फिल्मों के बारे में अक्सर कहा जाता है कि होती तो
दो-ढाई घंटों की हैं, मगर कई फिल्मों का असर सदियों तक बना रहता है। अभी तो उम्र
के चौथे दशक की सीमा में प्रवेश मिला है। सदियां देखी नहीं है। लेकिन हां, बात
बेमानी नहीं। आज़ादी के बाद भारतीय सिनेमा ने कई रंग देखे। फिल्मों के कई दौर
आए-गए, नायक-महानायक हुए। फिल्म निर्माण इंडस्ट्री स्टैबलिश हुई और अब तो हालत ये
है कि सालाना सैंकड़ों की तादाद में फिल्में बनती हैं, रिलीज होती हैं। लोग
देखते-सराहते भी हैं। हमें लगता है कि साहित्य में जितनी धाराएं और आंदोलन हुए
हैं। फिल्मों में भी ऐसे ही वर्गीकरण हैं।
शनिवार, 31 मार्च 2012
बुधवार, 28 मार्च 2012
हम चुप क्यों रहते हैं?
वे लोग जब भी आते हैं
बात-बात पर मुस्कराते हैं
आप जो कुछ भी कहते हैं
समझने के अंदाज़ में...
अरना भैंसे की तरह सिर हिलाते हैं
...
जब हम पानी मांगते हैं
वे प्रदूषण की बात करते हैं
जब हम अनाज मांगते हैं
बुधवार, 21 मार्च 2012
दो ग़ज़लें
दोनों ही ग़ज़ले गुजरात दंगों के दौरान लिखी गई थीं और 2005 में समकालीन सोच के जनवरी-अगस्त अंक में छपी थीं। आज अचानक पत्रिका पर नज़र पड़ी तो सोचा दोस्तों की नज़र करूं। अब एक बार फिर लिटमस टेस्ट का मौका है, एक गुमनाम शायर और उसकी शायरी के लिए... और हां, तब क़लमी नाम की ख़ब्त भी थी। तब यानी उस वक़्त जनाब अकबर साहब साहिल हुआ करते थे।
(1)
गर्द-ए-दहशत और लुटा चमन है
निगाहों में
देखिए क्या-क्या और हैं ज़ेहन
के पिटारों में
बस्तियां वीरान हैं, घर
सन्नाटे में डूबा है
जो देखनी है रौनक, तो चलिए
क़त्लगाहों में
ख़ौफ़जदा आँखें, ज़र्द चेहरा
और थर्राया ज़ेहन
सहमी-सहमी सी सरगोशियां उभरती
हैं रातों में
मां की ममता से जब दरिंदे हार
गए
सुला दिया बच्चे को मां
सोमवार, 12 मार्च 2012
ये क्या जगह है दोस्तों...?
होली अपनी सतरंगी छटा बिखेरती हुई यूं निकल गई कि पता भी न चला। कई दोस्त तो तमाम विघ्न-बाधाओं को पार कर, घर भी गए थे। लौटे तो सब-के-सब रंगों में सराबोर। ऐसी बात नहीं कि कपड़े नहीं बदले गए थे। जिस्मों पर कपड़े बिल्कुल साफ और धुले-धुले ही थे, लेकिन मन पर चढ़ा फागुन का रंग बहुत गाढ़ा था। अपनी-अपनी कहानियां थीं, अपने-अपने रंग-ढंग और
रविवार, 4 मार्च 2012
मीडिया का चरित्र, उम्मीद बाकी है!
परिस्थितियों का चरित्र हमेशा परिवर्तित होता रहा है। समय और सापेक्षता का सिद्धांत भी स्थायी नहीं है। विचार-व्यवहार बदलते रहे हैं। ऐसे में, सिर्फ इसलिए कि अब तक लोग मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ पुकारते या मानते रहे हैं, परंपरा का निर्वाह करते हुए हम भी इसे ऐसा ही मानें, यह कतई ज़रूरी नहीं है। स्वतंत्रता पूर्व और स्वतंत्रता के बाद की पत्रकारिता। नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी तक के दौर वाली पत्रकारिता और फिर इसके बाद की पत्रकारिता। ये कोई परंपरागत विमर्श-पद्धति वाला वर्गीकरण नहीं है। बल्कि ये बस काल-परिवर्तन और परिदृश्यगत् बदलाव के अनुरूप मीडिया के कायांतरण की महज सीढ़ियां हैं।
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