मीडिया पर लोग उंगली क्यों
उठाते हैं? मीडिया कुछ मामलों में इतना
दकियानूस क्यों है? कंटेंट को लेकर बेबहरापन क्यों है? मीडियाकर्मियों के साथ इन-हाउस शोषण पर
वरिष्ठ चुप क्यों रहते हैं? जन-सरोकार से जुड़ी ख़बरें अक्सर छूट क्यों जाती हैं? मीडियाकर्म अपनी विश्वसनीयता क्यों खोता जा रहा है? जब पेड न्यूज़ की सभी आलोचना करते हैं तो फिर इस
प्रवृति पर अंकुश क्यों नहीं लग पा रहा है? आतंकवाद
और नक्सलवाद जैसे मुद्दों पर मीडिया उथली भाव-भंगिमा की गिरफ्त में क्यों है? क्या सचमुच मीडिया सत्ता का चापलूस या कि वर्ग विशेष का
प्रतिनिधि बनकर रह गया है? मीडिया में आमजन कहां ठहरते हैं? सवाल इतने हैं कि दिमाग कभी-कभी विद्रोह को आतुर हो
जाता है। लेकिन जवाब...? शनिवार, 17 नवंबर 2012
थोड़ा वक्त लगेगा अभी
मीडिया पर लोग उंगली क्यों
उठाते हैं? मीडिया कुछ मामलों में इतना
दकियानूस क्यों है? कंटेंट को लेकर बेबहरापन क्यों है? मीडियाकर्मियों के साथ इन-हाउस शोषण पर
वरिष्ठ चुप क्यों रहते हैं? जन-सरोकार से जुड़ी ख़बरें अक्सर छूट क्यों जाती हैं? मीडियाकर्म अपनी विश्वसनीयता क्यों खोता जा रहा है? जब पेड न्यूज़ की सभी आलोचना करते हैं तो फिर इस
प्रवृति पर अंकुश क्यों नहीं लग पा रहा है? आतंकवाद
और नक्सलवाद जैसे मुद्दों पर मीडिया उथली भाव-भंगिमा की गिरफ्त में क्यों है? क्या सचमुच मीडिया सत्ता का चापलूस या कि वर्ग विशेष का
प्रतिनिधि बनकर रह गया है? मीडिया में आमजन कहां ठहरते हैं? सवाल इतने हैं कि दिमाग कभी-कभी विद्रोह को आतुर हो
जाता है। लेकिन जवाब...? शुक्रवार, 9 नवंबर 2012
शुक्रवार, 12 अक्टूबर 2012
गुमशुदा आवाज़
“साहब मैं पटना से बोल रहा हूँ। आपसे कुछ भी नहीं छुपाउंगा। बिल्कुल सच बताउंगा। मैं लव मैरिज करने के बाद अब पछता रहा हूँ। बीवी ब्लैकमेल कर रही है। उसका किसी और के साथ संबंध है। मेरे पास वीडियो फुटेज है। फोन की रिकॉर्डिंग भी है। चाहकर भी विरोध नहीं कर सकता। खुदकुशी की धमकी देती है। दहेज-प्रताड़णा का मामला बनाने और जेल भिजवाने की धमकी देती है। पुलिस को बता नहीं सकता। घरवाले पहले से ही खार खाए बैठे हैं। अंतिम उम्मीद आप ही हैं।” मैं सुनता हूँ। ठीक वैसे जैसे यह रूदाद काठ के उल्लू को सुनाई जा रही हो। उसके चुप होने पर हल्ला बोल का नियत समय बतलाता हूँ। थोड़ी सी ढांढ़स देता हूँ और फोन कट।
सोमवार, 1 अक्टूबर 2012
सोमवार, 10 सितंबर 2012
मूव ऑन
भारत कभी सोने की चिड़िया तो
कभी गुलामों का देश रहा। भारत कभी पंचशील सिद्धांत के कारण विख्यात रहा। भारत कभी
विकासशील, दलित-दमित देशों का उद्धारक तो कभी अगुआ रहा। भारत कभी सोवियत संघ और
अमेरिका के बीच शीतयुद्ध के दौरान तीसरी शक्ति यानी गुट-निरपेक्ष आंदोलन का जनक रहा।
भारत कभी सोवियत संघ के प्रभाव में समाजवाद की दिशा में तेज़ी से कदम बढ़ाने वाला
देश रहा। भारत अमेरिका के पूंजीवादी और विस्तारवादी नीतियों के खिलाफ संघर्ष करने
वाला देश भी रहा। जब कभी अफ्रीकी, एशियाई या फिर लातीन अमेरिकी ग़रीब मुल्क संकट
में पड़ा, उसको संबल और मदद पहुंचाने वाला पहला देश भी भारत ही रहा।
गुरुवार, 16 अगस्त 2012
कठपुतली नाच वाया अन्ना बाबा
एक अन्ना थे। एक बाबा थे।
धारणा के विपरीत बाबा जवान थे। धारणा के विपरीत अन्ना बूढ़े थे। दोनों अपनी-अपनी
कुटिया में रहते थे। बाबा की जनता भक्त थी, नेता भक्त थे।हर छोटा-बड़ा, बाबा के
इशारे पर कदमताल करता। हैंड्स अप और डाउन करता। सब के सब नतमस्तक होते। बाबा कसरती
तो थे, लेकिन थे दुबले-पतले। भक्त समझते योग का बल है। जबकि बाबा राष्ट्र चिंता
में तिल-तिल घुलते मंच पर उछल-उछल कर लोगों को मज़बूत बनाते। खाए-अघाए का देश था।
काया थुल-थुल, चर्बीवाली। एक-एक शरीर में छोटी-मोटी दर्जनों बीमारी। प्राकृतिक
उपचार पद्धति थी रामबाण। बाबा की कोशिश ने कई काया को बनाया कांचन। आने लगी बन
आंधी माया। शिविरों में जब उमड़ी भीड़। देश चिंता में वह हुए अधीर। भानुमति का
कुनबा जोड़ वह अश्वमेध को हुए विकल। नेताओं ने भौंह तरेरी। प्रतिष्ठा जो दी थी, वो
झटके से ले ली। भ्रष्टाचार और फर्जीवाड़े का जो आरोप लगा तो वह बेहद घबराए। लौट गए
फिर से कुटिया को। बहुत दिनों तक न बाहर आए।

मंगलवार, 7 अगस्त 2012
कुछ तो ख़ता, कुछ ख़ब्त भी है
लोकतंत्र है। अर्थतंत्र है।
भेंड़तंत्र है। भीड़तंत्र है। लूटतंत्र है। सर्वत्र फैला ढोंगतंत्र है। यंत्रवाद
है। बौद्धिक साम्राज्यवाद है। सियासी वितंडावाद है। भोगवाद है। विकासवाद है।
समाजवाद है। पूंजीवाद है। संचार युग है। मीडिया है। बाज़ार है। सराय है। यानी जो
कुछ है- प्रचुर है। कोई खुशी तो कोई गम में चूर है। जिसके पास नहीं है, वह मजबूर
है। जिसके पास है, वह मग़रूर है। ऐसा कुछ भी नहीं है, जो नहीं है। यंत्र-तंत्र, व्यवस्था,
पैरोकार, बिचौलिए, सरदार, सरकार, नेता, सत्ता, कुर्सी, मंत्री, संतरी, चोर,
पहरेदार...
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लोकतंत्र है। अर्थतंत्र है। भेंड़तंत्र है। भीड़तंत्र है। लूटतंत्र है। सर्वत्र फैला ढोंगतंत्र है। यंत्रवाद है। बौद्धिक साम्राज्यवाद है। सिय...
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उमस और ऊब का माहौल मन को कोंचते... ख़्वाहिस को बढ़ाते... बिल्कुल प्यास की तरह । जबकि नल की ट...
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बाढ़ का पानी अब उतार पर था। जलमग्न धरती कहीं-कहीं अपना कूबड़ दिखाने लगी थी। छोटी-छोटी मछलियों की छलमलाहट बढ़ गई थी। वही जल-धारा, जो कल...



