2004 में एक तेलुगु फिल्म आई थी।
फिल्म का नाम था ‘मास’।
फिल्म के नायक थे- अक्कीनेनी नागार्जुन। पटकथा और निर्देशन राघव लॉरेंस का था।
कहानी का नायक अनाथ था। अनाथ तो ‘बेनाम बादशाह’ में अनिल कपूर भी था। वैसे अनिल कपूर की ही एक और फिल्म है- ‘नायक’। 2001 में आई, ये फिल्म ‘मास-मूवमेंट’ की वास्तविक झांकी प्रस्तुत
करती है। बल्कि अन्ना आंदोलन से उभरे अरविंद केजरीवाल में, भारत के युवा मानस ने
उसी नायक ‘शिवाजी’ की छवि देखी थी। ‘नायक’ फिल्म का नायक भी तो भ्रष्टाचार और अपराध से ही निराश और
नाराज़ था। उसने मुख्यमंत्री को इसी मुद्दे पर घेरा था। परिस्थितियों ने उसे एक
दिन का मुख्यमंत्री बनाया। फिर मीडिया ने, इस कैमरामैन से रिपोर्टर और रिपोर्टर से
एक दिन का मुख्यमंत्री बने शिवाजी को इतना लोकप्रिय बना दिया कि भ्रष्टाचार,
अत्याचार, जातिवाद और तमाम तरह से त्रस्त जनता ने उसको अपना उद्धारक मान लिया।
शिवाजी जबरन पॉलिटिक्स में घसीट लिया गया। इन सबके बावजूद मैं बॉलीवुड की बजाय
टॉलीवुड की फिल्म को तरजीह दे रहा हूँ तो इसका कारण सिर्फ फिल्म का नाम ही है।
ख़ैर, फिल्म का नाम दरअसल नायक के नाम पर आधारित है। यानी नागार्जुन ने इस फिल्म
में जिस किरदार को जिया है, वो ‘मास’ है। गुंडों की धुनाई के समय ही सही, लेकिन नायक ने ‘मास’ की परिभाषा देने की कोशिश की
है। ‘मास’ की
प्रेमिका ने भी हाथ नचा-नचाकर, भौंहें चढ़ा-चढ़ाकर और शब्दों को चबा-चबाकर ‘मास’ की ख़ूबियों का बखान किया
है। लेकिन मैं उस परिभाषा से संतुष्ट नहीं हूँ। साहित्य में वीरगाथा काल को बहुत
पहले ही आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने न सिर्फ चिन्हित कर दिया था, बल्कि उसके अवसान
को भी रेखांकित कर दिया था। और अब तो बहुत हद तक फिल्मी वीरगाथा काल का भी बॉलीवुड
से लोप होने को है। इसलिए ‘मास’ की टॉलीवुडीय परिभाषा को स्वीकार नहीं किया जा सकता। लिहाजा ‘मास मूवमेंट’ और ‘मास मीडिया’ के अंतर्संबंधों की पड़ताल
के लिए अभी मैं जिस सतही प्रस्थान बिन्दु पर हूँ, वहाँ से इस गंभीर विषय की गरिमा
को बरकरार रखना संभव नहीं है। लिहाजा ‘मास मूवमेंट’ शब्द का वास्तविक अर्थ और जन-आंदोलन के संदर्भ में इसके
इस्तेमाल के कारणों की पड़ताल का रास्ता ज्यादा सटीक जान पड़ता है।
गुरुत्वाकर्षण के कारण किसी पहाड़ी ढलान
से पानी, मिट्टी और चट्टान के टुकड़ों का मलबा, जब अचानक नीचे की तरफ तेज़ गति से
सरकता है, और जमीन की सतह क्रमशः डूबती जाती है, तो ये प्रक्रिया ‘मास मूवमेंट’ कहलाती है। ‘मास मूवमेंट’ वास्तव में बड़े पैमाने पर पहाड़ों
के अपक्षय और ज़मीन पर मलबे की नई परत के चढ़ने की मिश्रित प्रक्रिया का नाम है। किसी
पहाड़ की ढलान कितनी तीखी है? ढलान पर मिट्टी की मात्रा
और मृत चट्टानों की परत कितनी मोटी और मज़बूत है? और
इस पर गिरने वाले पानी की मात्रा और गति कितनी है? ‘मास मूवमेंट’ में इन सबका साझा योगदान
होता है। कई बार तलहटी में होने वाला तेज़ कटाव, खिंचाव की त्वरा बढ़ा देता है। कारक
और भी हैं। सभी का ज़िक्र ज़रूरी नहीं। लेकिन हाँ, इस तरह की घटनाओं के लिए
सामान्यतः चट्टान की प्रकृति और संरचना ही मूल रूप से उत्तरदायी होती है। इस तरह
के ‘मूवमेंट’ से भूमि का प्राकृतिक स्वरूप बदल जाता है। ये ज़रूरी नहीं कि
हर बार ‘मास मूवमेंट’ प्राकृतिक कारणों से ही हो, बल्कि कई बार अप्राकृतिक कारणों
से भी होती है। यानी हम-आप भी कभी-कभी ऐसी परिस्थितियाँ तैयार कर दिया करते हैं।
उदाहरण के लिए बिहार की कोसी त्रासदी और उत्तराखंड की आपदा को ले सकते हैं। हाँ,
कहीं अचानक से बादल फट पड़े तो अलग बात है।
भूविज्ञान की परिधि से बाहर निकलें
तो सामाजिक-राजनीतिक संदर्भों में ‘मास मूवमेंट’ का अर्थ होता है- किसी विशेष सामाजिक या राजनीतिक मुद्दे
अथवा घटना के कारण आबादी के बड़े हिस्से में अकस्मात् उद्वेलन, आंदोलन अथवा हलचल। ‘मास मूवमेंट’ अथवा ‘जन आंदोलन’ का इस्तेमाल, सामान्यतः इसी
संदर्भ में किया जाता है। एक बात और स्पष्ट हो जाए तो बेहतर होगा! वो ये कि ‘सामाजिक आंदोलन’ और ‘जन आंदोलन’ में फ़र्क़ होता है। हालांकि दोनों के बीच का ये फ़र्क़ बेहद
झीना है। जब तक कोई आंदोलन केवल सामाजिक प्रभाव तक सीमित रहता है, वह ‘सामाजिक आंदोलन’ ही कहलाता है। लेकिन जब इसके
साथ राजनीतिक स्वार्थ या उद्देश्य भी जुड़ जाता है, तब ये ‘जन आंदोलन’ में परिणत हो जाता है। मिसाल के तौर पर उत्तराखंड में गौड़ा देवी के नेतृत्व में शुरु
हुआ ‘चिपको आंदोलन’ (जिसे बाद में सुंदरलाल बहुगुणा ने वैचारिक आधार दिया।) और ‘नर्मदा बचाओ आन्दोलन’ (सरदार सरोवर बाँध का विरोध,
सबसे पहले प्रभावित लोगों ने ही किया था। तब वे सिर्फ पुनर्वास की माँग कर रहे थे।
बाद में स्वयंसेवी संस्थाएँ जुड़ीं और पुनर्वास के साथ ही कई और मुद्दे भी जुड़ गए।
फिर सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर भी इससे जुड़ीं और इन्हीं के नेतृत्व में ये ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ में तब्दील हो गया।), इन
दोनों को शुद्ध सामाजिक आंदोलन के रूप में चिन्हित किया जा सकता है। ‘सामाजिक आंदोलन’ का उद्देश्य प्रत्यक्ष होता
है और त्वरा भी सहज होती है। जबकि ‘जन आंदोलन’ में ऐसा नहीं होता। ‘जन आंदोलन’ का वास्तविक उद्देश्य हमेशा अप्रत्यक्ष रहता है और त्वरा भी
चरमसीमा को छूती प्रतीत होती है। यहाँ विचारधारा गौण रहती है। उन्माद का
प्रत्यक्षीकरण होता है। लोग कारण-परिणाम से परे, जोश और आक्रोश से भरे होते हैं। स्थिति
ठीक वैसी ही होती है, जैसे पहाड़ी ढलान से पानी, मिट्टी और मृत चट्टानों का मलबा,
गुरुत्वाकर्षण के दबाव में तीव्र गति से समतल की तरफ अचानक बढ़ता और उसको पाट देता
है। ठीक उसी तरह ‘जन आंदोलनों’ का स्वरूप भी सर्वसमावेशी होती है। इसमें जाति, धर्म, लिंग
अथवा आर्थिक आधार पर ध्रुवीकरण जैसी बात नहीं होती। उदाहरण के लिए कहीं दूर जाने
की ज़रूरत नहीं है। कम से कम तीन-चार जन आंदोलनों का गवाह तो ख़ुद भारत ही है। मई
1857 (सैनिक विद्रोह), अगस्त 1942 (करो या मरो), जून 1974 (किसानों का बिहार
आंदोलन, जो पाँच जून के बाद सम्पूर्ण क्रांति में तब्दील हो गया।) और अप्रैल 2011
(अन्ना आंदोलन, जो बाद में एक राजनीतिक दल के रूप में संगठित हुआ)।
1857 के विद्रोह का प्रत्यक्ष प्रस्थान
बिन्दु धार्मिक था। लेकिन इसके ‘वाइरल’ होने के पीछे मज़बूत कारक आर्थिक और राजनीतिक ही थे। हमने
इसे पहला ‘स्वतंत्रता संग्राम’ मान लिया है। तमाम तर्कों और साक्ष्यों की मदद से, इसे
सुचिंतित और सुनिश्चित भी मान चुके हैं। बावजूद इसके, यह एक तथ्य है कि यह आंदोलन स्वतःस्फूर्त
और अकस्मात था। ठीक वैसे ही, जैसे ‘जे पी आंदोलन’। पाँच जून से पहले ये ‘जन आंदोलन’ नहीं था। तब ये किसानों का ‘बिहार
आंदोलन’ था। 5 जून 1974 को जे पी ने घोषणा
की- "भ्रष्टाचार मिटाना, बेरोजगारी दूर करना, शिक्षा में क्रान्ति लाना,
आदि ऐसी चीजें
हैं जो आज की व्यवस्था से पूरी नहीं हो सकतीं;
क्योंकि वे इस
व्यवस्था की ही उपज हैं। वे तभी पूरी हो सकती हैं, जब सम्पूर्ण व्यवस्था बदल दी
जाए। और, सम्पूर्ण व्यवस्था के परिवर्तन के लिए
क्रान्ति, ‘सम्पूर्ण क्रान्ति’ आवश्यक है।" ‘सम्पूर्ण क्रांति’ का नारा इतना आक्रामक और आकर्षक था कि बिहार की जनता सड़क पर
आ गई। छात्रों ने स्कूल-कॉलेज छोड़ दिए। और इस तरह सीधा-सादा किसान आंदोलन ‘जन-आंदोलन’ में तब्दील हो गया। तत्कालीन
मीडिया ने लोगों के आक्रोश को और हवा देने की कोशिश की। कहने को आंदोलन व्यवस्था
परिवर्तन के लिए था। लेकिन जय प्रकाश एकसूत्री माँग पर ही डटे रहे- बिहार के
मुख्यमंत्री को बदलो। अचरज की बात तो ये भी थी कि वे ख़ुद ही तत्कालीन मुख्यमंत्री
अब्दुल गफूर को ईमानदार और स्वार्थ-रहित मानते थे। आंदोलन के दौरान ‘अब्दुल गफूर मुर्दाबाद’ का नारा लगाने पर उन्होंने
आंदोलनकारियों को फटकारा भी था। बहरहाल, घटनाक्रम की तफ्सील में जाना विषयांतरण
होगा, लिहाजा यहीं विराम देते हैं। अहम बात ये कि ‘अन्ना
आंदोलन’ के दौरान भी अन्ना हजारे या उनकी
टीम के किसी सदस्य ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर भ्रष्टाचार का आरोप नहीं लगाया।
अप्रैल 2011 का अन्ना आंदोलन भी
भ्रष्टाचार के खिलाफ़ शुरू हुआ था। जनलोकपाल की माँग के साथ अनशन की शुरुआत हुई और
फिर देखते ही देखते ये पूरे उत्तर भारत में ‘वाइरल’ हो गया। ज्यादातर राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय न्यूज़ चैनलों
ने अपने-अपने ‘ओबी-वैन’ रामलीला मैदान में फिक्स कर दिए। लाईव प्रसारण की होड़ लग गई।
मीडियाकर्मी भी आंदोलनकारी बन गए। तमाम चैनलों और अख़बारों में ‘अन्ना’ और ‘जनलोकपाल’, जनता का बढ़ता गुस्सा,
अन्ना के समर्थन में देश के अलग-अलग हिस्सों में धरना-प्रदर्शन, अनशन, जुलूस; यही ख़बरें छाई रहीं। फ़र्ज़ कीजिए कि सन 74 में 4 नवंबर की
दोपहर, जे पी हजारों लोगों के साथ जब पटना की सड़क पर उतरे थे, उस वक्त मीडिया
उनका लाईव कवरेज कर रहा होता और रेवेन्यू बिल्डिंग के पास जो घटना हुई थी, वो सीधे
लोगों की नज़र में आ जाती तो क्या होता? सीआरपीएफ के जवान
प्रदर्शनकारियों पर लाठियाँ बरसा रहे थे और कहते हैं, एक जवान ने जे पी के सिर पर
भी लाठी चलाई थी, लेकिन नानाजी देशमुख बीच में आ गए और इस तरह जे पी बच गए। ये दृश्य
अगर जनता तक पहुँच जाता तो क्या होता? अन्ना आंदोलन के
नुक्ते-नज़र से देखें तो देश हिंसक और उद्दंड तांडव का शिकार हो गया होता! ठीक उसी तरह करीब साल भर बाद 25 जून 1975 को दिल्ली में
गाँधी शांति प्रतिष्ठान से रात के अँधेरे में जे पी को गिरफ्तार किया गया था, ये
ख़बर अगर उसी वक़्त ब्रेक हो जाती तो क्या होता?
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया नहीं था, लेकिन उस समय के जो भी समाचार माध्यम थे, वे जे पी
के पक्ष में और सरकार के ख़िलाफ़ लगातार लिख रहे थे। रही अन्ना आंदोलन की बात, तो
बुद्धिजीवी से लेकर सामान्य तबका तक, सभी मानते हैं कि ये आंदोलन वास्तव में
मीडिया द्वारा ही संचालित था। सबसे बड़ी बात ये कि जे पी आंदोलन के दौरान स्वयं
प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने कहा था कि “(1) प्रतिपक्ष नाजीवाद फैला
रहा है। नाजीवाद केवल सेना और पुलिस के उपयोग से ही नहीं आता है। कोई छोटा समूह जब
ग़लत प्रचार करके जनता को गुमराह करे, वह भी नाजीवाद का लक्षण है। (2) जे पी के
आंदोलन के लिए रूपया बाहर से आ रहा है। (3) सीआईए बहुत सक्रिय है और प्रतिपक्ष का
सारा अभियान प्रधानमंत्री के विरुद्ध है।”(आपातकाल- एक डायरी, बिशन
टंडन, 2002) अन्ना आंदोलन भले ही ‘जन लोकपाल’ के नाम पर शुरू हुआ था, लेकिन प्रवृत्तियाँ सन चौहत्तर वाली
ही थीं। मसलन निशाने पर प्रधानमंत्री और गाँधी परिवार ही रहा। अरविंद केजरीवाल पर
लगने वाले आरोपों के साथ भी आप इसका साम्य देख सकते हैं। फ़र्क बस इतना है कि जे
पी पर जो आरोप प्रधानमंत्री ने लगाए थे, वही आरोप अरविंद केजरीवाल पर बीजेपी ने
लगाए। कारण भी स्पष्ट है। आम आदमी पार्टी के गठन की वजह से बीजेपी के हित पर
प्रतिकूल असर पड़ा।
भ्रष्टाचार के खिलाफ, जेपी और अन्ना
ने अलग-अलग समय पर भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों का नेतृत्व किया। दोनों ने जिनके
ख़िलाफ संघर्ष का दावा किया, उनकी ईमानदारी को प्रश्नांकित नहीं किया। यह तथ्य है।
लेकिन तथ्य तो ये भी है कि सन 74 से बहुत पहले ही जे पी अपनी राजनीतिक ज़मीन गंवा
चुके थे और विनोबा भावे के सर्वोदय मिशन से जुड़ कर समय काट रहे थे। वैसे ही अन्ना
हजारे की पहुँच भी रालेगाण सिद्धि तक ही सीमित हो चुकी थी। फिर अचानक दोनों ‘मास लीडर’ के रूप में अवतरित हुए और
व्यवस्था के लिए दुर्धर्ष शक्ति बन गए। स्पष्ट है कि दोनों को प्रतीक रूप में उद्देश्य
विशेष की पूर्ति के लिए खड़ा किया गया था। ठीक वैसे ही, जैसे कि बहादुर शाह ज़फ़र।
एक सर्वमान्य तथ्य ये भी है कि जे पी आंदोलन को अप्रत्यक्ष रूप से संघ द्वारा
संचालित किया जा रहा था और अन्ना आंदोलन में भी स्वयंसेवकों का योगदान असंदिग्ध
है। सम्पूर्ण क्रांति के बाद इंदिरा गाँधी की सरकार बहुत अलोकप्रिय हुई थी। अन्ना
आंदोलन के बाद मास मीडिया के अलग-अलग माध्यमों से कांग्रेस और सरकार की छवि धूमिल
करने की मुहिम चरम पर है। आज़ादी के बाद से सिर्फ यही दो आंदोलन नहीं हुए हैं।
लेकिन मीडिया ने इन दो के अलावा कभी किसी अन्य आंदोलन को इतना महत्व भी नहीं दिया।
और इन दोनों आंदोलनों के दौरान भी अर्धसत्य से ही काम चलाया गया। आखिर क्यों?
वास्तव में जन-आंदोलन, किसी सियासी
दल अथवा आंदोलन की राजनीतिक अवधारणा को प्रदर्शित करता है, जिसे आबादी के बड़े
हिस्से का समर्थन मिलता है। आम तौर पर, फासीवादी शक्तियाँ या साम्यवादी शक्तियाँ
इस तरह के जन-आंदोलनों को जन्म देती हैं। ये सुविचारित और योजनाबद्ध होती हैं,
लेकिन प्रत्यक्ष रूप से इनका उभार अचानक नज़र आता है। इसका मक़सद स्थापित सत्ता को
उखाड़ फेंकना और अपनी सत्ता स्थापित करना होता है। और बाद में भी इनकी सत्ता बनी
रहे, इसके लिए भी ये जन-आंदोलनों की ओट लेते रहते हैं। यही वजह है कि जन-आंदोलनों
का कोई प्रत्यक्ष स्थैतिक उद्देश्य या स्वरूप नहीं होता। कभी करिश्माई नेतृत्व,
कभी धर्म और सम्प्रदाय, कभी लोकनायक तो कभी जन-भावना, कभी पृथकतावादी रुझान तो कभी
ब्रेनवॉश और अफवाह, कभी अधिनायकवादी तो कभी सर्वाधिकारवादी प्रवृत्तियों की मदद से
ये शक्तियाँ अपनी लक्ष्य-सिद्धि का प्रयास करती रहती हैं। ऐसी प्रवृत्तियों को हवा
देने और ऐसे प्रयासों को सफल बनाने में मीडिया की भूमिका असंदिग्ध और अपरिहार्य
है, ये बात सन 74 से लेकर सन 2011 के आंदोलन तक में स्वतः सिद्ध हो चुकी है।
भूमंडलीकरण के बाद से तो मीडिया की परंपरागत परिभाषा भी बदल गई है। आज मीडिया एक
ऐसा एकीकृत मंच है, जो सम्प्रेषण के सभी माध्यमों का प्रभावी ढंग से इस्तेमाल करने
में विश्वास करता है। वर्तमान सियासी हालात इसका सबसे सटीक उदाहरण है। पहले
मीडियाकर्मी अपनी छवि को लेकर सजग होता था। संस्थान भी। तब नीति ये होती थी कि जो
जैसा है या हो रहा है, उसको वैसे ही दिखाया जाए। लेकिन अब वैसा नहीं होता। अब
ब्रांडिंग की जाती है। छवि-निर्माण का ठेका लिया जाता है। पक्षधरता के आरोपों से
मीडियाकर्मी या संस्थान परेशान नहीं होते। अब मीडिया ही क्रांतिकारी बन जाता है।
यानी मीडिया एक पक्ष के रूप में नज़र आता है। चाहे वो सत्ता के साथ हो या विपक्ष
के साथ। बकौल ओम थानवी- “निष्पक्षता का मतलब
निष्क्रिय या बे-पेंदी ढुलमुल रहना नहीं हो सकता। कभी पक्ष रखना भी निष्पक्षता का
ही एक रूप होता है, बशर्ते वह निस्स्वार्थ हो और न्याय
के हक में हो। न्याय कानूनी अर्थों में नहीं,
नैतिक अर्थों
में। ऐसे ही विरोध करना भी एक तरह की वाजिब पक्षधरता है।” लेकिन दुर्भाग्य से भारतीय मीडिया में इस नैतिकता का सर्वथा अभाव
है। तभी वो राजनीति से प्रेरित अप्राकृतिक जन-आंदोलनों में तो दिलचस्पी लेती है,
लेकिन वास्तविक सामाजिक संघर्षों और आंदोलनों को अनदेखा कर देती है। उसके लिए
भूमिहीनों का आंदोलन ‘उग्रवाद’ हो जाता है और आदिवासियों का संघर्ष देश के विकास की धारा के
लिए प्रतिगामी। एक निर्भया का बलात्कार ‘राष्ट्रीय शर्म’ और ‘आक्रोश’ में बदल जाता है। जबकि सोनी सोरी और ऐसी ही हजारों बलात्कृत
महिलाओं का दर्द उपेक्षणीय और इनके दोषियों के लिए ‘राष्ट्रपति
मेडल’ की व्यवस्था सामान्य घटना बन जाती
है।

आज के मीडिया का बहुत सटीक प्रवृत्तिगत विश्लेषण किया है |इसीलिए आज मीडिया लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ की भूमिका से च्युत होकर निहित स्वार्थी समूहों का पृष्ठपोषक बन गया है |अपनी जोखिमों पर विकसित हो रहे समान्तर लोक मीडिया से ही अब आशा -अपेक्षा है |
जवाब देंहटाएंबढ़िया लिखा है।
जवाब देंहटाएंगुरुत्वाकर्षण की जगह ढलान शायद अधिक उपयुकत होता।
मिड़िया का लगभग पूरी तरह एकपक्षीय हो जाना ड़र पैदा करता है।