गुरुवार, 31 मई 2012

कुछ कणिकाएँ... कुछ क्षणिकाएँ... यूं ही आएँ-बाएँ!!!


(1)
ले आए ये कैसा प्याला
पिये बिना ही जग मतवाला
देख-देख आँखें चुँधियाईं
जग का ऐसा रूप निराला
कब से आँखें धधक रही हैं
जिगर में भड़की है ज्वाला

गुरुवार, 17 मई 2012

आत्मालाप (आवाज़ गुमशुदा और वक्त कुत्ता है अब)


आत्मालाप-1
सीने में जलन सी हो रही है
होंठ फड़फड़ा रहे हैं...
अजीब सी बेचैनी सवार है
ज़ोर-ज़ोर से चीखना चाहता हूँ
लेकिन कहीं किसी कोने में दुबका बुज़दिल
डरा रहा है, ख़ौफ़ का छौना 

गुरुवार, 12 अप्रैल 2012

देवी ये न्याय है या प्रहसन?


साल की पहली तारीख़ थी। सुबह का वक़्त था। नये साल के स्वागत में आधुनिक लोकतंत्र का एक मसीहा यानी जन-प्रतिनिधि व्यस्त था। पूर्णिया में अपने आवास पर विधायक राज किशोर केसरी ने दरबार सजा रखा था। दरबारी और भक्त आ-जा रहे थे, अपना-अपना दुखड़ा सुना रहे थे। फरियाद कर रहे थे, मुराद पा रहे थे। ठंड ने संवेदनाओं को भी सर्द कर रखा था। कहीं किसी के भीतर घुट रही वेदना ने धीरे-धीरे प्रतिरोध और फिर प्रतिशोध की ज्वाला का रूप ले लिया था।

शुक्रवार, 6 अप्रैल 2012

मेरा फ़रिश्ता


मेरे नन्हे, ज्यादा दिनों का नाता नहीं तुझसे
अभी तो आया है, लेकिन है बड़ा जादूगर!

मेरे नन्हे, मेरे मन को तूने बांध लिया है
तेरे जाने ने मुझे जिन्दगी में पहली बार
अकेलेपन, सूनेपन और बेरंग जीवन का अर्थ
सीधे-सीधे और बेखटके ही समझा दिया है
तेरी सूरत आँखों में कुछ बेतरह जज़्ब है

जब भी सोचता हूँ..,
तू सोते में मुस्कराता
पोर-पोर के दर्द को अंगड़ाइयों में तोलता
कभी मानूस निगाहों से देखता
कभी कुछ अजीब सा मुँह बनाता
ठीक मेरी बगल में..,

शनिवार, 31 मार्च 2012

कील है कि गड़ी है अभी तक


फिल्मों के बारे में अक्सर कहा जाता है कि होती तो दो-ढाई घंटों की हैं, मगर कई फिल्मों का असर सदियों तक बना रहता है। अभी तो उम्र के चौथे दशक की सीमा में प्रवेश मिला है। सदियां देखी नहीं है। लेकिन हां, बात बेमानी नहीं। आज़ादी के बाद भारतीय सिनेमा ने कई रंग देखे। फिल्मों के कई दौर आए-गए, नायक-महानायक हुए। फिल्म निर्माण इंडस्ट्री स्टैबलिश हुई और अब तो हालत ये है कि सालाना सैंकड़ों की तादाद में फिल्में बनती हैं, रिलीज होती हैं। लोग देखते-सराहते भी हैं। हमें लगता है कि साहित्य में जितनी धाराएं और आंदोलन हुए हैं। फिल्मों में भी ऐसे ही वर्गीकरण हैं।

बुधवार, 28 मार्च 2012

हम चुप क्यों रहते हैं?


वे लोग जब भी आते हैं
बात-बात पर मुस्कराते हैं
आप जो कुछ भी कहते हैं
समझने के अंदाज़ में...
अरना भैंसे की तरह सिर हिलाते हैं
...
जब हम पानी मांगते हैं
वे प्रदूषण की बात करते हैं
जब हम अनाज मांगते हैं

बुधवार, 21 मार्च 2012

दो ग़ज़लें


दोनों ही ग़ज़ले गुजरात दंगों के दौरान लिखी गई थीं और 2005 में समकालीन सोच के जनवरी-अगस्त अंक में छपी थीं। आज अचानक पत्रिका पर नज़र पड़ी तो सोचा दोस्तों की नज़र करूं। अब एक बार फिर लिटमस टेस्ट का मौका है, एक गुमनाम शायर और उसकी शायरी के लिए... और हां, तब क़लमी नाम की ख़ब्त भी थी। तब यानी उस वक़्त जनाब अकबर साहब साहिल हुआ करते थे।

(1)
गर्द-ए-दहशत और लुटा चमन है निगाहों में
देखिए क्या-क्या और हैं ज़ेहन के पिटारों में

बस्तियां वीरान हैं, घर सन्नाटे में डूबा है
जो देखनी है रौनक, तो चलिए क़त्लगाहों में
ख़ौफ़जदा आँखें, ज़र्द चेहरा और थर्राया ज़ेहन
सहमी-सहमी सी सरगोशियां उभरती हैं रातों में

मां की ममता से जब दरिंदे हार गए
सुला दिया बच्चे को मां

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