बुधवार, 10 अप्रैल 2013

मौत की किताब (उपन्यास का अंश)


ख़ालिद जावेद

मैं जल्लाद के पीछे-पीछे चल रहा हूँ। क्या मुझे झूलते हुए रस्सी के फन्दे की तरफ़ ले जाया जा रहा है? इन सब के वज़नी बूट मेरे आगे मार्च कर रहे हैं। मैं रात भर जागा हूँ। अभी तो नींद आई थी कि रुख़्सत का वक़्त आ पहुँचा। मैं एक बार फिर सुबह की नींद के खि़लाफ़ चल रहा हूँ। अपने काहिल और ढीले हाथ-पैरों से मैं नींद के ख़िलाफ़ एक बयानिया फिर लिख रहा हूँ। आज सारे इक़बाले जुर्म और चश्मदीद गवाह पूरे हो गए।

सोमवार, 25 मार्च 2013

'अँग्रेज़ी' का उपनिवेश- भारत


बात अँग्रेजों के ज़माने की है। तब हमारा मुल्क गुलाम था। अँग्रेज़ तो हम पर हुकूमत के ही इरादे से आए थे। लिहाजा सत्ता-व्यवस्था में भारतीयों की भागीदारी उन्हें मंज़ूर न थी। इसीलिए शासक हमेशा ग्रेट ब्रिटेन से एक्सपोर्ट किए जाते थे।

सोमवार, 11 मार्च 2013

घड़ा बदलने से पानी नहीं बदलता

15 अगस्त 1947। भारत के लिए पर्व का दिन। इतिहास का टर्निंग प्वॉइंट। मान्यता के मुताबिक आधी रात को आज़ादी दबे-पाँव देश में दाखिल हुई थी। लोग-बाग जश्न में डूबे थे। पटाखे फूट रहे थे। नारे गूँज रहे थे। आम जनता मदमस्त थी। उसको इस बात की चिंता ही नहीं थी कि सदियों बाद लौटी आज़ादी के रहने-सहने का बंदोबस्त कौन करेगा? वह ठहरेगी कहाँ?

शनिवार, 2 मार्च 2013

ग़ुलामी


महारथी.., तुमने तो कमाल कर दिया! वातावरण से कटु प्रश्नों के तमाम कीटाणु तुमने पलक झपकते ही साफ कर दिए। हमारी चिंताओं का पूर्णतः लोप हो गया है। अब कहीं से भी विरोधी स्वर सुनाई नहीं देते।
प्रजा वत्सल, यह सब तो आपकी बौद्धिक सोच और मार्गदर्शन का ही परिणाम है। हमने तो केवल उसका पालन किया है।

गुरुवार, 21 फ़रवरी 2013

आन वर्सेस स्वाभिमान- सुनवाई जारी है

सवाल सिर्फ मंदिर का नहीं। स्वाभिमान का भी है। तुम साले बाबर की औलाद... पुरखों का पाप तो भोगोगे ही। बहुत हो गया। उसकी आवाज़ नफ़रत के कीचड़ में पूरी तरह से लिथड़ी हुई थी। सामने खड़ा करीब 13 साल का लड़का राय साहब के बेटे के इस बर्ताव से अचंभे में पड़ा, कुछ देर वहीं खड़ा रहा। वह अचानक उफनी इस नफ़रत का कारण जानना चाहता था। वह उससे पूछना चाहता था। लेकिन पूछने की हिम्मत नहीं जुटा सका। उनकी आंखों में नफ़रत की भड़कती चिंगारी देख, उसकी अपनी आँखों में ख़ौफ़ उतर आया। वह चुपचाप वहां से लौट आया।

मंगलवार, 19 फ़रवरी 2013

इतिहास का उल्था वाया अयोध्या

'उल्टी करते-करते जाह्नवी की आँखें उलट गई थीं। वह निश्छल और पवित्र कहां रह पाई! शिव की जटा से निकल, जब महावीर कर्ण के घर चम्पावती पहुंची थी, तब सपने में भी नहीं सोचा था कि सुजानगढ़ के लोग ही उसके साथ कभी ऐसा सलूक भी करेंगे। जाह्नवी तो सोचती थी कि यहां ज्ञान, मानवता और न्याय का पाठ पढ़ाया जाता है। असुरों को परास्त करने के लिए मथानी और रस्से की व्यवस्था जहां के लोगों ने की हो, उनके बारे में अशुभ विचार कैसे पनप सकते थे! लेकिन मनुष्य की प्रवृत्ति कब और कैसे बदल जाए, कौन जानता है?' कथा कहते-कहते बुज़ुर्ग का गला अचानक भर्रा उठा, उसकी लंबी सफेद दाढ़ी आटा-चक्की वाले ईंजन की तरह कांप रही थी। आँखें लाल स्याही से रंग चुकी थीं।

गुरुवार, 14 फ़रवरी 2013

प्रेम (उनके लिए जिन्होंने सबकुछ दांव पर लगा दिया)


प्रेम-1
आता है तो आ ही जाता है
दिल एक नादान परिंदा है
उम्र का पाबंद कहां
जग की रीतों को क्या जाने
मतवाला भौंरा है यह तो
सपनों की अपनी दुनिया का
थाम ले मन की डोर अगर तो
छोर थाम बस उड़ता जाता
सबकुछ सहता, हंसता रहता

Featured Post

'साक्षी है इतिहास' तथा अन्य चार कविताएँ

1.      साक्षी है इतिहास ( मार्टिन नीमोलर को समर्पित) जानता हूँ आप जहमत नहीं उठाएँगे अपनी सलीब पर टँगे रहने का लुत्फ बेग़...