सोमवार, 29 सितंबर 2014

नयी कहानीः लघुता में विराट का प्रक्षेपण और अमरकांत

हिन्दी कहानी उपदेश की हवेली से आदर्शवाद की डोली पर सवार होकर यथार्थ के धरातल पर उतरी। रूसी क्रांति के प्रभावस्वरूप प्रगतिशील चेतना ने उपदेश और आदर्श की महत्ता को थोड़ा कम किया। लेकिन यथार्थ का दबाव कुछ ज़्यादा ही बढ़ गया। उपदेश-भाव की साँसें तो बहुत पहले ही उखड़ गई थीं, लेकिन आदर्श और यथार्थ के बीच रस्साकशी आज तक चली आती है। सच तो ये है कि दोनों ही अपने एकल-वास्तविक रूप में जन-मानस का प्रतिबिम्ब नहीं बन सके। प्रगतिवाद निरे-यथार्थवाद का पोषक था। आदर्शवाद के बारे में कुछ कहने की आवश्यकता ही नहीं है। न तो यथार्थ की उपेक्षा की जा सकती थी और न ही आदर्शों की वायवीयता से समाज और साहित्य का भला हो सकता था। 20वीं सदी का चौथा-पाँचवां दशक न केवल राजनीतिक, बल्कि सामाजिक और वैचारिकता के स्तर पर भी उथल-पुथल से भरा था। स्वतंत्रता के लिए जब तक संघर्ष चलता रहा, तब तक आज़ादी का स्वप्न और सबकुछ के सुंदरतम हो जाने की उम्मीद बची रही। लेकिन आज़ादी के बाद अचानक मोहभंग ने सुंदर-स्वप्नों के हवा-महल को धराशायी कर दिया। फणिश्वरनाथ रेणु, अज्ञेय, जैनेन्द्र, यशपाल, धूमिल, मुक्तिबोध आदि, सभी मोहभंग के शिकार हुए। वैसे मोहभंग की कथा तो बाद में शुरू होती है, उससे पहले ही मार्क्सवाद और गाँधीवाद के ज़ेरे-असर, प्रेमचंद एक नयी लीक बना चुके थे, जिसका नाम था- आदर्शोन्मुख यथार्थवाद। लेकिन जीवन के अंतिम वर्षों में उन्होंने आदर्शोन्मुख यथार्थवाद से भी अपना दामन छुड़ा लिया था। उनकी कहानी सांकेतिकता का अवलम्ब ग्रहण कर रही थी। कफ़न इसका सबसे बेहतर उदाहरण है। हालांकि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका और यूरोप की साहित्यिक-धारा में उत्पन्न विक्षोभ की परानुभूति ने भी हिन्दी की साहित्य-धारा को कम परेशान नहीं किया। भाषा हिन्दी ही थी। पात्रों के नाम भी हिन्दुस्तानी थे। लेकिन अनुभूतियाँ, कथा-विन्यास और घटनाक्रम पाठकों के स्वानुभूत सामाजिक-सत्य से कोसों दूर। साहित्य की यह अजनबीयत बेचैन करने वाली थी। इसी बेचैनी से नयी कहानीऔर नयी कविता की धारा फूटी। नयी कहानी ने जहाँ अपनी सहजता के कारण लोकप्रियता का नया मापदंड गढ़ा, वहीं नयी कविता’ ‘ब्रह्मराक्षस बन गई।

शनिवार, 28 जून 2014

धम्म-विजय

चाय की केतली से उठती भाप से उसे ज्ञान की प्राप्ति हुई। ज्ञान प्राप्ति के बाद उसने सेवा प्रारंभ की। सेवा से शक्ति मिली और वह मसीहा बना। पौराणिक परंपरा का अनुपालन करते हुए उसने भी स्त्री को विष की बेल स्वीकार किया। पत्नी का त्याग करने के बाद उसने आधुनिकता का परिचय देते हुए ब्रेकअप पार्टी की। उपस्थित अनुयायियों के अनुरोध पर सोमरस का पान किया। सोमरस के प्रभाव में ही उसने विधर्मियों के समूल नाश का आह्वान किया। अनुयायियों ने भक्तिभाव से उसका अनुपालन किया। जब मसीहा की चेतना लौटी तो उसे ज्ञात हुआ कि देवों में उसके इस कृत्य से आक्रोश है और सभी निंदा में व्यस्त हैं। मसीहा रुष्ट हुआ और अनुयायियों की सभा बुलाई-
मसीहा- आप सभी मेरे कृतित्व और व्यक्तित्व से परिचित हैं। आप ही बताएँ कि मैंने कुछ अनुचित किया?
अनुयायी- नहीं... कदापि नहीं। आपने तो वही किया जो अब से पहले देवतागण किया करते थे।
मसीहा- तो फिर देवताओं के आक्रोश और विरोध का कारण क्या है?
अनुयायी- केवल कुंठा..। वस्तुतः यह देवों का कार्य-क्षेत्र था, आपका कृत्य उसका अतिक्रमण है।
मसीहा- लेकिन मैंने तो धर्म-रक्षा का ही आह्वान किया था, इसमें ऐसा अप्रिय क्या था?
अनुयायी- अगर मसीहा भी देवों का कार्य करने लगे तो देवों का मूल्य कहां रह पाएगा?
मसीहा-(कुछ क्षण चिंतामग्न रहने के पश्चात)... तो अब समस्या का समाधान क्या है?
अनुयायी- नरमेध के बाद अश्वमेध की परंपरा रही है... आप अविलंब अश्वमेध यज्ञ की युक्ति करें।
मसीहा- उचित है... सर्वथा उचित। लेकिन यदि देवताओं ने पुनः आपत्ति की तो...
अनुयायी- यह भी परंपरागत ही होगा... आप चिंता न करें। देवों का दोहरा चरित्र अब गोपन नहीं रहा।
मसीहा- तो आज इस धर्म-सभा में मैं आपका मसीहा स्वयं को अहिंसक घोषित करता हूँ।
अनुयायी-(समवेत्) साधो-साधो... जय हो, जय हो... धम्म-विजय, धम्म-विजय..


मगध की जनता कालाशोक वाले युग से बहुत पहले ही मुक्त हो चुकी थी। चंडाशोक का दृश्य भी अधिक समय तक नहीं टिक सका। प्रियदर्शी को अब सभी जानते हैं। अभी से प्रस्तर मूर्तियों के निर्माण की योजनाएँ बनने लगी हैं। मसीहा ने अंगवस्त्रों का रंग परिवर्तित कर लिया है। पिपली वृक्ष के नीचे शांति है। पत्ते पीले पड़ गए हैं। देवताओं के विरोध का स्वर भी मंद पड़ने लगा है। नये अवतार को मान्यता मिलनी प्रारंभ हो गई है। मगध को अब शीघ्र ही पवित्र होना होगा। नगरवधू को आइटम सौंग के लिए आमंत्रित किया गया है। मंच सज्जा और प्रकाश व्यवस्था में अनुयायी जुटे हैं। मसीहा मृगचर्म पर ध्यान-योग में निमग्न हो गया है।

गुरुवार, 12 जून 2014

ब्रेन-वॉश

(हरिगंधा के अप्रेैल-मई 2014 में प्रकाशित लघुकथा)


महारथी.., तुमने तो कमाल कर दिया! वातावरण से कटु सवालों के तमाम कीटाणु तुमने पलक झपकते ही साफ कर दिए। हमारे चिंताओं का पूर्णतः लोप हो गया है। अब कहीं से भी विरोधी स्वर सुनाई नहीं देते।

प्रजा वत्सल, यह सब तो आपकी बौद्धिक सोच और मार्गदर्शन का ही परिणाम है। हमने तो केवल उसका पालन किया है।

नहीं-नहीं महारथी.., तुम तो हमारे सबसे योग्य दरबारी हो। तुम से पहले, मैंने कई दरबारियों को प्रजा के मस्तिष्क को साफ करने का निर्देश दिया था। लेकिन वे असफल रहे। प्रजा उन सवालों का ज़ोर-ज़ोर से जाप करने लगी थी। लेकिन अब देखो, बिल्कुल शांति है।

शनिवार, 7 जून 2014

नक़ाब

(हरिगंधा के अप्रेैल-मई 2014 में प्रकाशित लघुकथा)

अदब- ज़रा ये तो बताना... तुम नक़ाब क्यों लगाती हो?
अदीबा- बस यूँ ही... अच्छा लगता है। ख़ुद को सेक्योर फील करती हूँ।
अदब- तो क्या वो तमाम लड़कियाँ इनसेक्योर होती हैं, जो नक़ाब नहीं लगातीं?
अदीबा- नहीं... ऐसा मैंने कब कहा?
अदब- तुम्हारी बातों से तो ऐसा ही लगा...

गुरुवार, 22 मई 2014

जन-आंदोलनः अर्थ, निहितार्थ और मीडिया

2004 में एक तेलुगु फिल्म आई थी। फिल्म का नाम था मास। फिल्म के नायक थे- अक्कीनेनी नागार्जुन। पटकथा और निर्देशन राघव लॉरेंस का था। कहानी का नायक अनाथ था। अनाथ तो बेनाम बादशाह में अनिल कपूर भी था। वैसे अनिल कपूर की ही एक और फिल्म है- नायक। 2001 में आई, ये फिल्म मास-मूवमेंट की वास्तविक झांकी प्रस्तुत करती है। बल्कि अन्ना आंदोलन से उभरे अरविंद केजरीवाल में, भारत के युवा मानस ने उसी नायक शिवाजी की छवि देखी थी। नायक फिल्म का नायक भी तो भ्रष्टाचार और अपराध से ही निराश और नाराज़ था। उसने मुख्यमंत्री को इसी मुद्दे पर घेरा था। परिस्थितियों ने उसे एक दिन का मुख्यमंत्री बनाया। फिर मीडिया ने, इस कैमरामैन से रिपोर्टर और रिपोर्टर से एक दिन का मुख्यमंत्री बने शिवाजी को इतना लोकप्रिय बना दिया कि भ्रष्टाचार, अत्याचार, जातिवाद और तमाम तरह से त्रस्त जनता ने उसको अपना उद्धारक मान लिया। शिवाजी जबरन पॉलिटिक्स में घसीट लिया गया। इन सबके बावजूद मैं बॉलीवुड की बजाय टॉलीवुड की फिल्म को तरजीह दे रहा हूँ तो इसका कारण सिर्फ फिल्म का नाम ही है। ख़ैर, फिल्म का नाम दरअसल नायक के नाम पर आधारित है। यानी नागार्जुन ने इस फिल्म में जिस किरदार को जिया है, वो मास है। गुंडों की धुनाई के समय ही सही, लेकिन नायक ने मासकी परिभाषा देने की कोशिश की है। मास की प्रेमिका ने भी हाथ नचा-नचाकर, भौंहें चढ़ा-चढ़ाकर और शब्दों को चबा-चबाकर मास की ख़ूबियों का बखान किया है। लेकिन मैं उस परिभाषा से संतुष्ट नहीं हूँ। साहित्य में वीरगाथा काल को बहुत पहले ही आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने न सिर्फ चिन्हित कर दिया था, बल्कि उसके अवसान को भी रेखांकित कर दिया था। और अब तो बहुत हद तक फिल्मी वीरगाथा काल का भी बॉलीवुड से लोप होने को है। इसलिए मास की टॉलीवुडीय परिभाषा को स्वीकार नहीं किया जा सकता। लिहाजा मास मूवमेंट और मास मीडिया के अंतर्संबंधों की पड़ताल के लिए अभी मैं जिस सतही प्रस्थान बिन्दु पर हूँ, वहाँ से इस गंभीर विषय की गरिमा को बरकरार रखना संभव नहीं है। लिहाजा मास मूवमेंट शब्द का वास्तविक अर्थ और जन-आंदोलन के संदर्भ में इसके इस्तेमाल के कारणों की पड़ताल का रास्ता ज्यादा सटीक जान पड़ता है।

मंगलवार, 6 मई 2014

विभ्रम के धुंधलके में सच की तलाश

हां, जीतता कौन है? शुद्ध लाभ किसे होता है? शुद्ध लाभ मतलब अर्थ लाभ, पद्लाभ, प्रतिष्ठा लाभ, सम्मान लाभ या कोई और लाभ? परिभाषाएँ भोथरी हैं। किस रास्ते पर चलोगे तो मंजिल मिलेगी? सोच लो कहीं वही मंजिल न हो, जहां से यात्रा शुरू की हो? और कहीं चलनेवाला ही मंजिल हुआ तो? ...सोचने के कई तरीके, पहलू, अन्दाज़, ढंग और आज़ादी न होती तो कुछ न होता।

कैसी आगी लगाई उपन्यास का कथा नायक साज़िद अपने सपनों और क्रांतिवादिता की रोमांचक दुनिया से बेदखली एवं यथार्थ की पथरीली ज़मीन पर धराशायी होने के बाद पराजय-बोध से मुक्ति के लिए जो तर्क ढूंढता है, वह यही है। यहां कोई ठोस हल, पहल या उत्तर नहीं है। सिर्फ अनुत्तरित प्रश्न हैं और आश्चर्यजनक रूप से द्वंद्वपूर्ण साधु-भाव है। सपनों की राजधानी दिल्ली से विरक्ति और इससे नफ़रत की पराकाष्ठा है- मैं तुमसे पक्का और सच्चा वादा करता हूँ। क़सम खाता हूँ... कि दिल्ली कभी नहीं लौटूँगा... मतलब रहने या काम करने...
...
इस शहर पर थूक दो।

मंगलवार, 15 अप्रैल 2014

अविश्वसनीय दौर में विश्वसनीयता का सवाल

अब तो ज़माना बदल रहा है। ख़ास तौर से शहरों में माँ-बाप अपने बच्चों की पसंद को तरजीह देने लगे हैं। लव कम अरेंज मैरेज का चलन है। लेकिन ग्रामीण इलाकों में अभी भी शादी का परंपरागत तौर-तरीक़ा ही स्थापित है। ऐसी शादियाँ बिना अगुआ के मुमकिन नहीं हुआ करतीं। अगुआ की भूमिका को समझने का सबसे आसान तरीक़ा तो यही है कि आप किसी मवेशी मेले में जाएँ और वहाँ गाय-भैंस या बैल की बिक्री में जुटे दलाल की बातें सुनें। जैसी बातें वहाँ पर होती हैं, कमोबेश वैसे ही संवाद अगुआ के मुँह से निर्झर की तरह उस वक़्त झड़ते हैं, जब वह किसी विवाह योग्य वर अथवा वधू के बारे में संबंधित पक्ष को बता रहा होता है। अगुआ की छवि कैसी होती है? इसको जानने के लिए लोकगीतों पर भी ग़ौर किया जा सकता है। अगुआ से जुड़ा शायद ही कोई ऐसा लोकगीत आपको मिले, जिसमें उसकी प्रशंसा की गई हो या धन्यवाद दिया गया हो!

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1.      साक्षी है इतिहास ( मार्टिन नीमोलर को समर्पित) जानता हूँ आप जहमत नहीं उठाएँगे अपनी सलीब पर टँगे रहने का लुत्फ बेग़...