सदाचार
का पाठ हमेशा ख़ौफ़ की ज़िल्द में लिपटा रहता है। ऐसा ही रिवाज़ है। यह पाठ हमेशा
बच्चे, बुज़ुर्ग और कमज़ोर तबके को ही पढ़ाया जाता है। ख़ासतौर से ख़ुदा का ख़ौफ़
और सामाजिक मर्यादा। प्रभुवर्ग का गुनगान भी रिवाज़ ही है। रिवाज़ यानी परंपरा।
जिस कर्म या बात की दुहाई परंपरा के नाम पर दी जाती है, वह सनातन नहीं होती। कभी वह
भी पहली बार ही किसी के द्वारा किसी पर आरोपित की गई होती है। बाद में बार-बार
दुहराव होता है। लोग उसे सही और ज़रूरी मान बैठते हैं। फिर उसे परंपरा या रिवाज़
का नाम दे दिया जाता है। ऐसे बहुत से रिवाज़ थे, जो अब नहीं हैं। बहुत से रिवाज़
ऐसे हैं, जिन्हें आज भी हमने बंदरिया की तरह छाती से चिपका रखा है। इस बात से आप
इनकार नहीं कर सकते कि ज़्यादातर रिवाज़ पारिवारिक अथवा सामाजिक गौरव की आड़ में ही
जीवनी-शक्ति पाते रहे हैं, जबकि वास्तव में वे मानव-जाति के लिए अभिशाप थे। जौहर, सतीप्रथा, पर्दा-प्रथा, बाल-विवाह
जैसे रिवाज़ इसी श्रेणी में जगह पाते हैं। कई बार प्रभुवर्ग अपने कुकृत्यों को
छुपाने के लिए परंपरा की आड़ लेता है। कई बार किसी को दोषी साबित करने के लिए भी
परंपरा की आड़ ली जाती है। सीता का दोबारा वन-गमन और उसी के आलोक में स्त्रियों की
यौन-शुचिता का मसला परंपरा बन जाती है। कहने की ज़रूरत नहीं कि अपने शुरुआती दौर
में बंदिशें, या तो ख़ौफ़ या फिर मर्यादा की आड़ लेकर ही आती हैं। बाद में यह रूढ़
हो जाती हैं और सनातन सत्य के रूप में स्थापित भी।
परंपराओं
का बनना कभी थमता नहीं। समय के हिसाब से अप्रासंगिक होने के बाद परंपराओं का लोप भी
सामान्य बात ही है। यह सतत् चलने वाली प्रक्रिया है। परंपराएँ सिर्फ पारिवारिक,
सामाजिक या राजनीतिक ही नहीं होतीं, बल्कि यह जीवन और सभ्यता से जुड़े सभी
क्षेत्रों में विद्यमान रहती हैं और कभी मार्गदर्शक तो कभी बाधक तत्व की भूमिका
बख़ूबी निभाती रहती हैं। मीडिया में भी कुछ परंपराएँ अपनी जड़ें जमा चुकी हैं। कुछ
की तिलांजलि दी जा चुकी है तो कुछ नई ने अपनी जगह बना ली है। परंपराओं के बनने की
प्रक्रिया जितनी मंथर और मज़बूत होती है, उतनी ही उसके विलोपीकरण की गति भी। पिछले
दो दशकों में मीडिया की आंतरिक संरचना तेज़ गति से बदली है। नैतिकता का संकोच टूटा
है। बौद्धिकता के बोझ में कमी आई है। व्यवसायिकता हावी हुई है। मुनाफ़े की
ख़्वाहिश ने ‘कॉस्ट कटिंग’ और कम संसाधन में अधिक ‘आउट-पुट’
की मांग को न्यायसंगत ठहराया है। वैसे इस वक़्त हम श्रम के शोषण का रोना रोने के
मूड में नहीं हैं। श्रम शोषण की समस्या नई नहीं है। बल्कि यह रिवाज़ बेहद पुराना
है। फिलहाल हम यह जानना चाहते हैं कि आख़िर किस तरह और क्यों समाजिक बुराइयों के
ख़िलाफ जागरण को उद्धत मीडिया, ख़ुद एक बुराई में तब्दील हो गया है?
आख़िर कैसे धर्म और अंधविश्वास के सामने यह नतमस्तक हो गया?
कर्म की शिक्षा देने वाला मीडिया आख़िर क्यों तंत्र-मंत्र और चमत्कार का उपासक बन
गया? जब भी इन प्रश्नों का उत्तर ढूंढने की हमने कोशिश की, ‘टीआरपी’ हमारे
सामने आ खड़ी होती है।
टीआरपी
ने ही मीडिया को बड़बोला बनाया है। कभी ऐसा माना जाता था कि “बड़े
बड़ाई न करे, बड़े न बोले बोल, रहिमन हीरा कब कहे, लाख टका मो मोल?”
लेकिन अब ‘अपनी प्रशस्ति आप करो’ की परंपरा मज़बूती से अपने पैर जमा
चुकी है। मुझे याद है यह शायद साल 2007 की घटना है। तब मैं ईटीवी में कार्यरत् था।
टीआरपी का चिट्ठा हमारे पास आता था। हमारे लिए उसका उपयोग इतना ही था कि हम अपने
प्रोग्राम की रेटिंग वगैरह देखें और प्रोग्राम को और बेहतर करने की कोशिश करें।
चैनल नंबर वन ही रहा करता था (तब ज्यादा प्रतिस्पर्धी चैनल नहीं थे।), लेकिन कभी
अपने दर्शकों को यह बताने की ज़रूरत महसूस नहीं हुई कि हम नंबर वन हैं। हमारा
अर्थात संस्थान का मानना था कि अपनी बड़ाई आप करने से संस्थान का मूल्य और मान
दोनों घटता है। अपनी टीआरपी का ढिंढोरा पीटने वाले चैनल्स, तब हमारी दृष्टि में
जोकर और जमुरे जैसी हैसियत रखते थे। जब किसी चैनल पर ढोल-नगाड़ों के साथ नंबर-1 का
ग्राफिक्स उभरता तो हमलोग ठहाका लगाते। हमें इस बात का गुमान था कि हम ऐसे चैनल
में काम करते हैं, जहाँ शो-ऑफ का कल्चर नहीं है। लेकिन पता नहीं कब और कैसे, हम भी
उसी घुड़दौड़ में शामिल हो गए। पहले ‘चैनल आईडी’ के
नीचे ‘नंबर-1’ का ‘बबल’ चिपका। फिर बाद में ‘ब्रेक’ के दौरान नंबर-1 का ग्राफिक्स ‘रन’
होने लगा। और फिर हुआ यूँ कि कुछ ही दिनों बाद यह हमारे न्यूज़ बुलेटिन का हिस्सा
बन गया। हम हर हफ्ते अपने चैनल के ‘नंबर वन’ बनने पर थोड़ा अलग किस्म का ‘एंकर
लिंक’ लिखने में घंटों व्यस्त रहने लगे। दर्शकों का धन्यवाद करने
लगे, उन्हें सच दिखाने का आश्वासन देने लगे(चोर की दाढ़ी में तिनका)। उनसे अपना सहयोग
और साथ बनाए रखने की हार्दिक अपीलें करने लगे। अब यह सब ढर्रा बन चुका है। हमें
ख़ुद की प्रशंसा करने में हिचक नहीं होती, झिझक नहीं होती। हम बिल्कुल बिंदास और
उत्फुल अंदाज़ में यह ढिंढोरा पीटते हैं कि देखो हमने बाकी तमाम चैनल्स को पछाड़
दिया है।
आत्म-प्रशस्ति
की यह परंपरा सिर्फ इसी एक मामले में नहीं है। चाहे सीमा पर पड़ोसी से संघर्ष की
ख़बर हो, बाढ़ या भूकम्प या किसी अन्य आपदा या हादसे की ख़बर हो। टीआरपी के चक्कर
में अब बड़ी और त्रासद घटनाओं को भी हास्यास्पद बनाना परंपरा बन गई है। अब आपदा की
विभीषिका से ज्यादा फोकस कहीं और ही होता है। इससे कोई लेना-देना नहीं कि राहत-कार्य
कैसे चल रहा है? ज़रूरतमंदों तक मदद क्यों नहीं पहुँच पा रही है?
प्रभावित इलाकों में प्रशासन पूरी मुस्तैदी के साथ जुटा है या नहीं?
इन प्रश्नों से मीडिया संस्थान या मीडियाकर्मियों का जुड़ाव अब नहीं रहा। बिहार
में कोसी की त्रासदी और अभी उत्तराखंड की त्रासदी के दौरान मीडिया का जो रवैया सामने
आया, उसके आलोक में यह बात और अधिक पुष्ट रूप में हमारे सामने उभरी है और सही
साबित हुई है।
कोसी
त्रासदी के दौरान बाढ़ में फंसे लोगों की तस्वीरें उतारने में व्यस्त मीडियाकर्मी
की संवेदना ऐसी थी कि कोई व्यक्ति मकान ढहने के बाद किसी पेड़ पर शरण लिए हुए है।
प्रशासन या एनडीआरएफ की टीम अब तक वहाँ नहीं पहुँची है। मीडियाकर्मियों की बोट इत्तेफाकन
वहाँ से गुजर रही है। उनके लिए पेड़ पर जान बचाने के लिए लटका व्यक्ति अच्छा और
सनसनीख़ेज़ विजुअल है। एक्सक्लूसिव न्यूज़ है। पेड़ से लटका व्यक्ति मदद की गुहार
लगाता है लेकिन कैमरे के पास कान नहीं होते। वह सिर्फ देख सकता है। व्यक्ति अंतिम
कोशिश करता है। वह पानी में छलांग लगा देता है। वह मीडियाकर्मी की बोट की तरफ
बढ़ता है। बोट पीछे हटने लगती है। कैमरा संवेदनहीन है। जबकि कई दिनों तक भूखा-प्यासा
पेड़ से लटका रहा व्यक्ति, कुछ दूरी तक बोट का पीछा करता है और फिर भंवर में गुम
हो जाता है। यह दृश्य कैमरे में कैद होते ही कैमरे की बाँछें खिल उठती हैं। टीवी-स्क्रीन
पर उस विजुअल की पैकेजिंग होने से पहले ही प्रोमो शुरू हो गया है- “टीवी
के इतिहास में पहली बार मौत का तांडव लाईव, शाम सात बजे। सिर्फ बकवास टीवी पर।
देखना ना भूलें।” ब्रेक से लौटते ही एंकर मुस्कराते हुए एक बार फिर ताक़ीद करता
है- “हम अपने दर्शकों को एक बार फिर से बता दें कि अगर आप यह देखना
चाहते हैं कि कई दिनों से भूखा-प्यासा, पेड़ से लटका एक व्यक्ति कोसी के भूखे भंवर
में कैसे समा गया? तो शाम सात बजे का हमारा स्पेशल न्यूज़ बुलेटिन देखना न
भूलें।”
शाम
सात बजे ख़बर की शुरुआत ख़बर से नहीं होती। शुरुआत इस दावे से होती है कि हम जो
दिखाने जा रहे हैं, वह सिर्फ हमारे पास ही है। हमारे रिपोर्टर की बहादुरी का
नतीज़ा है। और फिर एक त्रासद मौत, प्रहसन में तब्दील हो जाती है। एक मिनट के शॉट्स
से कभी स्लो, कभी फास्ट, कभी मूवी, कभी स्टिल, कभी ग्राफिक्स तो कभी कलर विजुअल का
ब्लैक एंड ह्वाइट फॉर्म स्क्रीन पर रेंगता रहता है। त्रासदी, बाढ़, जन-जीवन और मौत
के तांडव की बातें तो एंकर की ज़ुबान पर हैं, लेकिन इनकी आवृत्ति कम है। “यह
एक्सक्लूसिव विजुअल सिर्फ हमारे पास है।”, “हमारे संवाददाता बाढ़ प्रभावित क्षेत्र
के एक-एक हिस्से में पूरी मुस्तैदी से तैनात हैं।”, “पल-पल की ख़बर हम आप तक पहुँचा रहे हैं।”,
जैसे जुमलों की आवृत्ति इतनी अधिक है कि आपके अंदर डूबते व्यक्ति के प्रति उभरी
गहरी संवेदना धीरे-धीरे खीझ में बदल रही है। आप अब यह सोच रहे हैं कि काश यह
तस्वीर उतारने वाला भी भंवर में समा गया होता!
बाढ़
अब उतार पर है। इंसान मरी मछलियों की तरह इधर-उधर बिखरे पड़े हैं। मीडियाकर्मी
गिद्धों में तब्दील हो गए हैं। टीवी-स्क्रीन लाशों से अटा पड़ा है। अब ख़बरें
दिखाई नहीं जा रही हैं। लाशें बेची जा रही हैं। टॉप बैंड पर ख़बर नहीं, डिस्क्लेमर
चल रहा है- “तस्वीरें विचलित कर सकती हैं। कमज़ोर दिल वाले टीवी न देखें।”
प्रोड्यूसर खुश हैं। संपादक खुश हैं। रिपोर्टर को बधाई दी जा रही है। अच्छा
परफॉर्म कर रहे हो। अबकि विजुअल्स के मामले में हमने तमाम दूसरे चैनल्स को पीछे
छोड़ दिया है। टीआरपी में जम्प तय है। कोसी की त्रासदी को बरसों बीत गए हैं। वहाँ
अब सबकुछ सामान्य है। लोगों के ज़ख़्म भर चुके हैं। भर रहे हैं। वे त्रासदी में
क्या खोया... को भूलकर अब बिखरी ज़िन्दगी को कैसे समेटा जाए, इस पर विचार में लगे
हैं। टीवी चैनल ने एक्सक्लूसिव विजुअल सहेज कर रखे हैं, न जाने कब कहीं और ऐसी ही
त्रासदी हो। विजुअल आने में देर हुई तो यही विजुअल ठेल देंगे। दर्शक की
स्मरण-शक्ति इतनी मज़बूत नहीं होती कि पुरानी घटनाओं और विभत्स तस्वीरों को स्मृति
में संजोकर रख सकें। अगर ये नौबत नहीं भी आती है तो नई उपलब्धियों के साथ पुरानी
को भी जोड़ देंगे। संस्थान की क्रेडिब्लिटी बढ़ेगी। मौत के जश्न और बाज़ार की यह
परंपरा कब और कैसे बनी? क्या आपको कुछ याद है?
अभी
उत्तराखंड में क्या हो रहा है? तबाही और मौत की ख़बरों के बीच ‘घटनास्थल
पर सबसे पहले पहुँची फलाँ टीवी की टीम’, ‘तांडव की एक्सक्लूसिव तस्वीरें सिर्फ
फलाँ टीवी पर’। मीडियाकर्म मेहनत, हिम्मत और संवेदनशीलता का पेशा है, यह
जानना-समझना अब ज्यादा मुश्किल नहीं रहा। आपने एक विशेष चैनल के उस मुस्टंडे
जाँबाज़ रिपोर्टर को ज़रूर देखा होगा जो आपदा के मारे एक कमज़ोर युवक के कंधे पर
सवार है। कमज़ोर युवक उस जाँबाज़ रिपोर्टर के बोझ से दबा जा रहा है। कैमरा रॉल हो
रहा है। रिपोर्टर त्रासदी से संबंधित पीटीसी में व्यस्त है। पीटीसी धांसू हो, इसकी
पूरी तैयारी है। कैमरा रॉल होने के बाद जैसे ही रिपोर्टर बोलना शुरू करता है, युवक
लड़खड़ाता हुआ धीरे-धीरे घुटने भर पानी में रेंगने लगता है। इस तरह बिल्कुल नये
कलेवर में जीवंत रिपोर्टिंग होती है। नया प्रयोग... त्रासदी को, मौत को, दहशत-वहशत
को एक उत्सव में तब्दील करने का अभिनव प्रयोग। अभी यह गिद्धोत्सव इतनी जल्दी ख़त्म
नहीं होने वाला। उत्तराखंड की यह त्रासदी अब कई महीनों तक न्यूज़ चैनल्स की टीआरपी
के लिए खाद-पानी का बंदोबस्त करती रहेगी। अब प्रत्येक आपदा या त्रासदी पर मीडिया
का गिद्धोत्सव भी परंपरा है। ठीक वैसे ही जैसे नेताओं का, मंत्रियों का हवाई दौरा।
मीडिया
का अब यह परंपरागत सत्य है कि त्रासदी, मौत, बलात्कार, अंधविश्वास, चमत्कार,
वीर-रस वाले संवाद, चुटकुले और ब्लैक ह्यूमर मीडियाकर्म के ज़रूरी हिस्से हैं। इन
सबके बग़ैर टीवी स्क्रीन मध्य-युगीन विधवा स्त्री है। दरअसल यह मीडिया का रतियुग
है। जिस तरह ऐय्याश राजाओं के दरबारी कवि स्त्री के नख-शिख वर्णन को ही
उत्तर-मध्यकाल में कवित्त मानने लगे थे। वैसे ही आधुनिक युग में मीडिया ने स्त्री-शरीर
को वस्तु, मनुष्य की मौत को अवसर और त्रासदी को वरदान में तब्दील कर दिया है। यह
दौर रियलिटी का नहीं, हाईपर रियलिटी का है। यह दौर मूक वेदना का नहीं, रूदन का
नहीं, भोंडे विलाप का है। यह शब्दों के वास्तविक अर्थ का हत्यारा, संवेदनहीनता को
कर्तव्य, झूठ को सच साबित करने और लाशों पर कैटवॉक का दौर है।
आपने
देखा होगा कि एक हज़ार से ज्यादा लोगों की लाशों, अलग-अलग जगहों पर फंसे हजारों
लोगों के साथ ही लाखों बेघर लोगों की स्थिति का जायज़ा लेने पहुँचे रिपोर्टर्स
अचानक चमत्कार के भंवर में समा गए हैं। केदारनाथ मंदिर के आसपास श्रद्धालुओं की
बिखरी लाशों से ज़्यादा अहम घटना, केदारनाथ मंदिर का सुरक्षित बच जाना है। यह महज
इमारत की मज़बूती का मसला नहीं है, यह चमत्कार है। भगवान की शक्ति का जीवंत नमूना।
ईश्वर के अस्तित्व का प्रतीक-चिन्ह है। जब इलाके में कुछ भी सुरक्षित नहीं बचा हो,
मंदिर का बचना चमत्कार है। मीडिया का कन्क्लूजन आने ही वाला है- उत्तराखंड की
त्रासदी में भले ही लाखों लोग बेघर हुए हों, हजारों को जान गंवानी पड़ी हो,
अरबों-खरबों का नुकसान हुआ हो..., लेकिन इस घटना ने नास्तिकों के मुँह पर तमाचा
जड़ दिया है। यह बात अब सिद्ध हो गई है कि भगवान का अस्तित्व है। त्रासदी के पीछे
अनियंत्रित विकास या प्रकृति के साथ छेड़छाड़ या फिर प्रशासनिक लापरवाही नहीं,
बल्कि ईश्वर का कोप है। यह भी पुरानी परंपरा है।
हमें
उम्मीद है, आप यह नहीं पूछेंगे कि ऐसा तो पहले नहीं था, ये परंपराएँ बनीं कब?
परंपराएँ कब बनती हैं, यह पता नहीं चलता। जैसे किसी परंपरा के समाप्त हो जाने का
पता नहीं चलता, वैसे ही किसी परंपरा के अस्तित्व में आने का भी पता नहीं चलता। यह
दबे पाँव आती और जाती है। पहले नैतिकता के आधार पर इस्तीफे की परंपरा थी, अब यह
आपको कभी, किसी मामले में नज़र आती है क्या? पहले महत्वपूर्ण ख़बर को लेकर मीडिया
के रवैये का सकारात्मक असर होता था। प्रशासन और सरकार गंभीर होती थीं। कार्रवाई
होती थीं और कार्रवाई की सूचना पाकर हम ख़ुश होते थे कि हमारी मेहनत रंग लाई। अब ख़बर
प्रसारण से पहले ही हम ‘ख़बर के असर’ का भी बंदोबस्त कर लेते हैं। जब सबकुछ
योजनाबद्ध हो जाता है, फिर टीवी स्क्रीन पर ब्रेकिंग प्लेट भुकभुकाने लगता है।
विजुअल्स प्ले होते हैं। फिर तय अंतराल के बाद ‘ख़बर के असर’
की ब्रेकिंग प्लेट स्क्रीन पर अवतरित हो जाती है। इस तरह हम अपने चैनल की पहुँच और
प्रभाव से अपने दर्शकों पर धौंस जमाने की कोशिश करते हैं। कई बार तो ऐसा भी होता
है कि हम जिस ख़बर को प्रसारित नहीं कर पाते, उसी ‘ख़बर के असर’ की
क्रेडिट लेने में दूसरे चैनलों को पीछे छोड़ देते हैं। आपको तो याद भी नहीं
रहता... लेकिन हम पेशेवर लोग दो-तीन साल पुरानी ख़बरों को भी दिमाग के किसी कोने
में सहेजे रखते हैं। ‘ख़बर का असर’ भी अब परंपरा बन चुकी है। परंपरा भी दरअसल
डॉन्स सिंड्रोम की तरह होती हैं, जिसके मनोवैज्ञानिक असर को देखना-समझना, जटिल
प्रक्रिया के बावजूद बेहद ज़रूरी है। इसका बाहरी प्रभाव उतना ख़तरनाक नहीं होता,
जितना कि आंतरिक।
मीडिया जिन नई परंपराओं की गिरफ्त में आ गया है, वह न
सिर्फ समाज और व्यक्तिक संवेदना की दृष्टि से घातक है, बल्कि ख़ुद मीडियाकर्म के
लिए भी सोचनीय प्रश्न है। यह जो नई परंपराएँ हैं, बाज़ार और मीडिया मालिकान के
हितों के अनुकूल हैं। इन्हें विशेष योजना के साथ अमल में लाया और स्थापित किया गया
है। चमत्कार, भाग्य और भगवान वस्तुतः शोषण की तीन अभिमंत्रित कीलें हैं, जिनकी मदद
से श्रमशील आम-आदमी को बाँध दिया गया है। और इसे परंपरा का जामा पहनाने के बाद
मालिकान आश्वस्त हो उठे हैं और अब किसी फाईव स्टार होटल में ड्रिंक का मज़ा लेने
की तैयारी में हैं। लेकिन हाँ, इन्होंने वैसा कोई बॉडी स्प्रे यूज़ नहीं किया है,
जिसका इस्तेमाल वेटर्स करते हैं... और जिसकी मादक-उत्तेजक गंध किसी आधुनिका को
उनके नितंब पर हाथ मारने और बम चिक बम्म... बोलने पर मजबूर करती हों!!
('सबलोग' के जुलाई अंक(2013) में प्रकाशित)

खूब लिखा है रिज़वी साहब. पर इसे पढने के बाद कोई टेलीविज़न न्यूज़ चैनल आपको अपने दरवाजे पर भी फटकने नहीं देगा | ऐसे ही बेबाक रहो. सच्चे रहो. खुश रहोगे.
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