शुक्रवार, 9 नवंबर 2012

बूँदों का तिलिस्म


उमस और ऊब का माहौल 
मन को कोंचते... 
ख़्वाहिस को बढ़ाते... 
बिल्कुल प्यास की तरह
जबकि नल की टोटी 
चिढ़ाती रहती !
बूंद-बूंद पानी टपका कर...
हाथों की अंजुरी बना कर 
ऊँकड़ूं बैठा, आगे को झुका...

शुक्रवार, 12 अक्टूबर 2012

गुमशुदा आवाज़



साहब मैं पटना से बोल रहा हूँ। आपसे कुछ भी नहीं छुपाउंगा। बिल्कुल सच बताउंगा। मैं लव मैरिज करने के बाद अब पछता रहा हूँ। बीवी ब्लैकमेल कर रही है। उसका किसी और के साथ संबंध है। मेरे पास वीडियो फुटेज है। फोन की रिकॉर्डिंग भी है। चाहकर भी विरोध नहीं कर सकता। खुदकुशी की धमकी देती है। दहेज-प्रताड़णा का मामला बनाने और जेल भिजवाने की धमकी देती है। पुलिस को बता नहीं सकता। घरवाले पहले से ही खार खाए बैठे हैं। अंतिम उम्मीद आप ही हैं। मैं सुनता हूँ। ठीक वैसे जैसे यह रूदाद काठ के उल्लू को सुनाई जा रही हो। उसके चुप होने पर हल्ला बोल का नियत समय बतलाता हूँ। थोड़ी सी ढांढ़स देता हूँ और फोन कट।

सोमवार, 1 अक्टूबर 2012

बदले-बदले सरकार नज़र आते हैं !


बहुत शोर था तेरे सनमख़ाने में, तू शेर है, शीरीं है, शहंशाह है। जनता का हमदर्द, बड़ा हाकिम है। सुनता है उन्हें तू, देता है तसल्ली। हकीकत है या भ्रम है? सब पर्दे का करम है। एक दौर था। जब तुमसे बड़ा, तुमसे अच्छा कोई न था। अब एक दौर है। जब तुमसे बुरा कोई नहीं।

सोमवार, 10 सितंबर 2012

मूव ऑन



भारत कभी सोने की चिड़िया तो कभी गुलामों का देश रहा। भारत कभी पंचशील सिद्धांत के कारण विख्यात रहा। भारत कभी विकासशील, दलित-दमित देशों का उद्धारक तो कभी अगुआ रहा। भारत कभी सोवियत संघ और अमेरिका के बीच शीतयुद्ध के दौरान तीसरी शक्ति यानी गुट-निरपेक्ष आंदोलन का जनक रहा। भारत कभी सोवियत संघ के प्रभाव में समाजवाद की दिशा में तेज़ी से कदम बढ़ाने वाला देश रहा। भारत अमेरिका के पूंजीवादी और विस्तारवादी नीतियों के खिलाफ संघर्ष करने वाला देश भी रहा। जब कभी अफ्रीकी, एशियाई या फिर लातीन अमेरिकी ग़रीब मुल्क संकट में पड़ा, उसको संबल और मदद पहुंचाने वाला पहला देश भी भारत ही रहा।

गुरुवार, 16 अगस्त 2012

कठपुतली नाच वाया अन्ना बाबा


एक अन्ना थे। एक बाबा थे। धारणा के विपरीत बाबा जवान थे। धारणा के विपरीत अन्ना बूढ़े थे। दोनों अपनी-अपनी कुटिया में रहते थे। बाबा की जनता भक्त थी, नेता भक्त थे।हर छोटा-बड़ा, बाबा के इशारे पर कदमताल करता। हैंड्स अप और डाउन करता। सब के सब नतमस्तक होते। बाबा कसरती तो थे, लेकिन थे दुबले-पतले। भक्त समझते योग का बल है। जबकि बाबा राष्ट्र चिंता में तिल-तिल घुलते मंच पर उछल-उछल कर लोगों को मज़बूत बनाते। खाए-अघाए का देश था। काया थुल-थुल, चर्बीवाली। एक-एक शरीर में छोटी-मोटी दर्जनों बीमारी। प्राकृतिक उपचार पद्धति थी रामबाण। बाबा की कोशिश ने कई काया को बनाया कांचन। आने लगी बन आंधी माया। शिविरों में जब उमड़ी भीड़। देश चिंता में वह हुए अधीर। भानुमति का कुनबा जोड़ वह अश्वमेध को हुए विकल। नेताओं ने भौंह तरेरी। प्रतिष्ठा जो दी थी, वो झटके से ले ली। भ्रष्टाचार और फर्जीवाड़े का जो आरोप लगा तो वह बेहद घबराए। लौट गए फिर से कुटिया को। बहुत दिनों तक न बाहर आए।

मंगलवार, 7 अगस्त 2012

कुछ तो ख़ता, कुछ ख़ब्त भी है


लोकतंत्र है। अर्थतंत्र है। भेंड़तंत्र है। भीड़तंत्र है। लूटतंत्र है। सर्वत्र फैला ढोंगतंत्र है। यंत्रवाद है। बौद्धिक साम्राज्यवाद है। सियासी वितंडावाद है। भोगवाद है। विकासवाद है। समाजवाद है। पूंजीवाद है। संचार युग है। मीडिया है। बाज़ार है। सराय है। यानी जो कुछ है- प्रचुर है। कोई खुशी तो कोई गम में चूर है। जिसके पास नहीं है, वह मजबूर है। जिसके पास है, वह मग़रूर है। ऐसा कुछ भी नहीं है, जो नहीं है। यंत्र-तंत्र, व्यवस्था, पैरोकार, बिचौलिए, सरदार, सरकार, नेता, सत्ता, कुर्सी, मंत्री, संतरी, चोर, पहरेदार...

रविवार, 1 जुलाई 2012

आज भी परेशान है फक्कड़ बुड्ढा



(हमारे सबसे प्रिय जनकवि बाबा नागार्जुन को सादर समर्पित।)
आज भी परेशान है फक्कड़ बुड्ढा
तरौनी गांव के पीछे
मसान में
चिता की राख में
चिंगारी ढूंढता
मिला था फक्कड़ बुड्ढा
भावों की विह्वलता तो क्या
पराजय की छटपटाहट कहें
या दमा का दौरा !

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