नहीं-नहीं, आप इस मुग़ालते में न रहें कि मैं मोदी को
लेकर सचमुच परेशान हूँ। पेशेवर मीडियाकर्मी हूँ। बयान तो आते-जाते रहते हैं। शिफ्ट
ख़त्म, मुद्दा ख़त्म और टेंशन भी ख़त्म। ड्यूटी के दौरान बयान का छिन्द्रान्वेषण
करना, बात का बतंगड़ बनाना, हमारी जिम्मेदारी में शुमार है। यह करना ही पड़ता है। पक्ष-विपक्ष
के नेताओं को फुटेज देने के मामले में हम पूरे फ़राख़दिल हैं। इसके दो फ़ायदे हैं-
पहला तो यही कि ख़बरों के कबाड़ख़ाने में घुसने और हाथ-दिमाग़ को गंदा करने से
मुक्ति मिल जाती है, दूसरे एंकर को एक्सपोज़र मिलता है और टॉक के लिए आए नेताओं से
संपादकों के संबंध प्रगाढ़ होते हैं, जो कालांतर में चैनल और उसको चलाने वालों के
हित में कार-आमद साबित होते हैं।
सामाजिक मुद्दों या सरोकारों से जुड़ी ख़बरों को ट्रीट
करने में ज़्यादा श्रम की ज़रूरत पड़ती है। क्राईम से जुड़ी ख़बरें भी अब
नाट्य-रूपांतर के बिना बिल्कुल प्रभावहीन और रद्दी टाईप लगती हैं। हाँ, दो क्षेत्र
ऐसे हैं, जिनसे जुड़ी ख़बरों में दर्शकों की दिलचस्पी तो होती ही है, उनके
ट्रीटमेंट के लिए भी ज़्यादा हाथ-पैर नहीं मारना होता। ये दो क्षेत्र हैं- मनोरंजन
और राजनीति। मनोरंजन से जुड़ी ख़बरों का इम्पैक्ट अल्पजीवी होता है। ख़बर ख़त्म,
बात ख़त्म। लेकिन राजनीति से जुड़ी ख़बरें अपना प्रभाव लंबे समय तक रखती हैं। यह
प्रवृत्ति हमारे जीन में है। मुल्क का बच्चा-बच्चा राजनीतिक रूप से परिपक्व और
दृष्टि-सम्पन्न है। इसलिए किसी चैनल पर सियासी बयान या बयान पर डिबेट के बाद ही
ख़बर ख़त्म नहीं हो जाती। बल्कि यहाँ से बतर्ज़ बाथरूम-सिंगर, घरेलू-विश्लेषक अपनी
जिम्मेदारी संभाल लेते हैं और फिर उस बयान के दूरगामी परिणाम और परिमाण पर
चाय-दुकान से लेकर सोश्यल साइट्स तक पर विमर्श शुरू हो जाता है।
यह चुनावी साल नहीं है, फिर भी माहौल चुनावी है। अगर आम
चुनाव को ‘फ़िल्म’ या ‘ड्रामा’
मान लें तो फिलवक़्त इसके सोलो हीरो नरेन्द्र मोदी ही हैं। मोदी में मीडिया,
उद्योग और सियासी-जगत की इतनी दिलचस्पी क्यों है? यह प्रश्न
हमारे लिए ज़्यादा अहमियत नहीं रखता। मोदी जीतेंगे या कि हारेंगे!
इससे भी हमारी सेहत पर ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला। राजा कोई भी बने, मजदूर तो
मजदूर ही रहेगा। हमारी समस्या कुछ और ही है। नरेन्द्र मोदी ने अभी कुछ दिनों पहले
ही ख़ुद को ‘हिन्दू राष्ट्रवादी’ बताया
था। उससे पहले भी अपनी प्राथमिकताएँ गिनाते वक़्त वे बारहा इस बात पर ज़ोर देते
रहे हैं कि उनकी पहली प्राथमिकता राष्ट्र है। वह देश का विकास चाहते हैं। भारत को
विकसित राष्ट्र बनाना चाहते हैं। नरेन्द्र मोदी चूँकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से
जुड़े हैं, लिहाजा हिन्दू हितों को लेकर आग्रही भी होंगे। ऐसा मेरा विचार है। शायद
इसीलिए वे बार-बार अमेरिका जाना चाहते हैं, ताकि वहाँ बसे हिन्दू भाइयों को भी
विकास का संदेश दे सकें। अमेरिका ने जब वीज़ा अर्जी को नकारा तो इन्होंने वीडियो
कॉन्फ्रेंसिंग की मदद ली। देश छोड़कर विदेशों में जा बसे लोग अपने ही भाई-बंधु
हैं। उनके प्रति अनुराग बुरी बात नहीं है।
हम अब तक यही मानते आए थे, लिहाजा जब भी किसी ने
नरेन्द्र मोदी के अमेरिका जाने की कोशिश का मज़ाक उड़ाया तो हमें कतई अच्छा नहीं
लगा। बल्कि जब पहले-पहल यह ख़बर आई थी कि अमेरिका ने मोदी को वीज़ा देने से मना कर
दिया है तो बहुत बुरा लगा था। दिल-ही-दिल में मैंने यह भी तय कर लिया था कि अब जो
हो जाए, लेकिन मैं कभी अमेरिका नहीं जाउँगा। जो देश, हमारे किसी नेता का अपमान करे,
उस देश में क़दम रखना भी हमारे लिए अपमानजनक है। सच तो यह है कि वीज़ा से इनकार
वाली ख़बर पर भी मुझे यक़ीन नहीं हुआ था। कई बार वीज़ा-अर्ज़ी खारिज होने की बात
विपक्षियों की साजिश लगी थी, क्योंकि मैं कभी यह सोच ही नहीं सकता था कि नरेन्द्र
मोदी जैसा स्वाभिमानी और राष्ट्रवादी व्यक्तित्व अमेरिकी इनकार के बाद भी बार-बार
वीज़ा-अर्ज़ी लगा सकता है।
लेकिन ताज़ा घटनाक्रम ने मुझे झकझोर दिया है। मेरे
विश्वास की धज्जियाँ उड़ गई हैं। सच कहूँ तो अब मुझे अपने राजनीतिक विवेक पर भी
भरोसा नहीं रहा। सूचना-सूत्र इतना विश्वसनीय है कि संदेह की कोई गुंजाईश शेष नहीं
रही है। नरेन्द्र मोदी जिस दल के नेता हैं, उसी दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने अपनी यात्रा
के दौरान नरेन्द्र भाई मोदी के पक्ष में अमेरिकी सरकार से सिफारिश की है। वहाँ के सांसदों
से भी मिल रहे हैं और उनसे अनुरोध कर रहे हैं कि मोदी को अमेरिका आने की इजाज़त
मिलनी चाहिए, उन्हें वीज़ा दिया जाना चाहिए। इसी ख़बर ने मेरी विचार-सरणी को बिगाड़
दिया है।
मैं अचंभे में हूँ कि आख़िर अमेरिका में ऐसा क्या है,
जिसकी ख़ातिर नरेन्द्र मोदी अपने स्वाभिमान की क़ीमत पर भी वहाँ जाना चाहते हैं?
अमेरिका में बसे भारतियों से सहानुभूति या प्रेम तो ठीक है, लेकिन वे भारत में
चुनाव के दौरान वोट तो डाल नहीं सकते! लिहाजा वोट के लिए लोगों को
गोलबंद करने जैसी बात भी नहीं होगी। चुनाव तो भारत में होने हैं, वोटिंग भारत की
जनता को ही करनी है। बीजेपी ने उन्हें चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष भी भारत के
लिए ही बनाया है। फिर भी नरेन्द्र मोदी अमेरिका जाने को उतावले क्यों हैं?
क्या इसी काम के लिए ख़ास तौर से राजनाथ सिंह को अमेरिका भेजा गया है? अगर
यह सही है तो फिर आरएसएस अब तक चुप क्यों है? क्या
मोदी की अमेरिका-परस्ती भारत के स्वाभिमान के ख़िलाफ़ नहीं है?
एक स्वयंभू राष्ट्र के नेता का, इस तरह किसी दूसरे देश के प्रति अनुराग अथवा
सम्मोहन ख़तरनाक नहीं है?
कहीं ऐसा तो नहीं कि नरेन्द्र मोदी को अगर अमेरिकी
सर्टिफिकेट नहीं मिला तो भारत की जनता लोकसभा चुनाव में नकार देगी?
हमें नहीं लगता कि यह सच है। (हालांकि अब मैं दावे के साथ ऐसा नहीं कह सकता। इस
हादसे के बाद मेरा विश्वास मुँह के बल गिरा धरती सूँघ रहा है।) भारत की जनता ने कभी
अमेरिका से पूछकर वोटिंग नहीं की है। अमेरिका कथित तौर पर विकसित राष्ट्र है। उसे
नरेन्द्र भाई मोदी से विकास के फॉर्मूले की भी ज़रूरत नहीं है। अगर ज़रूरत होती तो
वह वीज़ा देने से मना क्यों करता? अगर आरएसएस और बीजेपी क्रमशः
राष्ट्रवादी संगठन और पार्टी हैं, तो उन्हें हिन्दू(संकीर्ण अर्थों में)
राष्ट्र-निर्माण के बारे में सोचना चाहिए। स्वदेश के उत्थान के बारे में सोचना
चाहिए। लेकिन पिछले एक दशक से वह अमेरिका और उसके वीज़ा के बारे में सोच रही है।
आख़िर क्यों?
तमाम सवालों से जूझते वक़्त बार-बार मेरे जेहन में एक
गंदी सी आशंका सिर उठाने लगती है- “कहीं हमारा देश और इसका लोकतंत्र
अमेरिका के हाथों गिरवी तो नहीं!” अगर मेरी यह गंदी आशंका ग़लत है
तो फिर भाई मोदी और उनका दल अमेरिकी सर्टिफिकेट के लिए क्यों उतावले हैं?
इसी कड़ी में मुझे डेढ़ दशक पहले का चुनावी दृश्य याद आता है। तब तमाम सियासी दल ‘मुस्लिम
वोट की हड्डी’ के लिए जामा मस्जिद के इमाम बुख़ारी के सामने दुम
हिलाया करते थे और वह दढ़ियल अपनी दाढ़ी से उनके लिए वर्चुअल वोट झाड़ दिया करता
था और वे संतुष्ट होकर प्रचार में जुट जाते थे। तो क्या यह मान लूँ कि भारत के
कथित धर्म-निरपेक्ष दलों के लिए डेढ़ दशक पहले तक जो हैसियत बुख़ारी की थी, अब राष्ट्रवादियों
के लिए वही हैसियत अमेरिका की हो गई है?
मैं अब भी सशंकित हूँ। मैं चाहता हूँ कि यह धारणा ग़लत
साबित हो। हमारा स्वाभिमानी, ‘हिन्दू-राष्ट्रवादी’
विकास-पुरुष नेता ऐसा नहीं हो सकता। मेरी दिली तमन्ना है कि मैं ऐसा सपने में सोच
रहा होऊँ! और अगर यह हकीकत है, तो फिर मुझे विश्वास है कि नरेन्द्र
मोदी अभी अचानक उठेंगे और सिंह की तरह दहाड़ते हुए अमेरिका को उसकी औक़ात बताने
वाले लहज़े में मेरी तरह यह घोषणा कर देंगे कि वे ईसाइयों की धरती पर कभी अपने
पवित्र पैर नहीं रखेंगे! क्या ऐसा नहीं हो सकता?
आप मानें या न मानें, मुझे पूरा
विश्वास है कि जिस तरह मोदी ने पलक झपकते ही उत्तराखंड में फंसे पन्द्रह हज़ार
गुजरातियों को संकट से उबार लिया था, उसी तरह मुझे भी वे इस गुंजलक से
मुक्त ज़रूर करेंगे। वैसे एक बात और मेरे जेहन में आ रही है कि कहीं ऐसा तो नहीं
कि अमेरिका में नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता से वहाँ की निकम्मी सरकार डर गई हो और
उसको लगता हो कि अगर मोदी ने यहाँ पैर रखे तो फिर ओबामा को हटाकर, लोग मोदी को ही अमेरिका
का राष्ट्रपति बना देंगे! मुझे तो वीज़ा देने से इनकार करने
के पीछे ओबामा का यही भय नज़र आ रहा है।
*31अगस्त को दैनिक जनसत्ता के 'समांतर' कॉलम में प्रकाशित।

सब मोदी जी के पीछे ही पड़े हुए हैं!!
जवाब देंहटाएंनये लेख : जन्म दिवस : मुकेश
आखिर किसने कराया कुतुबमीनार का निर्माण?
http://epaper.jansatta.com/c/1569339
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