“नाच-नौटंकी शुद्ध
मनोरंजन होता, उजरा-मुजरा वर्जित था, पर नौटंकी देखने तो औरतें भी सँपनी गाड़ी
चढ़कर आतीं। औरतों के लिए परदे का इंतज़ाम होता। वैसे, आयोजकों को औरतों का आना
अच्छा नहीं लगता। औरतें आएँगी तो बच्चे आएँगे, बच्चे रहेंगे तो चिल्ल-पों मची
रहेगी, ख़्वाहमख़्वाह रंग में भंग पड़ता रहेगा। इधर जालिम सिंह के चरण मालिनी
आँसुओं से पखार रही होगी, उधर कोई रोंवटिया बच्चा चिल्लाएगा, ‘बाबूजी हो, मैया मरलक हो।’ हँसी का
फव्वारा छूटेगा, सारी संवेदना बिला जाएगी। हुआ न रंग में भंग।”(शुरुआत से पहले) कहने की ज़रूरत नहीं कि ‘नौटंकी’ पहले खेल थी। स्त्री-पुरुष
सभी देखते थे। स्त्री की उपस्थिति आयोजकों को अच्छी नहीं लगती थी, तो उसका कारण था
‘रंग में भंग’ की आशंका। आजकल जो
नौटंकी के नाम पर परोसा जा रहा है, क्या उसे पूर्व की भांति स्त्रियाँ देख सकती
हैं? मैं नौटंकी के पुराने कलाकार अज़ीम मास्टर से मिलकर
रावतपुर गाँव से लौटा हूँ और अभी बगाही बाकरगंज में रम्पत-रानीबाला के घर पर हूँ।
नौटंकी दिखाने की ज़िद के कारण भरी महफ़िल में अपमान झेलने वाले अज़ीम मास्टर की
डबडबाई आँखें मेरी पीठ पर सवार हैं और मेरे सामने बैठे रम्पत अपने ‘क्लाइंट’ से बुकिंग की बात कर रहे
हैं, ‘तीन दिन के तीस हज़ार लगेंगे।’ ग्राहक कहता है, ‘अरे घर का मामला है,
हम बोल के आए हैं इस बार रम्पत का नौटंकी होगा। यार मामा नाक का सवाल है। थोड़ा कम
कर लो।’ बात अटकती है। वह बंदा किसी को फोन करता है। रम्पत कम पर
तैयार नहीं है। उनकी दलील है, ‘छह लड़की होगी।’ ग्राहक कहता है, ‘क्या यार मामा,
कम-से-कम आठ लाओ।’ थोड़ी ज़िच के बाद ‘साटा’ तय हो जाता है। मैं पूरे वार्तालाप का साक्षी हूँ। इसमें ‘नौटंकी’ कहीं नहीं है। केन्द्र में
है—लड़की और उसकी संख्या। वहाँ से खिन्न मन मैं जब बाहर निकलता हूँ तो अपने साथी
से पूछता हूँ—“यह कौन सी नौटंकी है?” वह कहता
है, “सरकारी कार्यक्रमों और कुछ संगठनों को छोड़कर बाक़ी जहाँ
कहीं भी नौटंकी होती है, वह यही होती है।” लेकिन फिर पता चलता
है कि हम-आप कला के नाम पर चाहे जो कह-कर लें, लेकिन रम्पत नहीं हो तो बहुत से घरों
में चूल्हा जलना मुश्किल हो जाएगा। साल-छह महीने में किसी कलाकार को एक ‘रोल’ और उसके एवज़ में
हज़ार-पन्द्रह सौ रूपये दे देने से क्या ज़िन्दगी चल जाएगी? अगर नहीं तो फिर ‘शुद्धता’ के चोले को अंततः क़फ़न में ही तब्दील होना है। ठीक है, आतमजीत
सिंह की ‘लैला-मंजनूं’ के चश्मे से देखें
तो रम्पत की ‘लैला-मजनूं’ बिल्कुल फूहड़ हैं,
वे बहरे-तबील और चौबोले की जगह पर सस्ते फिल्मी गाने ज़्यादा गाते हैं। लैला और
कैश के बीच ‘मदरसे’ में जो पाक मुहब्बत परवान
चढ़ सकती थी, उसको जोकर के द्विअर्थी संवाद दूषित बनाते हैं। लेकिन साहब पेट तो
इसी से चलता है। नौटंकी के परम्परागत कलाकारों के जीवन-बसर की कोई और राह न तो
कला-संस्थानों/विभागों ने निकाली है और न ही कला में आ रही गिरावट और अश्लीलता पर ज़ार-ज़ार
रोने वाले कला-प्रेमियों ने। बल्कि नौटंकी के स्वर्णिम अतीत को वर्तमान करने की
दिशा में क्रियाशील लोगों के प्रति भी इनके मन में कुढ़न और आक्रोश है। एक कलाकार
ने राहत इंदौरी का शेर पढ़ा, “कल तक दर दर फिरने वाले, घर के
अन्दर बैठे हैं / और बेचारे घर के मालिक, दरवाज़े पर बैठे हैं”। हालांकि इनसे यह
पूछा जा सकता है कि जब आप घर में थे तो घर की मर्यादा का ध्यान क्यों नहीं रखा? अपनी कला को, इस विधा को, इसके स्वर्णिम शिखर से च्युत
क्यों किया अथवा होने दिया? अगर उसी वक़्त तमाम
कलाकारों ने श्याम सुंदर का विरोध किया होता तो ‘वेरायटी’ की नींव ही नहीं पड़ती। ख़ैर, मकान तो जैसा कल था, आज भी
है, बस मक़ीन बदल रहे हैं। नौटंकी के परम्परागत कलाकारों के बहुत से तम्बू उखड़ गए
हैं, कुछ हैं जो अब भी अपना अस्तित्व बचाए हुए हैं। नये-पुराने अभिनेताओं, नई-पुरानी
कहानियों और साज-सज्जा के साथ नौटंकी अब भी जारी है।
आज़मगढ़ में जो ‘जजी का मैदान’ है, वहाँ नौटंकी की महफ़िल सजी है। मैदान नौटंकी के
दीवानों से अटा पड़ा है। अतुल यदुवंशी के निर्देशन में नौटंकी ‘पंच परमेश्वर’ की प्रस्तुति (16
मार्च 2016) बस शुरू ही होने वाली है। नक़्क़ारची नगीना ने ‘नक़्क़ारे’ पर ज्यों ही ‘चोब’ दिया, माहौल बदल गया।
ठुमकते हुए रंगा-रंगीली मंच पर आ धमके—“जुम्मन शेख चौधरी
अलगू, थे दो पक्के यार / धर्म का नाता ना था ना ही, खान-पान व्यवहार”। प्रेमचंद की कहानी ‘पंच परमेश्वर’ से हम सभी वाक़िफ़ हैं। जुम्मन-अलगू की दोस्ती और दुश्मनी
के बीच में ‘न्याय’ आ खड़ा हुआ है। एक-एक
संवाद, एक-एक बहरे-तबील और चौबोले पर दर्शक बिछे जा रहे हैं, तालियाँ बजा रहे हैं।
ख़ाला और करीमन में मुक़ाबला है। करीमन ने बहरत (बहरे तबील) में ख़ाला को दाँव
दिया—“देकर ऊसर हमें मोल है ले लिया / सबको खा करके इसका तो
निकलेगा दम / जितने झोंके हैं रूपये तेरे पेट में / उतने से आज तक गाँव ले लेते हम”। ख़ाला भी कम नहीं, करीमन को उसी के अंदाज़ में चुनौती दे
रही हैं—“खा रही हूँ तेरा, मेरा कुछ भी नहीं / दे दे मेरा मुझे मैं
ही हट जाऊँगी / तेरे जैसा ना झूठा मैं वादा करूँ / दे दे हक़ तू मेरा न पलट आऊँगी”। मामला पंचायत तक आ पहुँचा है। अलगू अपने दोस्त के ख़िलाफ़
जाने से झिझक रहा है और ख़ाला छंद सुना रही है—“बोलोगे
ना, ईमान की, क्या दोस्ती के डर से तुम / विपदा अपनी कह दिया, मानो न माने मनके
तुम”। ईमान की बात तो ये है कि सोनम सेठ का ख़ाला के रूप में
अभिनय ज़बर्दस्त था। गौरव, नीरज, शालिनी और शालिनी (रूद्रा) की संवाद अदायगी का
अंदाज़ और गायिकी मन मोहने वाली थी। मुझे नौटंकी का यह परिमार्जित वर्तमान सुखद लगा।
हिन्दुस्तान की गंगा-जमुनी संस्कृति और न्याय-प्रेम का ऐसा प्रांजल प्रत्यक्षीकरण
मुग्धमन देखता मैं ‘टिकट लाइन’ और ‘रम्मत’ वाली नौटंकी की स्मृतियाँ
टटोल रहा था। तब नौटंकी के तम्बुओं में छोटा-छोटा हिन्दुस्तान बसा करता था। कौन
हिन्दू, कौन मुसलमान? पुराने कलाकारों की ज़ुबानी कभी गुलाब बाई तो कभी किसना
बाई के क़िस्से सुनता हूँ। नौटंकी के तम्बू में पैदा हुए बच्चे, धीरे-धीरे बड़े हो
रहे हैं, उनके लिए वे ‘बाई’ नहीं ‘माई’ हैं। वे काम की इच्छा जताते हैं और ‘माई’ तन्ख़्वाह तय कर देती हैं।
बच्चा कलाकार बन जाता है। थोड़े परिवर्द्धित रूप में इलाहाबाद का स्वर्ग रंगमंडल
इसी भूमिका का निर्वाह कर रहा है।
आधुनिक दृष्टि, कथ्य और शिल्प से लैस ‘पंच परमेश्वर’ को देखने के बाद
हाथरस शैली की परम्परागत नौटंकी ‘शंकरगढ़ संग्राम’ (17 मार्च 2016) हुई। आल्हा-खंड का क़िस्सा है। नौटंकी
पंडित नथाराम शर्मा गौड़ ने लिखी है। निर्देशन मथुरा के किशन स्वरूप पचौरी का है। आल्हा-उदल
उड़न बिहार से अपने भांजे जगन की शादी के बाद लौट रहे हैं। उरई का राजा माहिल
चुग़लख़ोर है, वह शंकरगढ़ के राजा शंकर सिंह को भड़काता है और शंकर सिंह जगन की
दुल्हन जमुना का अपहरण करवा लेता है। जमुना के रूप-सौंदर्य पर शंकर सिंह मोहित हो
जाता है। जमुना युक्ति से काम लेती है। वह शर्त रखती है कि पहले महोबे वालों को
हराओ, फिर मेरे पास आओ। आल्हा को इस अपहरणकांड का पता चल जाता है। वह नवल सिंह को
मालिन के भेष में शंकरगढ़ भेजता है। वह दरबार में पहुंचता है—“किसी से होय ख़फ़ा कोई नार / पहनवा दो मुझसे ये हार / वो
क्षण में होगी ताबेदार / जो मानो झूठ अभी अज़मा लो / मेरे हारों को सरकार”। जमुना के मोह में अंधा शंकर सिंह, नवले को रनिवास में भेज
देता है। यहाँ नवले से शंकर सिंह की बेटी कमला को प्यार हो जाता है। ‘ज़िले की ठुमरी’, सवैया, कवित्त,
आसावरी, रागनी, वशीकरण जैसे छंदों से लबरेज़ यह नौटंकी अंततः आल्हा-उदल की विजय और
शंकर सिंह की पराजय के साथ ही प्रेम का संदेश देती हुई सम्पन्न होती है। ‘शंकरगढ़ संग्राम’ से ही रेख़ता का एक
उदाहरण देखिए—“करते विनती बारम्बार, बना लो हमको रिश्तेदार / छोड़ो नफ़रत
आज से, सबको ये पैग़ाम / सिर्फ़ मुहब्बत से बने सारे बिगड़े काम”। शैली कानपुर वाली हो या हाथरस वाली, नाम स्वांगीत हो,
स्वांग हो या नौटंकी, संदेश प्रेम और भाईचारे का ही है। बहरहाल, ‘शंकरगढ़ संग्राम’ हाथरस की परम्परागत
शैली का उदाहरण था, तो ‘सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र’ (19 मार्च 2016) ने कानपुर की परम्परागत शैली से परिचित
कराया। मंच पर तारामती की भूमिका में ख़ुद ‘द ग्रेट गुलाब थिएटर’ की सरबराह मधु अग्रवाल थीं, जबकि उनके अपोज़िट हरिश्चन्द्र
का चरित्र शाहिद निभा रहे थे। हमने पाया कि कानपुर शैली में अभिनय पक्ष हाथरस शैली
की बनिस्बत अधिक मज़बूत था। कमलेश लता आर्य जो अब मथुरा में रहती हैं, इस बात की
तस्दीक़ करती हैं कि कानपुर शैली में अभिनय की बारीकियों पर विशेष ध्यान दिया जाता
था। उन्हें इसका इक़रार है कि ख़ुद भी अभिनय की बारीकियाँ उन्होंने वहीं कानपुर
में काम के दौरान सीखी थी। हालांकि वह हाथरस शैली की गायिकी को कानपुर की तुलना
में अधिक श्रेष्ठ मानती हैं। वह एक संस्मरण सुनाती हैं—“शिकोहाबाद की कृष्णा कुमारी बृज क्षेत्र की बड़ी नामी
गायिका और अदाकारा थीं। उन्हीं के मुक़ाबले में मुझे यहाँ मथुरा लाया गया था। लेकिन
कृष्ण की जन्मभूमि से ऐसा नेह लगा कि यहीं की होकर रह गई। ...एक पूरणचन्द्रजी थे,
चंदपा वाले। आवाज़ बहुत दमदार थी। उनका शारीरिक सौष्ठव किसी मल्लयुद्ध वाले पहलवान
जैसा था। अभिनय के दौरान वह मंच पर भी अभिनेत्री से एक दूरी बनाकर रखते थे।
पात्रानुकूल अगर मैं उनको छूती तो कहते—‘मोये हाथ मत लगावौ,
दूर ते बात करौ मू तै’, मैं पूछती—‘क्यों?’ तो कहते—‘मो ना अच्छो लगै।’, मैं कहती—‘पंडतजी, इस खेल में मैं तो पत्नी के रूप में हूँ और आप पति
के रूप में हैं। आपको बात सुनानी है मुझे तो आपने तो मेरी तरफ से पीठ फेर ली और
मैं पीठ से बात कर रही हूँ तो हाव-भाव मेरा क्या होगा, आप ग़लत मत समझो—मुझे।
हमलोग अभिनय कर रहे हैं। ...अब तुम्हीं बताओ (मुझको सम्बोधित), मंच पर आप जिस
पात्र को जी रहे हैं, परिस्थिति के अनुकूल वैसा ही आपको व्यवहार भी करना होगा ना! अब रोहिताश्व का शव सामने पड़ा है और तारामती उससे दूर
बैठी छाती पीट रही है तो इससे माँ का दर्द कहाँ उद्घाटित होता है। किसी माँ के
जिगर का टुकड़ा मर जाए और माँ दर्द और पीड़ा से विह्वल होकर यदि उसके शव को अपने
छाती से न लगाए और दूर खड़ी रो-रोकर सिर्फ दोहे-चौबेले गाती रहे, तो दर्शकों को
कैसा लगेगा!” इस प्रकार वह संकेत रूप में यह बताती हैं कि कानपुर की
तुलना में मथुरा-हाथरस की जो परम्परा रही है, वह बहुत हद तक शुचितावादी रही है।
प्रसंगवश उमेशचन्द्र शर्मा की बात याद आती है—“मथुरा-वृंदावन में
अखाड़े की परम्परा थी। अब भी कुछ अखाड़े यहाँ बचे हैं। तो प्रत्येक अखाड़े का एक
उस्ताद होता था और एक ख़लीफ़ा। उस्ताद स्वांग रचता था, ख़लीफ़ा प्रस्तुति का
बंदोबस्त करता था। प्रत्येक अखाड़े के अपने-अपने कलाकार होते थे और अपना-अपना
इलाक़ा होता था। एक अखाड़े का कलाकार दूसरे अखाड़े के साथ काम नहीं कर सकता था।
...फटकेबाज़ी होती थी, दो अखाड़ों के बीच, ख़ूब मुक़ाबला चलता था और लोग अपने
इलाक़े के कलाकारों की सजधज का पूरा ख़्याल रखते थे। कई बार तो ऐसा होता था कि
इलाक़े के जौहरी अपना सारा ज़ेवर दुकान से निकाल, कलाकार के तन पर लाद देते थे।
वज़न से कलाकार कहीं गिर न पड़े, इसलिए कलाकार को पीछे से एक-दो लोग थामे खड़े
रहते थे। यहाँ सारा अभिनय वाक्-चातुर्य और आँखों के हाव-भाव पर ही निर्भर था।
तालियाँ ‘आलाप’ और ‘ठहराव’ पर बजती थीं।” 18 मार्च को हमने वृंदावन के जाहरमल अखाड़ा के उस्ताद रमेश
गौतम निर्देशित भगत ‘सुभद्रा हरण’ की प्रस्तुति देखी
थी। इसमें कृष्ण की भूमिका में होतीलाल पाण्डेय और सुभद्रा की भूमिका में लता रानी
थीं। इस प्रस्तुति ने उमेशचन्द्र शर्मा के कथन को प्रत्यक्ष कर दिया था और हमारी
एक शिकायत जो थी कि ‘हाथरस शैली की नौटंकी में गायिकी तो रोमांच उत्पन्न करने
वाली है लेकिन कलाकारों में अभिनय कौशल न के बराबर है’, वह भी जाती रही।
वैसे अब मथुरा हो या कानपुर—नौटंकी नये साँचे में ढल रही
है। अतुल यदुवंशी, आतमजीत सिंह, पारसी थिएटर की जानी-मानी हस्ती ज़फ़र संजरी जैसे
लोग हैं, जो अपनी नई चाल से पुरानी नौटंकी का पोषण कर रहे हैं, जिसका सुफल विभिन्न
मंचों पर नज़र भी आने लगा है। ज़माने बाद नौटंकी का नैसर्गिक आस्वाद, नथाराम लिखित
‘लैला मजनूँ’ की आतमजीत सिंह के
निर्देशन में हुई प्रस्तुति (20 मार्च 2016) में मिला— “मकतब के जाने से दिल रहता था लगा हमारा / जाता था दिन गुजर
यों ही पढ़ने लिखने में सारा / मकतब के लड़कों में एक लड़का था कैस बिचारा / मुझे
चाहता था अज़हद मुझको भी था वह प्यारा”। पता नहीं कितनी बार
दुर्गा पूजा और विश्वकर्मा पूजा के मौके पर मैंने इस नौटंकी का मंचन देखा होगा, लेकिन
ऐसी नफ़ासत और अंदाज़े-बयाँ से पहली बार रू-ब-रू हो रहा था। लैला की माँ बनी,
प्रतिमा श्रीवास्तव का बिल्कुल सख़्त चेहरा और लैला बनी श्रुति मिश्र की रुआँसी और
खोई-खोई आवाज़ में यह चौबोला, उफ्फ! दिल था कि महीनों
बाद वहीं उस दृश्य पर अटका रहा। “क्यों बेहया थुकावा, मुझको
बना रही है / छूटे न कैस मुझसे, क्या तू छूटा रही है / जिसे चाहती है टूटी उल्फ़त न है वो
झूटी / पक्के पै रंग कच्चा, नाहक चढा रही है”। लैला की जुदाई ने
कैस को दीवाना बना रखा है। लैला का दीदार हो जाए, बस इसी चाह में भटक रहा है। इधर,
लैला की हालत भी ठीक नहीं है, बीमार लैला पुकार रही है—“मेरे सरताज दिलवर दिलोजाँ सनम, दम ख़तम
मेरा होता है आ जा ज़रा / प्यारे गुच्चेदहन गुलबदन माहरू, अब
मिलेगा कहाँ तू बता जा ज़रा / बज रहा है नक्कारा मेरे कूच का, गुलहजारे
गले से लगा जा ज़रा / चाँद चेहरा दिखा और उढ़ाके कफ़न, गोर में अपने हाथों सुला जा
ज़रा”। लैला की तड़प मानो वहाँ बैठे हर-इक शख़्स की तड़प है।
आँखों के कोर गीले होने लगे हैं। रेगिस्तान का दृश्य है और लैला-मजनूँ गोया सदियों
बाद मिल रहे हैं। लैला अपना हाल, बहरे तबील में बयान कर रही है—“तुमने सदमे पै सदमे जिगर पै सहे, तो न
सुख नींद से मैं भी सोई सनम / प्यारे हर एक साअत तुम्हारी कसम, अश्क
दरिया बहाते ही खोई सनम / जब से फ़ुरकत हमारी तुम्हारी हुई, तब से
आराम पाया न कोई सनम / रोते रोते रही ताब तन में नहीं, ऐसी रोई
सनम ऐसी रोई सनम”। नौफ़िल के किरदार में अजय मुखर्जी ने ख़ूब गुदगुदाया।
सबके-सब अपने-अपने किरदार में कुछ इस क़द्र खोए थे कि अनुभूति के स्तर पर कहीं कोई
रिक्तता नहीं थी।
इश्क़ लैला से हो, या कला से, दिल को निचोड़े बिना बात नहीं
बनती। करने वालों के लिए नौटंकी तब महज खेल नहीं होती थी। हो भी नहीं सकती थी
क्योंकि उनकी रग़ों में ख़ून के साथ-साथ नौटंकी का जुनून भी बहा करता था, वरना
कौन है जो अभिनय की ख़ातिर अपना सच्चा ख़ून दे सके! एक दृश्य है, जिसमें मजनूँ को
चुनौती दी जाती है कि अगर लैला से इतना ही प्यार करते हो तो उसको अपना ख़ून क्यों
नहीं देते? और मजनूँ बात पूरी होने से पहले ही अपने बाज़ू घायल कर
लेता है। पहले के तमाम कलाकार जिन्होंने कभी मजनूँ का अभिनय किया था, आप उनके
बाज़ुओं पर ज़ख़्म के निशान आज भी देख सकते हैं। अज़ीम मास्टर हों, आबिद साहब हों,
कमलेश लता आर्य हों, मुन्ना मास्टर हों या कोई अन्य सभी ने मंच पर लैला की ख़ातिर
अपना सच्चा ख़ून दिया है। इनसे गुफ़्तगू के बाद ही यह बात समझ में आती है कि आज
तमाम बदनामियों के बावजूद ‘नौटंकी’ शब्द सुनते ही, लोगों के लब खिल क्यों जाते हैं! कमलेश लता आर्य बीते दिनों को याद करती हैं—“मजनूँ का रोल करने वाला कलाकार किसी वजह से नहीं आ पाया था,
तो मुझसे कहा गया कि तुम मजनूँ बन जाओ। तब होता ये था कि मजनूँ को अपना सच्चा ख़ून
देना पड़ता था। मैं भी मंच पर ‘ब्लेड’ लेकर गई थी। जोश में कुछ ज़्यादा ही कट गया और ख़ून इतना
बहा कि पूरी कालीन भींग गई। खेल को बीच में रोकना पड़ा, मेरी पहले मरहम-पट्टी की
गई, तब जाकर फिर से खेल शुरू हुआ।” मुझे होतीलाल, लता
रानी, पंडित रामदयाल शर्मा, देवेन्द्र शर्मा, शाहिद, हरिश्चन्द्र, साजन कुमार जैसे
कलाकारों में नौटंकी के प्रति यही जज़्बा नज़र आता है।
शाहिद को दोबारा कानपुर में ‘सुल्ताना
डाकू’ के किरदार में देखा था। जिस तरह से इस पुरानी नौटंकी में
समसामयिक टिप्पणियों को समाविष्ट किया गया था, वह क़ाबिले-तारीफ़ था। इस तरह देखें
तो परम्परागत नौटंकी मंडलियों पर जो लकीर पीटने का आरोप लगता रहा है, उसको मधु
अग्रवाल ने चुनौती देने की कोशिश की थी। जोकर के रूप में साजन कुमार मंच पर हावी
नज़र आए। एक बानगी देखिए—‘सरकार का क्या मतलब होता है?’ —‘जो सरक-सरक के काम करे।’, और गौरमेंट का मतलब? –‘जो मिनट-मिनट में गौर करे’। तो एक
स्वतंत्रता-पूर्व के कथानक में वर्तमान व्यवस्था पर व्यंग्य का समावेशन, महादेवी
वर्मा के कथन को पुष्ट करते हैं। आतमजीत सिंह निर्देशित तथा मुद्राराक्षस रचित
नौटंकी ‘आला अफसर’ (ठठिया, 16 जुलाई 2016) भी
स्वातंत्र्योत्तर भारत की भ्रष्ट व्यवस्था और सामाजिक कदाचार पर केन्द्रित थी। नौटंकियाँ
और भी कई देखीं, मसलन—‘कर्मेव धर्मः’, ‘बूढ़ी काकी’, ‘बहादुर लड़की उर्फ औरत का
प्यार’, ‘भक्त पूरनमल’, ‘पद्मावती का झूला’ आदि, लेकिन जिस नौटंकी ने बृज-क्षेत्र में भटकने के दौरान
लगातार पीछा किया, वह थी—ज़फ़र संजरी द्वारा रूपांतरित और निर्देशित ‘बाबूजी’। इसकी दो प्रस्तुतियाँ (15
जुलाई को कानपुर में तथा 28 सितंबर 2016 को जम्मू में) मैंने देखी है। यह मिथिलेश्वर
की कहानी का नौटंकी-रूपांतरण है। यह एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जो ‘नौटंकी’ से प्यार के कारण परिवार और
समाज दोनों द्वारा बहिष्कृत और तिरस्कृत होता है। बाबू लल्लन सिंह सबकुछ सहते हैं
लेकिन नौटंकी नहीं छोड़ते। नौटंकी के कलाकारों को संरक्षण देते हैं। पत्नी जब
कलाकार ‘सुंदरी’ को घर से निकालने की कोशिश
करती है तो बाबूजी विरोध करते हैं—“ये हुनरमंद हैं
एक-से-एक सबके-सब / मेरी टोली के हैं, मेरे ग़मख़्वार हैं / मेरे ग़मख़्वार हैं, सब
वफ़ादार हैं / देखो ये कितनी अच्छी कलाकार है / इसका मिलना ज़माने में दुश्वार है”। लेकिन तारा समझने को तैयार नहीं। हम ही कहाँ समझ पाते हैं
कला और कलाकार की महत्ता! अगर समझते तो नौटंकी और
उसके परम्परागत कलाकारों की ऐसी दुर्दशा तो न होती! नौटंकी
को आज बाबू लल्लन सिंह जैसे आशिकों और संरक्षकों की सख़्त ज़रूरत है। ख़ैर, बाबू
लल्लन सिंह की नौटंकी के दीवाने बहुत हैं। ठाकुर रामभजन सिंह को तो यही नहीं पता
कि वह जिसकी बेटी ब्याहने आए हैं, और ब्याह में जिसको नौटंकी के लिए बुलाया है,
दोनों एक ही हैं। बड़कउ को कला की अहमियत नहीं पता, लेकिन हाँ, छुटकउ को पिता से
सच्ची सहानुभूति है। कौन ठिकाना कल को, छुटकउ के सहारे बाबू लल्लन सिंह नौटंकी फिर
से जी उठे!
बाबूजी की हत्या का पूरा घटनाक्रम बड़ा ही त्रासद है। अयाज़
ख़ान, सीमा सोनी, सरिता सोनी और मनीष दूबे क्रमशः बाबूजी, तारा, सिंदूरी और छुटकउ के
रूप में प्रभावित करते हैं। बाबूजी की लाश मंच पर पड़ी है, लेकिन मुझे कुछ और
सुनाई दे रहा है—“मैं शरण हूँ, शरण हूँ, शरण हूँ शरण / शरणाई की लज्जा निभाओ
पिया / फूल फल रूखे सूखे या ठंडे गरम / टुकड़े खाऊँगी जैसे खिलाओ पिया / मैं तो मन
कर्म वचन से तुम्हें वर चुकी / मत मने कर मेरा मन दुखाओ पिया / राज धन धाम से काम
मुझको न कुछ / अपने चरणों की दासी बनाओ पिया।” यह है तो नौटंकी ‘सत्यवान-सावित्री’ में सावित्री का
कथन। लेकिन मुझे लगता है कि यह ‘नौटंकी’ के प्रत्येक परम्परागत कलाकार की टेर है, जो नक़्क़ारख़ाने
में तूती की तरह दम तोड़ रही है। मुझे बाबूजी के बेटे छुटकउ से बहुत सी उम्मीदें
हैं। अपनी मौत के बाद बाबूजी का जी उठना भी इस बात का संकेत है कि कला और कलाकार
दोनों कभी पूर्णतः मृत्यु को प्राप्त नहीं होते। यही वह नुक़्ता है, जिसका ज़िक़्र
ग़ैरज़रूरी नहीं है। “जाता है जो यहाँ से, वापस
कभी न आता / होता है जीते जी का, भाई बहन का नाता / नहीं बाप है किसी का, कोई नहीं है माता / खाली ये तन है
अपना, और सर पे है विधाता / जारी यूँ ही रहेगा, क़ुदरत का कारखाना; जारी यूँ ही रहेगा, कुदरत का कारखाना।” ठीक है, सारे रिश्ते बेमानी हैं, लेकिन इश्क़ तो सच्चा है।
इसलिए लोकनाट्य की शहज़ादी ‘नौटंकी’ थी, अब भी है। अभी कारख़ाना बंद नहीं हुआ है।

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