कहाँ थे आप ज़माने के बाद आए हैं
मेरे शबाब के जाने के बाद आए हैं
वो चेहरे जो झुर्रियों की गिरफ़्त में थे, वो आँखें जो
खोई-खोई सी नज़र आती थीं, वो जिस्म जो हड्डियों के गठ्ठर बन गए थे, और सबके-सब
सुरंग जैसी अँधेरी तंग गलियों के बोसीदा क़फ़सनुमा कमरों के गुमनाम मकीन थे।
कानपुर हो, मथुरा हो, वृंदावन हो, कासगंज हो, हाथरस हो, आगरा हो, टुंडला हो,
खुर्जा हो, या कोई और मुलुक—परम्परागत नौटंकी के सितारों की दुनिया जुदा-जुदा नहीं
थी। सब अपने-अपने अंतिम अरण्य में बेदिली से ज़िन्दगी का सलीब ढोने को मजबूर।
उम्मीद की चिड़िया कभी-कभी अपने पर फड़फड़ाती थी तो आँखों के कोर आँसू की बूँदों
से लबलबा जाते थे, झुर्रियों की परत जोश के ज़ेरे-असर धूमिल पड़ने लगती थी, अतीत
अचानक वर्तमान हो उठता था, हड्डियों का ढाँचा गठीले जवान की मानिंद तन जाता था और
आवाज़ में जवानी की खनक लौट आती थी। नीम अँधेरे कमरों के इन बाशिंदों की आँखें
बिल्लौरी हो उठती थीं और आसमानी सितारों की मानिंद चमकने लगती थीं। कमरा मंच में
तब्दील हो जाता था। दमा का मरीज़ आबिद मास्टर, जिसकी ज़िन्दगी महज चंद दिनों की
मेहमान थी, अपनी टूटी चारपाई को जहाँगीर का तख़्त समझ बैठता और हुक्म फ़रमाने लगता—“मंगल सिंह, तुम्हारा फ़ेल क़ानून की निगाह में तुम्हें मुजरिम
क़रार देता है, लिहाजा इसके मुआवज़े में हम, मिनजानिब ये फ़ैसला सादिर फ़रमाते हैं
कि ख़ून का बदला ख़ून ! तुम्हें फांसी देकर
मक़्तूलाओं के ख़ून की क़ीमत चुका ली जाए, मगर चूँकि आमदे-माहे-रमज़ानुल-मुबारक
है, इसलिए इसके एहतराम में तमाम फाँसी के फैसले मुल्तवी किए जाते हैं और बाद
एख़्तेताम माहे-सय्याम तामील-ए-हुक्म हो।” जिस्म से लगभग लाग़र
और नाक के बदले मुँह से जबरन साँसें खींचते, बड़ी-बड़ी लेकिन बिल्कुल पीली पड़
चुकी आँखों वाले तकरीबन नब्बे साल के इस बुज़ुर्ग को जब मैं ब-आवाज़े बुलंद ‘जहाँगीर का इंसाफ’ के संवाद अदा करते
देखता-सुनता हूँ तो उनका बताया इतिहास मानो मेरी आँखों के सामने वर्तमान हो उठता
है। मुझे लगता है, मैं किसी गाँव में बाँस-बल्ली और चौकी की मदद से बनाए गए मचान
पर तख़्तनशीं जहाँगीर को देख रहा हूँ। मचान जैसा यह मंच चारों तरफ़ से खुला है।
पूरा गाँव मंच के इर्द-गिर्द जमा है। लालटेन और मशालें रौशन हैं और इस रौशनी में
जहाँगीर बने आबिद मास्टर का चेहरा दमक रहा है। लोगों ने मान लिया है कि मंच पर जो
मामूली-सी कुर्सी पड़ी है, वह मामूली कुर्सी नहीं है बल्कि जहाँगीर का तख़्त है और
वे लोग जहाँ बैठे हैं, वह गाँव का कोई ऊसर मैदान नहीं, बल्कि बादशाह का दीवान-ए-आम
है, जहाँ पर वह अपने ही एक सिपाही के ख़िलाफ़ क़त्ल का मुकदमा सुन रहे हैं और
फैसला सुना रहे हैं।
यह जो ‘प्रतीति’ है, उसका ‘नौटंकी’ वाले मुहावरे से कोई साम्य नहीं है। नौटंकी करना आसान नहीं
है। ‘नौटंकी’ साधना है। कितनी कठिन साधना
है, यह वही बता सकता है, जिसने इसको साधने में अपनी पूरी ज़िन्दगी ख़र्च कर दी और
जीवन के अंतिम पड़ाव पर जिसके पास स्मृतियों के अलावा शेष कुछ भी नहीं है। “हमने बहार देखी है, अब इसकी जो ख़िज़ाँ सुनते हैं तो तकलीफ़
होती है।” हालांकि अब आबिद मास्टर को इस तकलीफ़ से छुटकारा मिल चुका है।
29 अक्टूबर 2016 को जब हिन्दुस्तान के तमाम लोग लक्ष्मी के स्वागत में अपने-अपने
घरों को रौशन करने की तैयारियाँ लगभग मुकम्मल करने को थे, सरस्वती का यह वरद्पुत्र
कानपुर के बाकरगंज की एक अँधेरी कोठरी में लगभग 35-40 साल की क़ैद-ए-ग़रीबी और
गुमनामी से मुक्त हो रहा था। स्मृतियों का एक सागर था, जो सूख गया। हम तो बस कुछ
बूँदें ही सहेज सके। यही हमारा सामर्थ्य था। मुझे यक़ीन है कि अपने वक़्त की
अनारकली और आबिद मास्टर की शरीक़-ए-हयात हसीना अब भी यही बुदबुदाती होंगी— ‘मुझको फ़िराके-ग़म में रुलाया न करो तुम / देखो मेरे पास से
जाया न करो तुम’। जाना अपने हाथ में होता तो आबिद मास्टर हसीना को यूँ
अकेला छोड़ कर कतई नहीं जाते। ख़ैर, जाने को तो नौटंकी के बड़े-बड़े उस्ताद गए—इन्दरमन,
नत्थाराम, चिरंजीलाल, नम्बरदार, शंकरलाल, बसंतलाल, मुंशीराम, हरप्रसाद, तिरमोहन,
नज़ीर, बाबूराम, श्रीकृष्ण पहलवान, हिद्दन ख़ाँ, छिद्दन ख़ाँ, राशिद उस्ताद, गुलाब
बाई, किसना बाई, कोकिला, मलका बेगम, नूरजहाँ, रामप्रसाद, राजा मास्टर—न जाने और कितने
कलाकार, जिनका जन्म ‘रम्मत’ के दौरान नौटंकी के तम्बुओं
में हुआ और नौटंकी को जीते-गाते अंततः उन्हीं तम्बुओं से उनकी मिट्टियाँ उठीं,
लेकिन उनकी स्मृतियाँ और नौटंकी का हुस्न, दोनों अक्षुण्ण रहे।
नौटंकी के दौरे-उरूज़ के चश्मदीद आज भी पश्चिम यूपी के
अलग-अलग गोशों में स्मृतियों का ख़ज़ाना सहेजे बैठे हैं। और वैसे कलाकार, जिनके
जिस्म-ओ-जोश ने अभी उनका साथ नहीं छोड़ा है, नौटंकी को जी रहे हैं। ठीक है कि कभी नौटंकी
से रुतबा, शोहरत और दौलत वाबस्ता थे, और आज कुछ भी नहीं, लेकिन जोशो-जुनून तो है,
इश्क़ तो है, ज़िद तो है, वरना क्या वजह है कि विपन्नता की निठुर और विकल करने
वाली स्थितियों में भी इनसे ‘नौटंकी’ का दामन नहीं छूटता। नौटंकी अगर मजबूरी होती तो कासगंज की एक
सुरंगनुमा लम्बी गली के भीतर छोटे से घरौंदे में रहने को मजबूर शाहिद मियाँ अपना दामन
इससे कब का छुड़ा चुके होते। ...और अगर पैसा ही सबकुछ होता तो फिरोज़ाबाद के
सिरसागंज की लता रानी ने न जाने कब का ‘नौटंकी’ को अलविदा कह दिया होता। मेरे सामने ही चारपाई पर शाहिद
मियाँ बैठे हैं, लेकिन उनका फ़न उनकी हक़ीक़त पर भारी पड़ता नज़र आ रहा है।
समयक्रम अवरोही होने लगता है और मैं कासगंज से काफी पहले (13 जुलाई, 2016) कानपुर
के पद्मपत सिंघानिया प्रेक्षागृह जा पहुँचता हूँ, जहाँ मंच पर डाकू सुल्ताना के
भेष में खड़ा मास्टर शाहिद अपने तमाम रंज़ो-ग़म से दूर बड़ी बेफ़िक्री और रौब के
साथ अपनी महबूबा ‘फूल कुंवर’ को ‘चौबोला’ की मार्फ़त अपनी हैसियत बता
रहा है—“प्यारी कंगाल किस को समझती है तू? / कोई
मुझ सा दबंग और न रश्क-ए-क़मर / जब हो ख़्वाहिश मुझे लाऊँ दम-भर में तब / क्योंकि
मेरी दौलत जमा है अमीरों के घर।” अब इनकी दौलत अमीरों के घर
जमा है या नहीं, अलग मसला है, लेकिन यह सच है कि नौटंकी के कलाकारों ने सिर्फ़ पेट
की ख़ातिर इस विधा को नहीं अपनाया, बल्कि यह मामला जुनून का ज़्यादा लगता है। इस
लिहाज़ से ये कंगाल तो बिल्कुल भी नहीं हैं। नौटंकी जैसी जटिल विधा को साधने वाले
धुरंधर भला कंगाल कैसे हो सकते हैं! कानपुर के अजीतगंज
कॉलोनी में अब एकाकी जीवन जी रही, अपने दौर की अभिनय-कुशल और कोकिल-कंठी कमलेश लता
सवालिया लहज़े में कहती हैं—“नौटंकी में सुर भी देखना है,
नक़्क़ारे की ताल भी देखनी है, एक्टिंग देखनी है, सामने जो खड़ा है, उसको किस
हिसाब से जवाब देना है, यह भी सोचना है। बताइए कौन सी ऐसी कला है, जिसमें कोई एक
आदमी इतना सबकुछ कर सकता है?” मैं जवाब में कहना चाहता
हूँ—इश्क़ और जुनून! क्योंकि मुझे नौटंकी के प्रत्येक कलाकार में न जाने क्यों ‘फूल सिंह’ की छवि नज़र आती है और
नौटंकी ‘विधा’ की बजाय सचमुच की ‘शहज़ादी’, जिसके इश्क़ ने इन्हें
दीवाना बना रखा है, कि जिसका ज़िक्र छिड़ते ही इनके चेहरे ऐसे पुरनूर हो उठते हैं गोया
मजनूँ ने लैला को देख लिया हो! “तेरी बांकी अदा पे मैं ख़ुद हूँ फ़िदा / अपनी चाहत का दिलबर
बयाँ क्या करूँ / यही ख़्वाहिश है तुम मुझको देखा करो / और दिल-ओ-जानी मैं तुमको
देखा करूँ।” (बहरे-तबील, लैला-मजनूँ)
इश्क़ तो इश्क़ है, हो जाता है। कुल-गोत्र, ज़ाति-धर्म,
नाम-पता आदि पूछ कर तो होता नहीं, सो इन नये-पुराने कलाकारों से जो पूछें कि ‘भई, नौटंकी का नाम ‘नौटंकी’ क्यों पड़ा?’ या कि ‘भगत, स्वांग, रामलीला, रासलीला, ढोला, तुर्रा-कलंगी,
नाचा-गम्मत, माच, नाच, नाट, बिदापत जैसी अन्य-अनेक सांगीत-परम्पराएँ देश के
अलग-अलग सांस्कृतिक-ख़ित्तों में ज़माने से प्रचलित हैं, फिर नौटंकी इनसे अलग कैसे?’ तो उनका जवाब निश्चित रूप से तसल्लीबख़्श नहीं होगा। आजमगढ़
में ‘देशज’ (16-20 मार्च, 2016) के
दौरान भी परिचर्चा में ‘नौटंकी’ शब्द के उद्भव और नौटंकी ‘विधा’ के विकास का तर्कसंगत क्रम तलाशने की कोशिश हुई थी। नौटंकी
और अन्य समवर्गी नाट्यरूपों से जुड़े देश के आला फ़नकारों और मर्मज्ञों के तर्क
हमने भी सुने थे। लेकिन जो निर्दोष हक़ीक़त है, वह यही है कि मुल्तान की शहज़ादी
नौटंकी के नाम पर ही इसे ‘नौटंकी’ लक़ब मिला। और इस नतीज़े पर पहुँचने के लिए किसी रॉकेट
साइंस की ज़रूरत नहीं है। डॉ. कैथरीन ने अपनी शोध-पुस्तक (Grounds For Play, The Nautanki
Theatre of North India) में इस तथ्य को
उद्घाटित किया है कि खुशीराम ने ‘सांगीत रानी नौटंकी का’ की रचना की थी, जो सन 1882 में वाराणसी से प्रकाशित हुई। पंडित
लखिमचंद ने भी शहज़ादी नौटंकी को केन्द्र में रखकर एक स्वांग की रचना की थी, जिसका
नाम ‘फूल सिंह नौटंकी’ है। राजस्थानी
पोवाड़ा और गुजराती पोवाड़ु में भी अलग-अलग नामों—‘फूलन दे
रानी’ तथा ‘फूल पंच’—से शहज़ादी नौटंकी की लोकगाथा प्रचलित रही है। बकौल
राजकुमार श्रीवास्तव, “इलाहाबाद के लाला कल्याण
चन्द्र ने ‘सांगीत रानी नौटंकी का’ को इलाहाबाद में प्रदर्शित
किया और तब से लोगों ने ‘स्वांग’ को ‘नौटंकी’ कहना शुरू कर दिया।” मैंने ‘सांगीत रानी नौटंकी का’ तो नहीं देखी है,
लेकिन डॉ. सतीश कश्यप द्वारा निर्देशित तथा अभिनीत स्वांग ‘फूल सिंह नौटंकी’ की प्रस्तुति 17
मार्च 2016 को आजमगढ़ में ज़रूर देखी थी—“भाभी ने जद ताना
मारा, फिर शुरू यहीं से स्वांग होया / मुल्तान शहर की नौटंकी से फूल सिंह का प्यार
होया।” स्यालकोट के राजकुमार फूल सिंह की भाभी बनी संध्या शर्मा ‘नौटंकी’ के रूप-गुण का कुछ यूँ बखान
करती हैं—“वा नौटंकी होड़ मशहूर बसै शहर मुल्तान में / रूप गुणों की
खान, सुथरी शान-बान में / राजा करन सिंह की बेटी सुघड़ी पूरे हिन्दुस्तान में।” प्रसंगवश ‘लैला-मजनूँ’ तथा ‘हीर-रांझा’ की ही तरह ‘फूल सिंह-नौटंकी’ भी पश्चिमी हिन्दुस्तान में लोक-प्रचलित प्रेमगाथा है। एक
तथ्य यह भी है कि हरियाणा में शहज़ादी नौटंकी की गाथा ‘रागिनी’ में गाने की भी परम्परा रही
है। अतः ‘नौटंकी’ को भगत, स्वांग, माच, नाच,
नाचा-गम्मत आदि से बहुत भिन्न नहीं कहा जा सकता। यह बहुत कुछ बिदापत नाच,
बिदेसिया, आल्हा आदि जैसा मामला ही है। भिखारी ठाकुर ने पूर्वांचल में प्रचलित
लोकनाट्य शैली ‘नाच’ में ‘बिदेसिया’ की रचना की थी, किन्तु
कालांतर में यह इतना लोकप्रिय हुआ कि लोगों ने नाट्य-शैली को ही ‘बिदेसिया’ कहना शुरू कर दिया।
मिथिलांचल में प्रचलित कीर्तन कथा-शैली वाले सांगीत में चूँकि विद्यापति के गीतों
का ख़ूब इस्तेमाल होता था, लिहाजा बाद में इसका यही नाम पड़ गया। बुन्देलखण्ड के
योद्धा आल्हा-ऊदल की शौर्यगाथा को केन्द्र में रखकर कवि जगनिक ने रासोकाव्य ‘परमाल रासो’ की रचना की थी। बाद
में यह इतना लोकप्रिय हुआ कि वीर-छंद में रचित इस ‘पंवारा’ का नाम ही ‘आल्हा’ हो गया और अब तो बजाब्ता लोग ‘आल्हा छंद’ में काव्य भी रचते हैं। कहने
की ज़रूरत नहीं कि ‘शहज़ादी नौटंकी’ और फूल सिंह की
प्रेमकथा पर आधारित सांगीत लोगों के दिल में इस तरह घर कर गया कि विधा ही ‘नौटंकी’ बन गई।
जिस प्रकार निर्गुण भक्त-कवियों की दो शाखाएँ थीं—भक्तिमार्गी
तथा प्रेममार्गी; उसी प्रकार ‘विधा’ रूप में नौटंकी की भी दो शैलियाँ विकसित हुईं—हाथरस शैली और
कानपुर शैली। हाथरस शैली (स्वांग) के उन्नयनकर्त्ता पंडित नथाराम गौड़ थे, तो
कानपुर शैली के प्रथम-पुरुष होने का गौरव पंडित कृष्ण पहलवान को प्राप्त है।
हालांकि इन दोनों शैलियों से पूर्व एक अन्य सांगीत-परम्परा ‘भगत’ मथुरा-वृंदावन प्रक्षेत्र
में प्रचलित थी, जिसे उस्ताद जाहरमल ने चरम पर पहुँचाया था। कालांतर में यह हाथरस
शैली में ही लीन हो गई। ख़ैर, हिन्दुस्तान में लोकनाट्य अथवा सांगीत की परम्परा
जितनी प्राचीन है, उतनी ही विविध-रंगी और विस्तृत भी, अतः इस पर कुछ भी अधिकारिक
रूप से कहने से पूर्व जिस गम्भीर अध्ययन और शोध की ज़रूरत है, वह फिलहाल मेरे लिए
अलभ्य है। लेकिन हाँ, नौटंकी के नये-पुराने कलाकारों, कम्पनी संचालकों, विधा के
मर्मज्ञों आदि से संवाद तथा नई-पुरानी नौटंकियों का मंचन देखने से जो समझ बनी है,
उसके आलोक में यह कहा जा सकता है कि भक्तिकालीन प्रेममार्गी शाखा का रीतिकाल में
जो हश्र हुआ, बाद में नौटंकी की भी वही दुर्गति हुई। प्रेमाख्यानकों की अलौकिकता
क्रमशः खण्डित होती गई। मलिक मोहम्मद जायसी ने ‘पद्मावत’ में लिखा था—“तन चितउर, मन राजा
कीन्हा / हिय सिंघल, बुधि पदमिनि चीन्हा / गुरु सुआ जेइ पंथ देखावा / बिनु गुरु
जगत को निरगुन पावा / नागमती यह दुनिया-धांधा / बाँचा सोइ न एहि चित बंधा / राघव
दूत सोई सैतानू / माया अलाउदीं सुलतानू / प्रेम-कथा एहि भाँति बिचारहु / बूझि लेहु
जौ बूझै पारहु।” नौटंकी में विन्यस्त प्रेम-कथाओं पर जिस भांति विचार होना
था, इसे जिस प्रकार ग्रहण किया जाना था, जिस प्रकार प्रस्तुत किया जाना था—नहीं
किया गया। नौटंकी की प्रथम महिला गुलाब बाई हों या उनकी बेटी तथा ‘द ग्रेट गुलाब थिएटर’ की संचालिका मधु
अग्रवाल; विमला थिएटर कम्पनी की मालकिन रहीं विमला देवी हों या
मथुरा की कमलेश लता आर्य; आबिद हों, अज़ीम हों,
चेतगुरु हों या कि कोई और; सबका कथन लगभग एक-सा, “हमारे दौर में ऐसा नहीं था। हम नौटंकी करते थे। नौटंकी के
क़द्रदान लोग थे। बहुत आवभगत होती थी। सम्मान मिलता था। अश्लीलता नहीं थी। आजकल तो
नौटंकी बची ही नहीं। लोगों ने नौटंकी के नाम पर कम्पनी खोल रखी है और दिखाते हैं
वेरायटी। वेरायटी में भी क्या? द्विअर्थी गीत के कैसेट लगा
दिए और लड़कियों को मंच पर भेज दिया—नाचने। अगर किसी ने नौटंकी दिखाने की कोशिश की
तो देखने वाले मार-पीट पर उतारू हो जाएँगे। कलाकारों को बेइज़्ज़त करने लगेंगे। इस
पर भी नहीं माने तो ‘साटा’ करने वाला कहेगा—ले लेना
पैसा, देखें कैसे लेते हो! ...तो ग़लती सिर्फ़ दिखाने
वाले की ही नहीं है, देखने वाले की भी है। कला पीछे रह गई, जिस्म हावी हो गया।
टिकट लाईन की बात अलग थी, तब नौटंकी शुरू होने से पहले टिकट बिकता था। अब भैया
देखनी है तो नौटंकी देखो, नहीं देखनी है तो अपने घर जाओ। दस महीने का रामत होता
था, तम्बू ही हमारा घर-द्वार सबकुछ। ख़ूब पैसा था, ख़ूब पूछ थी। कई बार तो ऐसा
होता था कि लड़की वाले अड़ जाते थे, फलाँ नौटंकी नहीं लाए तो बारात मत लाना। अब तो
दुनिया ही बदल गई है।” नौटंकी के पुराने कलाकारों
की रूदाद सुनते वक़्त कभी महादेवी वर्मा का कथन याद हो आता है तो कभी उषा किरण
ख़ान की कहानी ‘शुरुआत से पहले’ का स्मरण। महादेवी
लिखती हैं—“मैं बचपन में नौटंकियों को बड़े चाव से देखा करती थी। मेरा
आज भी पूर्ण विश्वास है कि लोकनाट्यों की नौटंकी ही एक सशक्त विधा है जिसके
माध्यम से देश की जनता को युग की अपेक्षा के अनुरूप प्रबुद्ध किया जा सकता है।” अधिकांश नौटंकियों के कथानकों से उक्त कथन की तस्दीक़ भी
होती है। ‘सुल्ताना डाकू’ के मंचन पर तो
अँग्रेज़ी हुकूमत ने प्रतिबंध भी लगाया था। गुलाब बाई तथा लाला कल्याण चन्द्र के
कार्यक्रमों पर निगरानी तक रखी जाती थी। अतः निश्चित रूप से ‘नौटंकी’ न केवल प्रभावकारी
नाट्य-विधा थी, बल्कि आज भी है। ‘नौटंकी’ की संरचना ही ऐसी है कि इसकी लोक-ग्राह्यता में कभी कमी
नहीं आ सकती। आजमगढ़ (मार्च 2016), कानपुर और कन्नौज के ठठिया (जुलाई 2016) में ‘नौटंकी’ देखने आई स्त्री-पुरुष की
भीड़ का साक्षी मैं स्वयं हूँ। नौटंकी विशुद्ध मनोरंजन और
सामाजिक/राजनीतिक/धार्मिक संदेश देने वाली विधा थी। इसकी बजाब्ता ‘तालीम’ होती थी, गायकी के लिए
उस्ताद मुक़र्रर होते थे, कलाकारों को छुटपन से ही ‘किताब’ याद कराया जाता था। दुबोला क्या है, छन्द, लावनी, कड़ा,
रेख़ता, डेढ़ तुकी, दादरा, क़व्वाली, ख़्याल, ग़ज़ल, ठुमरी, शिकस्त, बहरे-तबील,
चौबोला आदि क्या हैं और इन्हें कैसे बरतना है? सबकुछ सीखना-बरतना
पड़ता था। सुर-स्वर के साथ अभिनय को साधने के बाद ही कोई ‘नौटंकी का दिलीप कुमार’ अर्थात मुन्ना
मास्टर या राजा मास्टर बन पाता था। बकौल कमलेश लता अब तो हालत यह है कि “नौटंकी करने वालों को उतना पैसा नहीं मिलता है, जितना
कि एक डांस करने वाली लड़की को मिलता है। रात के दो-तीन बजे तक तो सिर्फ डांस ही
चलता रहता है। उसके बाद करेंगे नौटंकी, अब कौन देखेगा, उस वक़्त?” और जब सिर्फ़ ‘डांस’ करने के एवज़ में ही अच्छी-ख़ासी रक़म मिल जाती है तो फिर
कौन ‘किताब’ याद करे और ‘तालीम’ ले। वर्ना सिखाने को तो
कमलेश लता तैयार बैठी हैं, “मैं यहाँ अकेली हूँ। जिसको
भी नौटंकी सीखनी है, मेरे पास आ जाओ। लेकिन सीखने को ही कोई राज़ी नहीं है।” प्रसंगवश बताते चलें कि नौटंकी में नाच-गाने का इस्तेमाल
दरअसल गुज़रे वक़्त की ज़रूरत थी। तब माईक और लाउडस्पीकर नहीं हुआ करते थे।
दर्शकों तक संवाद स्पष्ट पहुँचे, इसके लिए ज़रूरी था कि अदाकार की आवाज़ तो बुलंद
हो ही, साथ ही माहौल भी बिल्कुल शांत हो। सामान्यतः 10-11 बजे रात तक सोने वाले सो
जाते थे। दुनिया के कारोबार स्थगित हो जाते थे और नीरवता छा जाती थी। तो इस आदर्श
वेला के इंतज़ार और श्रोताओं को रिझाए-बाँधे रखने के लिए 8-9 बजे से नृत्य-गीत
शुरू कर दिया जाता था। लेकिन नौटंकी के हित में काम करने वाली यही युक्ति अंततः नौटंकी
के गले का फाँस बन गई। कालांतर में इसने न सिर्फ़ नौटंकी का ‘स्पेस’ हथिया लिया, बल्कि नौटंकी
को बदनाम भी ख़ूब किया।
(भाग-1)

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