सन 1968 की घटना है। आत्मा राम की एक फ़िल्म आई थी। फ़िल्म का नाम था—शिकार। शिकार के लेखक थे—अबरार। अबरार यानी संत पुरुष। शिकार में एक गीत था। गीतकार थे—हसरत (जयपुरी) और आवाज़ थी आशा (भोसले) की, जिन्हें आजकल आशा ताई कहने का फ़ैशन है। यह बहुत कुछ मैक्लूहान के ‘ग्लोबल विलेज़’ या भारतीय संस्कृति के स्वर्गीय राग ‘वासुधैव कुटुम्बकम’ की तर्ज़ पर नया-नया तैयार हुआ उत्तर आत्मीय शब्दबंध है। गीत के बोल थे—“पर्दे में रहने दो, पर्दा न उठाओ / पर्दा जो उठ गया तो भेद खुल जाएगा।” फिल्म में मुख्य भूमिका ‘धर्मेन्द्र’ की थी जो ‘अजय’ बने थे और नायिका का नाम ‘किरण’ था, जिसको पर्दे पर जीने की ज़िम्मेदारी पुनश्च आशा (पारेख) ने निभाई थी। मैं आगे बढ़ने से पहले आपको सचेत करना चाहता हूँ कि उपरोक्त विवरण को आप फिल्मी डिस्क्लेमर की तरह काल्पनिक मानने की भूल न करें, क्योंकि ऐसा करते ही आप वर्तमान में आ जाएँगे। न सिर्फ़ आ जाएँगे, बल्कि खो भी जाएँगे और खोने के बाद आप जो हैं, वह नहीं रह पाएँगे। ऐसे में इस ‘मैं-मैं’ के ज़माने में मुमकिन है कि आप कबीर-रोग अर्थात ‘तू-तू’ के शिकार हो जाएँ! अतः सावधान! वैसे यदि आप आत्मा, राम, अबरार (संत), धर्म, इन्द्र, अजय, हसरत, आशा, किरण, पर्दा, रहस्य आदि का स्मरण रखेंगे तो अच्छा ही रहेगा।
हम मूल कथ्य पर लौटते हैं। नायक बार-बार इसरार कर
रहा है और नायिका है कि इठला-इतरा रही है। नायक हुस्न को बेनक़ाब देखने को उतावला
है। नायिका समझा रही है कि बेनक़ाबी बच्चों के देखने-समझने की चीज़ नहीं है,
ज़्यादा ज़िद न करो। वह सावधान करती है कि ध्यान रहे मैं ‘जब ज़रा भी नक़ाब उठाऊँगी, याद रखना कि जल ही जाओगे।’ लेकिन नायक है कि लाजवाब समाँ देखने और होश खोने को मरा जा रहा है। नायक को
अपने ‘अजय’ होने का ग़ुरूर है। उसने शायद
अपनी दादी अम्मा से परियों वाली कहानी नहीं सुनी है! अरे वही, जिसमें ‘पीछे मुड़कर न देखने’ की नायक को चेतावनी हुआ करती
थी—मुड़े कि पत्थर के बन जाओगे या फिर जलकर ख़ाक। उसे नायक से हमदर्दी है। वह नहीं
चाहती कि उसका अनिष्ट हो। जबकि नायक है कि ज़िद पर अड़ा है। ऐसे में वह परेशान
होकर कहती है, ‘हाय! जिसने मुझे बनाया है / वो
भी मुझको समझ न पाया है / मुझको सजदे किए हैं इंसां ने / इन फ़रिश्तों ने सर
झुकाया है।’ इससे पहले कि आप मामले को स्त्री-विमर्श की तरफ
झुकता महसूस करें, मैं बता दूँ कि लेख मीडिया पर केन्द्रित है। वैसे भी, जो ख़ुद ‘अबरार’ हो, वह स्त्री-द्वेषी या विषय-वासना से युक्त
क्योंकर होगा भला! लेकिन ये जो हसरत है, इसका
क्या किया जाए! असली बात तो पर्दे की है। पर्दा यानी पहरा; व्याकरणिक दृष्टि से दोनों समानार्थी नहीं होने के बावजूद समान अर्थ का वहन
करते हैं। आप राजनीतिक स्वार्थ के वशवर्ती होकर भले पर्दा का विरोध करें, किन्तु
यह प्रथा जीवन, धर्म, समाज, मीडिया, सत्ता-व्यवस्था आदि के लिए अत्यावश्यक है।
आपने ग़ौर किया हो कि सरकारें जब बनती हैं और किसी को मंत्री अथवा कोई संवैधानिक
दायित्व सौंपा जाता है तो उसे शपथ दिलाई जाती है। शपथ का जो सबसे ‘लाउड’ कथ्य है वह है—गोपनीयता। गोपनीयता अर्थात
पर्दादारी। पर्दादारी के लिए ओट, पर्दा, नक़ाब, घूँघट या फिर ऐसे ही किसी अन्य शब्द
का इस्तेमाल भी आप कर सकते हैं।
यह कहने में झिझक नहीं कि पर्दा आकर्षण पैदा करता है।
पर्दा उत्कंठा जगाता है। पर्दा रहस्य को गहराता है। पर्दा यथार्थ को छुपाता है।
पर्दा मनुष्य की कल्पनाशीलता को जगाता है। पर्दा बेचैनी को भी बढ़ाता है। पर्दा
ख़ुशफ़हमियाँ पैदा करता है। पर्दा आपके यक़ीन को, विश्वास को बनाए-बचाए रखता है।
तात्पर्य यह कि यदि शब्दकोश से बस यही एक शब्द ‘डिलीट’ कर दिया जाए तो संसार और इसका सारा क्रिया-व्यापार अपना आकर्षण खो देंगे। ‘पर्दा’ केवल शब्द नहीं है। हालांकि कोई भी शब्द केवल शब्द
नहीं होता। सभी शब्द कम-से-कम एक-एक भाव तो अवश्य ही वहन करते हैं। अब आप यदि धार्मिक-राजनीतिक-सामाजिक-कूटनीतिक
गलियारों में जो मोटे-मोटे पर्दे टंगे हैं, हटा देंगे तो क्या होगा? जो होगा, वही तो हो रहा है—आजकल। मैं जैसे-जैसे व्यस्क होता गया हूँ,
पुस्तकों में दर्ज़ कथ्यों की संदिग्धता भी मेरी निगाह में बढ़ती गई है। सच कहूँ
तो ‘शब्द’ सबसे गझिन और सबसे बारीक
पर्दा है। दिक़्क़त यह है कि पर्दा हटाते हैं तो कुछ नहीं बचता और पर्दा नहीं
हटाते हैं तो कुछ दिखता भी नहीं। देखने के लिए शब्द की ज़रूरत भी है और विडंबना यह
कि देखने में जो सबसे बड़ा बाधक तत्त्व है, वह भी शब्द ही है। अब देखिए न शब्दों
के माध्यम से ही मैं शब्द का विरोध कर रहा हूँ। ऐसी स्थिति में जीत किसकी होगी? जानता हूँ, शब्द ही जीतेगा लेकिन फिर भी संघर्ष कर रहा हूँ। संघर्ष इसलिए
नहीं कि जीतना है, बल्कि संघर्ष मनुष्य की सामान्य प्रवृत्ति है। प्रयत्नों से आप
थक सकते हैं, प्रवृत्ति से नहीं। यह साँस की तरह है। यह अपने ही शरीर के भार की
तरह है, जो होकर भी नहीं है।
ख़ैर, बात पर्दे की हो रही थी। प्राचीन काल में
गुरु अपने ज्ञान को गुप्त रखता था। गुरुकुल में निवास करने वाले कुछ ही योग्य
शिष्य ऐसे होते थे, जिन्हें गुरु आपना गुप्त ज्ञान दिया करता था। ज्ञान पर पहरेदारी
और पर्देदारी की अनंत कथाओं से ग्रंथ भरे पड़े हैं। बहुत सी श्रुतियाँ और
किन्वदंतियाँ हैं, जो आज भी लोग मौक़ा-बेमौक़ा सुनते-सुनाते रहते हैं। गुरुकुल को हम
अपनी-अपनी श्रद्धानुसार परिवार, राज्य, देश या कि विश्व मान सकते हैं। वैसे भी
वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में ये सब एकमेक नज़र आते हैं। कुछ ख़ास भेद रहा नहीं।
लोग बौखलाए हुए हैं। उन्हें लगता है कि वह सबकुछ जो अमानवीय है, अनिर्वचनीय है,
घृणित है, दुखद और अकल्पनीय है—सब अभी ही हो रहा है या होना शुरू हुआ है। जबकि
दुनिया जैसी पुराकाल में थी, वैसी ही आज भी है। फ़र्क़ बस पर्दे का ही पड़ा है। आप
कल भी असहिष्णु थे, लेकिन संकोच का पर्दा पड़ा था। आप कल भी जातिवादी थे, लेकिन
आदर्श का पर्दा पड़ा था। आप पहले भी स्वार्थी थे, लेकिन त्याग का पर्दा पड़ा था। आप
पहले भी हिंसक थे, लेकिन अहिंसा का पर्दा पड़ा था। आप पहले भी बलात्कारी थे, लेकिन
शील का पर्दा पड़ा हुआ था। आप पहले भी हत्यारे थे, लेकिन...। रहने दीजिए। वाचालता
के इस दौर में भी ‘कम कहना ज़्यादा समझना’ को ही अच्छा माना जाता है। मतलब यह कि अपात्र तक ज्ञान अथवा सूचना की पहुँच
अथवा सत्ता तक अपात्र की पहुँच से स्थितियाँ जटिल होती हैं। हमारा वर्तमान इसीलिए
अधिक जटिल है। लोग दूसरों की जवाबदेही तय करने की जल्दबाज़ी के शिकार हो रहे हैं।
सभी को अपना-अपना हिस्सा चाहिए। मीडिया में, सरकार में, नौकरी में, विचार में...
यहाँ तक कि व्यभिचार में भी। इन शॉर्ट—नग्नता वर्तमान का केन्द्रक है। जब समाज,
सत्ता, धर्म—सब नग्न हो उठे हों तो मीडिया से पर्दादारी की अपेक्षा को बालपन ही
कहेंगे। जो लोग मीडिया के उद्भव और विकास-क्रम से परिचित हैं, उनके लिए मीडिया का
वर्तमान चरित्र हैरतअंगेज़ बिल्कुल भी नहीं है। मीडिया जो कल कर रहा था, वही आज कर
रहा है और कल भी वही करता रहेगा। आप अपने को अजय समझ रहे हैं तो यह आपकी ग़लतफ़हमी
है। मीडिया के चेहरे पर जन-पक्षधरता का जो नक़ाब चढ़ा था, आपने अपनी ज़िद और
स्वार्थ के चक्कर में उसको हटा दिया है तो जलना तो पड़ेगा ही। मुझे भय है कि यह जो
अतिरेकवादिता का दौर है, वह अंततः उदासीन निष्क्रियता में तब्दील हो जाएगा। आप
देखने से इनकार कर देंगे। अभी आप शब्दों के सेहर में हैं।
एक छोटा सा उदाहरण है—बीजेपी का दावा है कि मीडिया
बिकी हुई है। कांग्रेस का दावा है कि मीडिया बिकी हुई है। सभी दलों का दावा है कि
मीडिया बिकी हुई है। दलितों का दावा है कि मीडिया बिकी हुई है। सवर्णों का दावा है
कि मीडिया बिकी हुई है। अल्पसंख्यकों का दावा है कि मीडिया बिकी हुई है। आपका दावा
है कि मीडिया बिकी हुई है। मेरा दावा है कि मीडिया बिकी हुई है। जब सभी का यही
दावा है कि मीडिया बिकी हुई है तो फिर मीडिया का ख़रीदार कौन है? कांग्रेस की सरकार में बीजेपी कहती थी कि सरकार जनविरोधी है। बीजेपी की सरकार
में कांग्रेस या अन्य दल कहते हैं कि सरकार जनविरोधी है। फिर वही सवाल कि वह कौन
सी सरकार थी जो जनविरोधी नहीं थी और कौन सी सरकार होगी जो जनविरोधी नहीं होगी? हिन्दू कहता है कि मुसलमान दंगाई है। मुसलमान की निगाह में हिन्दू हत्यारा
है। इसाई अलग कोने में दुबका है। सिख वाहे गुरु वाहे गुरु कर रहा है। सवर्ण ख़ुद
को पीड़ित महसूस कर रहा है और इसका ठीकरा दलित-अल्पसंख्यक पर फोड़ रहा है। दलित
पीड़ित है और सवर्ण को मुजरिम मानता है। मतलब यह कि या तो सभी उत्पीड़ित हैं या
सभी उत्पीड़क हैं। जो मेरे पक्ष में बोलेगा वह आपके लिए पक्षपाती है, जो आपके पक्ष
में बोलेगा वह मेरे लिए पक्षपाती है। एक अजीब सी सनक है, अपराध तुलनात्मक हो गया
है। प्रश्न का उत्तर प्रतिप्रश्न है। रहस्य बहुत गहरा है। शुक़्र है कि अब भी उस
पर पर्दा पड़ा है, जबकि इत्ती-सी नग्नता में ही हम दृष्टिबाधित हो चुके हैं। जब तक
समाज उत्तेजना की स्थिति में भी सम्यक होने का सामर्थ्य विकसित नहीं कर लेता, तब
तक मीडिया का हड़बोंग मचा ही रहेगा। पर्दा ज़रूरी है। आप अपना कपड़ा फाड़ें या
अपने पड़ोसी का, बात एक ही है क्योंकि दोनों की दैहिक संरचना एक सी है। चिंता का
विषय मीडिया का चरित्र नहीं, शब्दों की मर्यादा का ख़त्म होते जाना है। चिंता
शब्दों के अर्थ-स्खलन की है।
धर्मेन्द्र बन जाने का मतलब यह नहीं है कि आप अजय
हैं और आपकी दृष्टि यथार्थ-सहन की क्षमता रखती है। वरिष्ठ पत्रकार रविश कुमार कहते
हैं कि ‘टीवी मत देखिए किताब पढ़िए।’ मैं कहता हूँ कि ‘न ज़्यादा टीवी देखिए न ही
ज़्यादा किताब पढ़िए।’ दोनों ही गुमराह करते हैं।
ज़िन्दगी को समझना है। सत्ता और व्यवस्था को समझना है तो अपने समाज को पढ़िए और उसी
को देखिए—ज़रा ग़ौर से। पर्दे के भीतर क्या हो सकता है, इसकी कल्पना कीजिए, रोमांच
पैदा होगा। कल्पनाशीलता में इजाफ़ा होगा। आशा रूपी किरण झिलमिल करती रहेगी और आप
गाते-मुस्कराते रहेंगे। जितना पर्दा तार-तार होगा, संतुलन उतना ही बिगड़ेगा।
उम्मीदों का क़िला ढहेगा और आपकी बीपी बढ़ेगी। जब फ़रिश्ते इस रहस्य के समक्ष
नतमस्तक हैं तो हम-आप क्यों पर्दा उतारने की ज़िद ठाने बैठे हैं। मुमकिन है कि आप
जिस छवि की कल्पना कर रहे हों, पर्दा हटने के बाद उसके विपरीत छवि से साक्षात्कार
हो जाए! इसीलिए मैं पूरे होशो-हवास में यह कहता हूँ कि
मनुष्य जीवन के कुंठा-रहित इकाई बने रहने की सम्भावना तभी तक है, जब तक पर्दा है।
आप हमें यथास्थितिवादी न समझ लें, इसलिए चलते-चलते एक राज़ की बात बताता चलूँ कि
आज जो लोग नग्नता का पोषण कर रहे हैं, ये वही लोग हैं जो कल तक पर्दादारी के पक्ष
में थे। ...अब यदि उन्होंने पक्ष बदला है तो कुछ सोच-समझ कर बदला होगा, किसी
रणनीति के तहत बदला होगा! सिर्फ़ किताबें पढ़ने से और
संविधान-संविधान कहने से कुछ नहीं होता। ज्ञान का असली मापदण्ड दृष्टि है।
अपनी-अपनी आँखें खोलिए। कलर-ब्लाइंडनेस का उपचार करवाइए और आस-पास जो भी नग्न नज़र
आए, उसको चादर गिफ़्ट कीजिए। मीडिया आपका नहीं है। आपके लिए नहीं है। मीडिया किसका
है, किसके लिए है? यह रहस्य है। रहस्य ख़त्म
होगा तो लोकतंत्र नहीं बचेगा। वैसे भी सरकार ने हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में
हलफ़नामा दिया है कि जनता का अपने शरीर पर पूरा हक़ नहीं है। सरकार पहले ही कह
चुकी है कि प्राकृतिक संसाधन सरकार की सम्पत्ति है। फिर आप सोचेंगे कि यह सरकार
कौन है, जिसके नाम पर लूट मची है, सांस्थानिक रूप से हत्याएँ हो रही हैं, लोगों के
घर उजाड़े जा रहे हैं, ज़मीनें छीनी जा रही हैं, निर्दोषों को अपराधी बताया जा रहा
है? मैं आपको फिर सचेत करूँगा कि रहस्य है, रहने दो।
आप दुखी होंगे तो मैं आपको ख़ुशख़बरी दूँगा कि जश्न मनाइए, ख़ुद को धन्य समझिए कि
जीएसटी में आपके वीर्य और बाल को कर-मुक्त रखा गया है। ...और मीडिया? मीडिया अपना काम कर रहा है। देश ख़तरे में है। वह जवानों का हौसला बढ़ा रहा है।
शत्रु मुल्क से युद्ध लड़ रहा है। मीडिया का एक ही पक्ष है—राष्ट्र। मीडिया की एक
ही विचारधारा है—राष्ट्रवाद। मीडिया का एक ही कर्त्तव्य है—सरकार की वाहवाही।
मीडिया का एक ही धंधा है—सत्ता-पूजन। मीडिया का एक ही धर्म है—वफ़ादारी। और वह यही
सब हमेशा से करता रहा है, कर रहा है। आप फिर पूछेंगे किसकी वफ़ादारी? आप चुपचाप सुनिए या आँखें मूँद लीजिए। आप सवाल बहुत करते हैं। सवालों के
सहारे मीडिया चल सकता है, आपकी ज़िन्दगी नहीं चल सकती। आपकी ज़िन्दगी का चलना,
पर्दादारी की समझ पैदा होने पर ही निर्भर करता है। समझदार बनिए और वीर्य-केश
अनुष्ठान के माध्यम से मीडिया के इर्द-गिर्द धुँध का पर्दा कीजिए। अभी भी वक़्त
है। गति बढ़ाइए। जो कुछ भी है, बुद्धि-विवेक-बल सबकुछ होम कीजिए क्योंकि चीज़ों का
इतना साफ़-साफ़ दिखना, सबकुछ सहज ही समझ में आ जाना, न केवल भयानक छल है बल्कि सभ्यता
और संस्कृति—दोनों के लिए अत्यंत घातक भी है।
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