देवर्षि नारद का नाम तो
आपने सुना ही होगा। धार्मिक वांग्मय तो उनके कारनामों से भरा-पड़ा है। पत्रकारिता
का आदि अथवा आदर्श पुरुष भी यही हैं। बहुत से विद्वानों ने रामायण के हनुमान और
महाभारत के संजय को भी इस पद के दावेदारों में शुमार किया था, लेकिन कई कारणों से
नारद ही इस पद के निर्विवाद अधिकारी करार दिए गए। पहली बात तो यही कि नारद ब्रह्मा
के मानस पुत्र हैं। जिस पवन के सुत हनुमान हैं, वही पवन इनकी पादुका यानी ‘पैर का जूता’
हैं। हनुमान की दुनिया राम तक ही सीमित रही। उनको रिपोर्टिंग का भी एक ही बार मौका
मिला। वह श्रीलंका में सीता का पता लगाने के लिए भेजे गए थे। लेकिन वहाँ उन्होंने
जिस तरह से पत्रकार की भूमिका के निर्वाह में कोताही बरती, वह जगजाहिर है। पत्रकार
का काम तो शब्दों और संवादों से आग लगाना होता है, इन्होंने शब्द की बजाय सचमुच के
आग से काम लिया। जबकि नारद मुनि के मुँह से कभी कटु बोल नहीं निकले। वह तो तीखी से
तीखी बात भी मुस्कराते हुए कह जाते थे। इन्होंने जो कुछ भी किया, शब्दों की मदद से
ही किया। इन्होंने कभी अपनी सीमा तय नहीं की। कभी भी एक ठौर नहीं ठहरे। तीनों लोक
नापते रहे। ज्ञान और विद्या का शायद ही कोई क्षेत्र हो, जिन पर इनकी पकड़ न हो! ‘नारायण-नारायण’
की रट लगाते रहने के बावजूद नारद ने अपनी पैठ और पूछ समाज के सभी वर्गों में बना
रखी थी। देव ही नहीं, मानव और दानव भी इनके प्रशंसक थे। वाणी तो मधुमय थी ही, वीणा
बजाने में भी ये महारथ रखते थे।
नारद के पक्ष में सबसे
मज़बूत तथ्य यह है कि वे विपरीत परिस्थितियों में भी अविचलित रहते थे। महाभारत के
दौरान संजय की रिपोर्टिंग जहाँ बिल्कुल सपाट और नीरस रही थी, वहीं नारद की
रिपोर्टिंग आधुनिक ‘पेज-थ्री’ के मुक़ाबले बीस ही ठहरती है। महाभारत की बिसात
बिछ जाने के बाद रिपोर्टिंग के लिए संजय का चुनाव हुआ था। हनुमान को भी सीता-हरण
के बाद ‘शॉर्ट टर्म’ के लिए ही रिपोर्टिंग की जिम्मेदारी सौंपी गई
थी। जबकि नारद इस मामले
में ‘फुल टाईमर’
हैं। प्रभु वर्ग में इनकी सीधी पैठ है। भगवान के ये कृपापात्र ही नहीं, लीला-सहचर
भी हैं। कहने की ज़रूरत नहीं कि भगवान की लीला के लिए ये न सिर्फ ज़मीन(भूमिका)
तैयार करते हैं, बल्कि लीला के लिए ज़रूरी साज़ो-सामान भी जुटाते हैं। नारद का
अवतरण भी प्रभु के आगमन से पहले होता है। नारद जब लीला के लिए बिसात बिछा देते हैं
तो मोहरे चलने के लिए प्रभु प्रकट होते हैं। क़िस्सा-कोताह ये कि जन्म से लेकर
कर्म तक में उत्कृष्टता और अभिजात्य गुणों के कारण पत्रकारिता के आदि एवं आदर्श
पुरुष नारद ही ठहरते हैं।
बाक़ी मामलों में भले
ही पुरानी लीक टूटी या छोड़ी गई हो, लेकिन पत्रकारिता के मामले में ऐसा नहीं हो
सका है। पत्रकार आज भी देवर्षि नारद के पद-चिन्हों पर ही चल रहे हैं। आम चुनावों
के लिए अभी से लीला-भूमि तैयार की जा रही है। सियासी दलों के मैदान में प्रत्यक्ष
कूदने से पहले मीडिया ने माहौल बनाना शुरू कर दिया है। लोहा गर्म किया जा रहा है,
प्रभु सीधे हथौड़ा लेकर अवतरित होंगे। नारद की तरह ही आधुनिक मीडिया के तमाम
महारथियों की पैठ प्रभु-वर्ग में है। इनकी समाज के प्रत्येक वर्ग पर पकड़ भी है और
वक़्त-बेवक़्त ये उनकी नब्ज़ भी टटोलते ही रहते हैं। कुछ आकस्मिक घटनाओं और हादसों
को छोड़ दें तो पिछले कुछ महीनों से सभी न्यूज़ चैनलों पर एक ही रिकॉर्ड लगातार बज
रहे हैं। दर्शक बोर न हों या असली मंशा लोगों पर जाहिर न हो जाए, इसलिए सावधानी भी
बरती जा रही है। पटकथा में संवादों को थोड़ा ऊपर-नीचे, आगे-पीछे या एक-दो नये
पात्रों का सृजन कर या कभी-कभार नई घटनाओं को जोड़कर, नयापन लाने की कोशिशें भी
साफ नज़र आती हैं। लेकिन सभी के मूल में एक ही लक्ष्य है- आम चुनाव 2014 के लिए
लीला-भूमि तैयार करना।
जैसे नारद ‘नारायण-नारायण’
का जाप करते रहते थे, ठीक वैसे ही आधुनिक मीडिया के हरावल ‘नमो-नमो’
कर रहे हैं। मोदी ने ये कहा, मोदी ने वो कहा। मोदी ने ये क्यों कहा? मोदी ने वो क्यों कहा? मोदी के ये कहने का आशय क्या है? मोदी ने ऐसा कह कर क्या साबित करने की कोशिश की
है? क्या मोदी राम-कार्ड खेलेंगे? क्या मोदी मुसलमानों को भी अपने साथ लेंगे? मोदी ने जब टोपी नहीं पहनी तो फिर रमज़ान की
मुबारकबाद कैसे दे दी? गुजरात दंगों पर मोदी
ने माफी क्यों नहीं माँगी?
मोदी ने 2002 में गुजरात में जो कुछ भी हुआ, उसे जायज़ कैसे ठहरा दिया? ये ‘कुत्ते
का पिल्ला’ शब्द किसके लिए और
क्यों इस्तेमाल किया गया? ‘बुर्क़ा’
के ज़िक्र का मतलब क्या है?
मोदी कब, क्या और क्यों कह रहे हैं? मोदी
ने आडवाणी के साथ छल क्यों किया?
क्या मोदी संघ परिवार के लिए तुरूप का पत्ता हैं?
क्या सचमुच मोदी बीजेपी की नैया लोकसभा चुनाव में पार लगा सकेंगे? मोदी ‘ही-मैन’ हैं। मोदी सरदार पटेल हैं। मोदी ये हैं, मोदी वो
हैं।
आप सोच रहे होंगे कि
मैं कहाँ भटक रहा हूँ? मैं भटक नहीं रहा।
मैं तो आपको आधुनिक लोकतंत्र के चौथे मज़बूत सत्ता केन्द्र की वास्तविकता (चाहें
तो सनातन परंपरा कह सकते हैं!)
से अवगत कराने की कोशिश कर रहा हूँ। इसी स्तम्भ के अंतर्गत(जून अंक में) हमने ‘पीत पत्रकारिता’
के एक नये रूप ‘च्युइंगम जर्नलिज्म’ की चर्चा की थी और रही ‘प्रोपगेंडा सेटिंग’
की बात तो यह काफी पुराना टर्म है और आप सभी इससे वाक़िफ़ भी हैं। फिलवक़्त मीडिया
के लिए मोदी ‘च्युइंगम’ ही हैं। तमाम मीडिया-महारथी अपनी-अपनी सुविधा के
हिसाब से अलग-अलग शैली में ‘मोदी’ ही चबा रहे हैं। अख़बारों का हाल भी ऐसा ही है।
सभी एक ही अघोषित एजेंडे पर काम कर रहे हैं। ज़्यादा दिन नहीं हुए, जब ‘पेड न्यूज़’
को लेकर बवाल मचा था। न्यूज़ के लिए ‘पे’ करने वालों से लेकर ‘स्लॉट’
बेचने वाले संपादक तक, सभी निराश और नाराज़ दिखे थे। सरकार भी गंभीर हुई थी। लंबी
बहस चली, खंडन-मंडन और पक्ष-विपक्ष के बाद ही नैतिकता की दुहाई के साथ इस एपिसोड
को बंद कर दिया गया। पिछले आम चुनाव में ‘पेड
न्यूज़’ की जगह एक नई प्रवृत्ति ने ले ली। किसी
उम्मीदवार के ख़िलाफ ख़बर नहीं छापने या दिखाने के एवज़ में वसूली की गई। हंगामा
तो इस पर भी हुआ, लेकिन यह ज़ोर नहीं पकड़ सका। बड़ा तर्क यह था कि किसी अख़बार या
न्यूज़ चैनल को क्या छापना या दिखाना है, वह उसकी संपादकीय टीम ही तय कर सकती है। आप
‘डिक्टेट’
नहीं कर सकते। ऐसे में यह दावा भी खारिज हो जाता है कि अमुक चैनल या अख़बार ने
फलाँ नेता के आपराधिक रिकॉर्ड या उसके व्यक्तित्व के काले अंश अथवा भ्रष्टाचार के
आरोपों की जानकारी से जनता को जान-बूझकर महरूम रखा। हालांकि खुसर-फुसर की शुरूआत
ने ही मीडिया मुग़लों को सचेत कर दिया और तभी से नई युक्ति की तलाश शुरू हो गई थी।
‘च्युइंगम जर्नलिज़्म’ ही वह नई युक्ति है, जिसकी मदद से अब मीडिया न
सिर्फ ‘प्रोपगेंडा’
सेटिंग में जुटा है, बल्कि वह जनमत को प्रभावित कर दल-विशेष या व्यक्ति-विशेष को ‘हाई-लाईट’
भी कर रहा है। मक़सद एक ही है- किसी बात को इतनी बार दोहराओ कि लोगों की ज़ुबान पर
चढ़ जाए। यह शुद्ध विज्ञापन शैली है। जब आप कोई विज्ञापन देखते, सुनते या पढ़ते
हैं तो आपके मस्तिष्क में उसकी त्वरित प्रतिक्रिया नहीं होती। यह आपके अवचेतन में
पहले धीरे-धीरे अपनी पैठ बनाता है और फिर कालांतर में आपकी चेतना पर हावी होने
लगता है। आपको याद होगा- जब घड़ी डिटर्जेंट का प्रचार शुरू हुआ था तो लोग उसका मज़ाक
उड़ाते थे और कहते थे कि बताइए यह भी कोई बात है- ‘पहले
इस्तेमाल करें, फिर विश्वास करें’।
कह तो ऐसे रहे हैं, जैसे पहले इस्तेमाल करने के लिए मुफ़्त में डिटर्जेंट देंगे और
‘क्वालिटी’
का विश्वास होने के बाद ही लोगों से पैसे लेंगे!
यही क्यों? तमाम प्रोडक्ट बाज़ार
में आते ही विश्वसनीय नहीं हो जाते। बार-बार विज्ञापन की मदद से इन्हें ‘कंज्यूमर’
के मन-मस्तिष्क में बैठाया जाता है और फिर यह आपके घरों में पहुँचने लगते हैं।
आपको ज़रूरी लगने लगते हैं। आजकल किसी सियासी दल अथवा नेता को चर्चित चेहरे में
तब्दील करने के लिए मीडिया इसी युक्ति का सहारा ले रहा है।
उत्तराखंड की त्रासदी
में भी मोदी के लिए एंगल ढूंढ निकाला गया। मोदी द्वारा उत्तराखंड में फंसे गुजराती
तीर्थयात्रियों को सकुशल बाहर निकालने के लिए बिल्कुल ‘ही-मैन’ टाईप
रेस्क्यू ऑपरेशन। यह अलग बात है कि शिगूफा छोड़ने से पहले उसकी तथ्यात्मकता और
तार्किकता की पड़ताल नहीं की गई, लिहाजा हम-आप आसानी से इस चुटकुले को समझ गए।
बीजेपी ने 2014 के चुनावों के लिए प्रचार अभियान समिति का गठन किया और कमान मोदी
को सौंपी तो ख़बर ऐसे परोसी गई, मानो नरेन्द्र मोदी को बीजेपी की तरफ से
प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया गया हो!
मीडिया ने इतनी ज़ोर से चीखना शुरू किया कि कान झनझनाने लगे। लगा कि मुल्क में कोई
सियासी तूफान आ गया है, या कि आने ही वाला है। और भी बहुत सी बातें हैं। आप वाक़िफ़
हैं, लिहाजा यहाँ दुहराव की ज़रूरत नहीं है। हाँ, यह दलील भी पेश की जा सकती है कि
भई, मीडिया सिर्फ मोदी की स्तुति में तो लगा नहीं है! बहुत सी ऐसी ख़बरें भी पूरे ज़ोर-शोर से
दिखाई-बताई जा रही हैं, जो मोदी के पक्ष में नहीं जातीं। जैसे अभी कुछ दिनों पहले
किसी अमेरिकी न्यूज़ एजेंसी के किसी पत्रकार को दिए इंटरव्यू में नरेन्द्र मोदी ने
कहा कि सन 2002 में जो उन्होंने किया, वह बिल्कुल जायज़ था। अगर उन्होंने वैसा
नहीं किया होता तो उन्हें अफसोस होता। न्यूज़ चैनल्स पर इसको लेकर बड़े-बड़े
डिस्कशन शुरू हुए। ‘कुत्ता’ शब्द के निहितार्थ पर भी चर्चा हुई और एस्टैब्लिश
हुआ कि ‘कुत्ता’ शब्द धर्म विशेष के लोगों के लिए ही इस्तेमाल
किया गया था। ख़ुद दीपक चौरसिया तक ने उस दिन नरेन्द्र मोदी के ख़िलाफ़ तथ्यों को
रखा। स्थिति यहाँ तक जा पहुँची कि उन्होंने बीजेपी की प्रवक्ता को बेहिचक ऑन-लाईन
ही लताड़ दिया। थोड़ा पीछे जाएँ, महाकुंभ के दौरान विश्वस्त और प्रबुद्ध
मीडियाकर्मी पुण्य प्रसून बाजपेयी वीएचपी के भूले-बिसरे नेता के साथ कुंभ का
सियासी कनेक्शन तलाश रहे थे और उस एपिसोड को देखने वाला आसानी से समझ सकता था कि
यह पुण्य प्रसून नहीं, कोई और बोल रहा है। ऐसे मामलों में पक्षधरता या मोटिव समझने
के लिए ज़्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ती।
वैसे प्रचार का मतलब पक्षधरता
ही नहीं होता। सियासी मामलों में तो दुष्प्रचार भी फ़ायदेमंद ही साबित होता है। यह
हमारा मानना नहीं है, यह भी सियासी लोगों की ही धारणा है। मुझे बहुत पुरानी घटना
याद आ रही है। बिहार में आरजेडी की नेत्री के बेटे पर एक आईएएस अधिकारी की पत्नी
के साथ दुष्कर्म का आरोप लगा था। मामला वरिष्ठ अधिकारी और सत्ताधारी दल की किसी
नेत्री के बेटे से जुड़ा था, लिहाजा चर्चित भी हुआ। तब आरोपी ने मीडिया के सामने बड़ी
बेशर्मी के साथ कहा था कि “बदनाम
हुए तो क्या नाम न होगा?
अब तो हम पक्का नेता बन जाएँगे।”
यह अलग बात है कि सत्ता से राजद की बेदखली के साथ ही, वह नेत्री और उनके होनहार
पुत्र, न जाने कहाँ ग़ायब हो गए! ख़ैर,
नरेन्द्र मोदी या राहुल गाँधी का ऐसी किसी घटना से संबंध नहीं है। इन दोनों की
बदनामी का ‘एंगल’ भी अलग-अलग है। एक को जहाँ ‘राजनीति का बच्चा’
और ‘पप्पू’
बताया जा रहा है तो दूसरे को ‘फेंकू’ और कट्टर हिन्दुत्ववादी। वैसे भी उपरोक्त उदाहरण
से मेरा तात्पर्य बस इतना था कि ‘निगेटिव
छवि’ भी मूलतः ‘निगेटिव’ नहीं हुआ करती। विशेष रूप से सियासत के संदर्भ
में यह बात बिल्कुल खरी साबित होती है, क्योंकि यहाँ अच्छाई और बुराई का संबंध पक्षधरता
से है। भारतीय राजनीतिक परिदृश्य इसका सुबूत है। धर्म और जाति के नाम पर नफ़रत और
समाज को बाँटने को उद्धत दलों और नेताओं को देखिए, सभी ने नफ़रत की आड़ में ही
अपनी सियासत की दुकान को जमाया और बढ़ाया है।
गुजरात दंगों के बाद
नरेन्द्र मोदी हिन्दू-हृदय सम्राट हो गए। उनसे पहले यह पदवी लालकृष्ण आडवाणी और
ठाकरे जैसे नेताओं के लिए संरक्षित थी। विपक्षी दलों और सेक्यूलर संगठनों ने विरोध
किया। वैश्विक स्तर पर नरेन्द्र मोदी अपनी क्रिया-प्रतिक्रिया के लिए बदनाम हुए।
लेकिन यही बदनामी उनके लिए वरदान बनी। संकीर्ण मानसिकता वाले हिन्दुओं के हृदय में
मोदी, म्लेच्छ-मर्दन करने वाले ‘सेर
सिवराज’ के आधुनिक अवतार बन गए। अब अगर मीडिया मोदी को
मुस्लिम विरोधी की तरह प्रोजेक्ट करती है तो मोदी-समर्थक हिन्दू वोटों के बिखराव
की आशंका धराशायी होती है। अगर मुस्लिम के प्रति मोदी के पुराने रुख़ में बदलाव को
‘फोकस’
किया जाता है और यह बताया जाता है कि अब नरेन्द्र मोदी पहले जैसे नहीं रहे, उनमें
बदलाव आ गया है और अब वे मुस्लिमों के प्रति नरम-रुख़ रखते हैं तो उनको मुस्लिम
वोट भले न मिलें, लेकिन उनकी कट्टर हिन्दुत्ववादी छवि पर उदारता का मुलम्मा ज़रूर चढ़ेगा
और वे आज के लालकृष्ण आडवाणी बन जाएँगे। मतलब साफ है कि मीडिया की ‘निगेटिव रिपोर्टिंग’ निगेटिव नहीं है। यहां चित्त-पट, दोनों ही अपनी
है। कांग्रेस और दूसरे कथित धर्म-निरपेक्ष दल इसलिए ख़ुश हैं कि ‘मोदी-फोबिया’
अगर कारगर रहा तो आम चुनावों में उनका अपना वोट-बैंक सुरक्षित रहेगा। इसलिए इन
दलों के नेता भी ‘कुत्ते’ का मज़हब तय करने में मुस्तैदी दिखा रहे हैं।
उदारीकरण ने देश को और
कुछ दिया हो या नहीं, लेकिन उसने नेताओं को मार्केटिंग का गुर ज़रूर सिखा दिया है।
मीडिया को मैनेज करने और अपनी मार्केटिंग करने के मामले में नरेन्द्र मोदी और
नीतीश कुमार, दोनों ही आदर्श नेता हैं। नरेन्द्र मोदी ने तो सोशल मीडिया पर भी
अपनी पकड़ बना रखी है। वैसे भी हम मानते हैं कि मीडिया-कर्म समाजसेवा नहीं, पेशा
है। पेशे में जो कुछ भी किया जाता है, वह लाभ कमाने के लिए ही किया जाता है। इसलिए
यह दावा नहीं किया जा सकता कि अख़बार या न्यूज़ चैनल मोदी या नीतीश का गुणगान
मुफ़्त में कर रहे हैं। सच तो यह है कि कोई भी मीडिया-घराना निष्पक्ष नहीं है।
किसी ने कांग्रेस का झंडा थाम रखा है तो कोई बीजेपी का भोंपू बना हुआ है। सभी मीडिया
हाउस, 2014 का एजेंडा तय करने में जुटे हैं। जनता की नब्ज़ अभी पकड़ में नहीं आ
पाई है, लिहाजा अँधेरे में तीर-तुक्के मारे-फेंके जा रहे हैं। विश्वसनीयता को
संदिग्ध होने अथवा ‘स्पैम’ की श्रेणी में पटके जाने से बचाने के लिए ‘निगेटिव रिपोर्टिंग’ का सहारा लिया जा रहा है।
मीडिया
के आधुनिक नारद, प्रभु रूपी सियासी दलों और नेताओं के चुनावी समर में कूदने से
पूर्व ही, उनके लिए न सिर्फ भूमिकाएँ तैयार कर रहे हैं, बल्कि लीला-सामग्री भी
जुटा रहे हैं। कभी मोदी बनाम राहुल, कभी मोदी बनाम मुस्लिम, कभी मोदी बनाम विकास,
कभी मोदी बनाम हिन्दुत्व को कभी मोदी बनाम नीतीश। यानी नरेन्द्र मोदी समाचार रूपी
सब्ज़ी में नमक की तरह इस्तेमाल किए जा रहे हैं। यही वजह है कि सन 2002 की घटना के
पहले गुमनाम और उसके बाद राजनीति में अछूत और पतित करार दिए गए मोदी, अब
विकास-पुरुष और भारत-भविष्य के रूप में उभारे जा रहे हैं। लोगों के दिमाग में मोदी
जज़्ब हो रहे हैं- छवि ‘पॉजिटिव’ हो या ‘निगेटिव’, इससे ज़्यादा फ़र्क़ नहीं पड़ता। यहाँ मोदी के पक्ष
में दो बाज़ारू स्लोगन बिल्कुल सटीक बैठते हैं- टेढ़ा है पर मेरा है और दाग़ अच्छे
हैं। नारद ख़ुश हैं। प्रभु की जय हुई तो तो पुरस्कार निश्चित। अगर पराजय हुई तो ‘कोउ नृप हो, हमें का हानि’। दिक्क़त संजय के साथ है, लेकिन वह तो लीला-भूमि से कोसों
दूर है। उससे रिपोर्टिंग छीन ली गई है। एक बार फिर वह अवसाद का शिकार है। नारद
अभिजात्य मुस्कान लिए ‘नमो-नमो’ की रट लगा रहे हैं। वीणा बजा रहे हैं। रही हनुमान की
बात तो वे अपनी अतिशय भावुकता के चक्कर में छाती फाड़ लेने के बाद से कोमा में ही
हैं।

बहुत बढ़िया -
जवाब देंहटाएंहँसी हँसी में गंभीर बात-
आभार आदरणीय-
नारायण नारायणा, नारद मुनि का नाद |
आदि पुरुष संवाद के, भूले नहिं मर्याद |
भूले नहिं मर्याद, खबर की जहाँ जरुरत |
रत रहते दिन रात, वहाँ दें देख मुहूरत |
निहित लोक कल्याण, हमेशा दानव हारा |
अब नारा पर जोर, संभालो ढीला नारा ||