टू फील गुड। ...इस देश का मानस बदलने के लिए नये गाँधी की ज़रूरत होगी।
पढ़े-लिखे और सम्पन्न लोगों को अपनी जिम्मेदारी समझनी पड़ेगी। यहाँ के अधिकतर लोग
मार्ग-दर्शन के अभाव में ‘एब्नॉर्मल’ हो गए हैं।’(वही, पृ.सं.20) यही बात तो स्वामी
सहजानंद की मौत के बाद गोप-बाबा ने कही थी। ऐसे में लिंका की रिपोर्ट में थोड़ा सा
संशोधन कर यह कहा जा सकता है कि भारत का बुद्धिजीवी तबका ‘एब्नॉर्मल’ है। अब जबकि डॉक्टर ही बीमार
है तो मरीज़ यानी समाज का उपचार कौन करेगा?
‘जिस दौर से हमारा समाज
गुजर रहा है, वहाँ किसी का सिनिक हो जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं है।’ (वही, पृ.सं.63) हमारा समाज
अभी भी किशोरावस्था में है जो यह सोचता है कि ‘उसे
अब अपनी बेकार, नीरस जिन्दगी छोड़ ही देनी चाहिए। उसे भी कश्मीर जैसी जगह में चले
जाना चाहिए, जहाँ वह पहले सेब के बागों में काम करेगा। फिर उसे भी कोई न कोई लड़की
मिल जाएगी, साधना जैसी...। उसी से फिर...(वही, पृ.सं.29)’ कल्पनाएँ तो होती ही सुंदर
हैं और हम इसी कल्पना के जादूई असर में ऊँघते हुए अनमने से यथार्थ को नज़र-अंदाज़
करते बढ़ते जाते हैं और हर दो-मिनट बाद जब होश में आते हैं तो बुदबुदाते हैं कि
कुछ नहीं बदला। कि दुनिया को, समाज को बदलना चाहिए।
हमारी
समस्या का मूल केन्द्र स्त्री-पुरुष, नागर-ग्रामीण, बौद्धिक-सामान्य,
शिक्षित-अशिक्षित, उच्च-मध्य और निम्न वर्गों के बीच लगातार चौड़ी होती खाई है। हमारे
यहाँ ‘सेक्स’ हमेशा ही ‘टैबू’ रहा है। नितांत प्राकृतिक
संबंध, हमारे लिए अप्राकृतिक और सामाजिक रूप से निर्लज्जता एवं कुसंस्कार के
प्रतीक रहे हैं। उपन्यास इस ज्वलंत और ज़रूरी मुद्दे पर भी पर्याप्त प्रकाश डालता
है। यहाँ यह किसी भी स्थिति में अप्रत्याशित नहीं, बिल्कुल समाज की तरह नियोजित है।
दिलीप स्त्री के मामले में कभी सहज नहीं दिखता। किशोरावस्था तक के जीवन में सिर्फ
एक बार किसी लड़की से रागात्मक संबंध महसूस करता है। वह भी ट्रेन-यात्रा के दौरान,
जो कि गंतव्य तक पहुँचने के साथ ही अपने अंत को प्राप्त करती है। इससे पहले भी जब
वह फिल्मी रोमान की गिरफ्त में था, उस वक्त उसे अपने आस-पास की लड़कियाँ नहीं,
बल्कि कश्मीर की युवती रिझाती थी। हाँ, कलकत्ता में एडमिशन के बाद चन्द्रा के
प्रति आकर्षित हुआ, लेकिन इसकी उम्र भी छोटी ही साबित हुई। और इसके बाद डंवाडोल
कैरियर और आपाधापी ने उसके अंदर प्रेम और स्त्री-सानिध्य की इच्छा को पनपने का
अवसर ही नहीं दिया। कथा के उत्तरार्ध में, उसके अंदर स्त्री के प्रति आकर्षण की
भावना पनपी भी तो वह महज दैहिक ही सिद्ध हुई क्योंकि जब वह ‘मैक्समूलर भवन की कैन्टीन में
पास की टेबल पर एक भरे बदन की युवती को बात करते हुए देख रहा था। लड़की ने कपड़े
कुछ इस तरह पहन रखे थे कि उसकी पुष्ट देह, उसके वक्षस्थल का आकार और कमर की माप-
सबकुछ उसके मन पर प्रभाव डाल रहे थे। वह कुछ अस्थिर हो गया- शरीर में तनाव उत्पन्न
होने लगा...।’(वही,
पृ.सं.83) और इसी शारीरिक आकर्षण से बंधा हुआ दिलीप बज़ाब्ता लड़की ट्रैप करने के
लिए, इंग्लिश कोचिंग ज्वॉइन करता है। श्यामली से मुलाकात होती है और उसके प्रेमपाश
में बंधता प्रतीत होता है, लेकिन यह प्रतीती मात्र है। क्योंकि महज जिम्मेदारी के
बोध से ही उसके हौसले पस्त हो जाते हैं। हाँ, उसके अंदर का सामंती पुरुष तमाम आरोहों-अवरोहों
के बीच लगातार अपना फन काढ़े खड़ा रहता है। श्यामली की तस्वीर देखते वक्त वह
श्यामली की भावना नहीं, बल्कि यह सोच रहा है कि ‘इस तस्वीर को उस तक पहुँचने के पहले कितने लोगों
ने देखा होगा, किस-किस तरह से देखा होगा?’(वही,
पृ.सं.92) यानी दिलीप को ऐसी स्त्री चाहिए जो असूर्यमपश्या हो! स्वर्णाली को लेकर दिलीप
सीरियस है, लेकिन स्वर्णाली उसको सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करती है। और तो और
स्वर्णाली से संबंध रखते हुए भी वह सुचरिता से शारीरिक संबंध स्थापित करता है।
सुचरिता का दर्शन भी दिलीप को थोड़ा लापरवाह बनाता है। ये अलग बात है कि सुचरिता
अपने व्यक्तित्व में पूरी तरह परिपक्व और दृष्टि-सम्पन्न है। उसके सामने दिलीप का
व्यक्तित्व बौना साबित होता है। वह बहुत हद तक ओशो से प्रभावित जान पड़ती है। उसका
स्पष्ट दर्शन है कि ‘जीवन
में सबसे महत्वपूर्ण है संभोग। पूरे मन से बगैर किसी दबाव के, बगैर किसी
प्रकार की अपेक्षा के..। उसे लगता था कि जीवन संभोग में है। वह शुरू से ही इसी बात
पर कायम रही।’ उसने
कभी भी दिलीप को अपने जीवन में अनिच्छित हस्तक्षेप का अवसर नहीं दिया। लेकिन दिलीप
का प्रत्येक अवसर पर स्त्री के प्रति सामंती दर्प और अधिकार भाव परिलक्षित होता
रहा है। इसीलिए स्वर्णाली और सुचरिता द्वारा दिलीप को त्यागना, उसके दर्प पर भारी
पड़ता है और वह विक्षिप्तों सा व्यवहार करने लगता है। जब उसे एक प्रेमी-युगल सटकर
बैठा दिखाई देता है तो दिलीप को ‘वह
लड़की कुलटा लगी और उसके साथ वाला लड़का गुंडा।’(वही, पृ.सं.101) आख़िर क्यों? क्या दिलीप भी वैसा ही
साहचर्य नहीं चाहता था?
वही उक्ति फिर से कि ‘विपन्न को सारे धनवान तभी तक शोषक
लगते हैं, जब तक कि वह स्वयं धनी नहीं बन जाता।’ और धनी बनते ही सारी नैतिकता ताक़ पर धर दी जाती
है। दिलीप की मनःस्थिति और स्त्री के प्रति उसके दृष्टिकोण में द्वैत लगातार बना
रहता है, वह नंदिनी के साथ संबंध के लिए उत्सुक नज़र नहीं आता। इसका जो सहज कारण
है, वह ये है कि वह उसके अधीनस्थ की ‘हाउस
कीपर’ है
और उसे इस बात का पुख्ता यकीन है कि मोहांती के साथ उसके शारीरिक संबंध भी हैं। मतलब यह दिलीप की सच्चरित्रता
नहीं, बल्कि उसके शुद्धतावादी सोच का नतीज़ा है। जहाँ सुचरिता और नंदिनी का
व्यक्तित्व, स्त्री के बदलते व्यवहार और दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करते हैं, वहीं
स्वर्णाली उत्तर-आधुनिक समाज में सौंदर्य को सफलता की सीढ़ी मानने वाली नई पौध का
प्रतिनिधित्व करती है। स्त्री के मामले में दिलीप के प्रति हमारी भी वही राय बनती
है जो उसके मित्र रमन सिन्हा की है- ‘तुम
जिस तरह से भागे हो, वह तुम्हारे व्यक्तित्व को बहुत ही बौना प्रमाणित करता है।
...तुम एक लिजलिजे आदमी हो।’(वही,
पृ.सं.94)
अपनी
समग्रता में दिलीप का व्यक्तित्व बड़ा ही त्रासद है। वह अपने जीवन के प्रारंभ से
लेकर पलायन तक, लगातार अपने समाज से ‘एलियनेट’ होता रहा है। उसके अंदर भावनाओं
और संवेदनाओं का जो सोता था, वह भी सूखता रहा है। और त्रासदी यह है कि इसका उसको
समय पर कभी अहसास नहीं हुआ और यह सिर्फ दिलीप की त्रासदी नहीं, बल्कि यह महानगरीय
जीवन का वस्तुगत सत्य है। ‘सभी
महानगरों की विशेषता है कि कोई भी अपना सारा जीवन बगैर इस अहसास के गुजार सकता है
कि वह मर चुका है।’(वही,
पृ.सं.81) जब उसको इस बात का अहसास होता है तो वह छूट रहे संबंधों को पकड़ने की
कोशिश करता है। वह सचरिता को लेकर तो नहीं, लेकिन स्वर्णाली को लेकर गंभीर ज़रूर
है और इसीलिए उसकी उपेक्षा को नज़रअंदाज़ करते हुए, उसके घर भी जाता है। लेकिन
हासिल कुछ भी नहीं। ऐसे में अगर दिलीप अपने जीवन की ‘कथा’ कहने के लिए शिल्प और फॉर्म
की तलाश में लाइब्रेरी के ग्रंथों की धूल झाड़ता मिलता है, तो अचरज की बात नहीं
है। लेकिन ‘कितना
भी दुख हो, उम्मीद कभी क्या पूरी तरह से मर सकती है? दुख क्या इतना बड़ा कभी हो सकता है कि जीवन से
बढ़ जाए?’(वही,
पृ.सं.100) जिजीविषा मनुष्य को बहुत दिनों तक निराशा के गर्त में नहीं रहने दे
सकती। जीवन तो फिर-फिर सिर उठाएगा। हाँ, समय के आवेग की सटीक पहचान और उसके अनुकूल
विचारों का समाहार भी ज़रूरी है, वरना आज की पीढ़ी भी दिलीप की तरह अपनी कथा की
अभिव्यक्ति के लिए भाषा, शिल्प और फॉर्म ही तलाश करती रहेगी।
एक सौ
अड़सठ पन्ने के इस कृशकाय उपन्यास में जिन महत्वपूर्ण मुद्दो, विमर्शों और परिस्थितियों को
रेखांकित किया गया है, अगर
सभी की बारी-बारी से व्याख्या की जाए तो उसकी मोटाई, उपन्यास से कई गुना ज्यादा हो जाएगी। लिहाजा यह
निसंकोच स्वीकार किया जा सकता है कि उपन्यासकार ने गागर में सागर भर दिया है और
पाठक अँजुरी-अँजुरी पानी निकालता और पीता जाता है, न गागर खाली होती है और न ही प्यास में ही कमी
महसूस होती है। ‘एनजीओ’ और ‘लेफ्ट-राईट’ की राजनीति, सामाज के प्रतिनिधि चरित्रों
का नैतिक-पतन और नैतिक व्यक्तियों को केन्द्र से बहिष्कृत करने का प्रपंच नया नहीं
है और आज संचार-क्रांति के युग में अब ये बातें बहुत ज़्यादा गोपन भी नहीं रह गई
हैं, लिहाजा
उन पर अलग से टिप्पणी की यहाँ पर आवश्यकता नहीं है। अंत में बस इतना ही कि यह
उपन्यास और इसका कथा-विन्यास उतना ही अधूरा और उच्छृंखल है, जितना की मनुष्य और
उसका जीवन। साथ ही उतना ही सुनियोजित, जितनी कि व्यवस्था। हाँ, जीवन-जगत से जुड़े अलग-अलग
चिरकुटों को जोड़ने में रफूगर(उपन्यासकार) कामयाब तो है, लेकिन सीवन के उभार
जोड़ों की निशानदेही भी करते हैं। अच्छा ही है, सबकुछ सपाट और साफ-सुथरा दिखे तो
वह प्राकृतिक नहीं, आर्टीफिशियल ही होगा।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें