अब तो
ज़माना बदल रहा है। ख़ास तौर से शहरों में माँ-बाप अपने बच्चों की पसंद को तरजीह
देने लगे हैं। ‘लव कम अरेंज मैरेज’ का चलन
है। लेकिन ग्रामीण इलाकों में अभी भी शादी का परंपरागत तौर-तरीक़ा ही स्थापित है।
ऐसी शादियाँ बिना ‘अगुआ’ के मुमकिन नहीं हुआ करतीं। अगुआ
की भूमिका को समझने का सबसे आसान तरीक़ा तो यही है कि आप किसी मवेशी मेले में जाएँ
और वहाँ गाय-भैंस या बैल की बिक्री में जुटे दलाल की बातें सुनें। जैसी बातें वहाँ
पर होती हैं, कमोबेश वैसे ही संवाद अगुआ के मुँह से निर्झर की तरह उस वक़्त झड़ते
हैं, जब वह किसी विवाह योग्य वर अथवा वधू के बारे में संबंधित पक्ष को बता रहा
होता है। अगुआ की छवि कैसी होती है? इसको जानने के लिए लोकगीतों पर भी
ग़ौर किया जा सकता है। अगुआ से जुड़ा शायद ही कोई ऐसा लोकगीत आपको मिले, जिसमें
उसकी प्रशंसा की गई हो या धन्यवाद दिया गया हो!
मंगलवार, 15 अप्रैल 2014
बुधवार, 12 मार्च 2014
चर्नलिज़्म के चारण
एक
क्विज हो जाए? ज्यादा भारी-भरकम नहीं है। बस एक ही शब्द
है, जिसका आपको अर्थ बताना है। ‘चर्नलिज्म’ शब्द
सुना है आपने? ‘जर्नलिज्म’
का सहोदर जैसा लगता है- है भी। हाँ, फ़र्क़ सिर्फ इतना है कि जैसे ही हम ‘चर्नलिज्म’
का इस्तेमाल करते हैं, ‘जर्नलिज्म’
की आभा थोड़ी मलिन हो जाया करती है। वैसे ये टर्म भले नया हो, प्रवृत्ति नई नहीं
है। और तो और इसका रूप भी नहीं बदला है। जबकि संचार क्रांति ने बहुत कुछ बदल दिया
है। आपको भी मालूम है। दोहराने की आवश्यकता नहीं। हम उस दौर से बहुत आगे आ चुके
हैं, जब न्यूज़ रूम का देवता ‘टेली-प्रिंटर’
हुआ करता था। जब उसकी ‘कचर-कचर-कच’
जैसी आवाज़ न्यूज़रूम की पहचान हुआ करती थी। ये
आवाज़ न्यूज़रूम में टेबुल के चारों तरफ़ कुर्सियों पर बैठे कॉपी एडिटर्स के लिए ‘अलार्मिंग
साउंड’ की हैसियत रखती थी।
बुधवार, 19 फ़रवरी 2014
उम्मीद(अप्रैल-जून, 2014) में प्रकाशित तीन कविताएँ
![]() |
| आवरण- शिरीष कुमार मौर्य |
दुःस्वप्नों के ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं होती
रुदालियों अपने-अपने घर जाओ
यहाँ अब रूदन का कोई अर्थ नहीं
दधीचियों हो सके तो वापस ले लो
अपनी अस्थियाँ कि अब ज़रूरत नहीं
मेरे शूरवीर क्रांतिकारियों तंबू उखाड़ो
कुमुक बंद होने वाला है और युद्ध स्थगित
न्याय-न्याय रटना बंद करो भाई युधिष्ठिर
कोई और काम नहीं है क्या?
आँसुओं ने धुँधला दी है संजय की आँख
अब तो बख़्श दो इसको युग के धृतराष्ट्र
न वो कर सकता है कुछ और न ही तुम
फिर क्यों कर रहे हो समय बर्बाद?
गुरुवार, 13 फ़रवरी 2014
पूँजी की पीठ पर मीडिया नाच
कुछ शब्द ऐसे
हैं जो आजकल हर आम-ओ-ख़ास की ज़ुबान पर तकियाक़लाम की तरह चढ़े बैठे हैं और किसी
भी सूरत में उतरने को तैयार नहीं हैं। हमें इन शब्दों से कोई आपत्ति भी नहीं है और
न ही हमारी ऐसी कोई चाहत है कि लोग इसे अपनी ज़ुबान से उतार दें। उत्तर आधुनिक
परिदृश्य में इन शब्दों से छुटकारा संभव है भी नहीं। आप भी इस बात से इत्तेफ़ाक़
रखते होंगे कि प्रत्येक युग की अपनी अलग भाषा और विमर्श-प्रणाली होती है। समय के
अनुकूल शब्दों के अर्थ तो बदलते ही हैं, नये शब्दों का जन्म भी होता है और कुछ
पुराने शब्दों की डेंटिंग-पेंटिंग भी की जाती है, ताकि वे नये अर्थ-संदर्भों का
भार वहन कर सकें। ऐसे ही कुछ पारिभाषिक शब्द हैं- ग्लोबलाइजेशन (वैश्वीकरण),
लिबरलाइजेशन (उदारीकरण), डेमोक्रेटाइजेशन (लोकतांत्रीकरण), इंडस्ट्रियलाइजेशन
(उद्योगीकरण), कैपिटलिज्म (पूँजीवाद), कन्ज्यूमरिज़्म (उपभोक्तावाद) आदि। वैसे कुछ
शब्दों में ‘नियो’ अथवा ‘नव’ उपसर्ग
लगाकर भी उनका नवीकरण किया गया है, ताकि प्रवृत्तिगत बदलाव को रेखांकित किया जा
सके। आप ग़ौर करेंगे तो पाएँगे कि कोई भी विमर्श इन शब्दों के बिना अधूरा है। यहाँ
पर इन शब्दों का ज़िक्र रस्मी तौर पर नहीं किया गया है, बल्कि जिस विषय पर हम बात
करना चाहते हैं, उसका इन शब्दों से प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष संबंध ज़रूर है।
वैसे भी जीवन-जगत का प्रत्येक क्रिया-व्यापार एक-दूसरे से जुड़ा होता है और किसी
एक में बदलाव का प्रभाव शेष पर पड़ना स्वभाविक है।
गुरुवार, 23 जनवरी 2014
सोशल मीडिया के साइड इफेक्ट्स
हम भारत के लोग थोड़ा अलग क़िस्म के जीव हैं। चुप हों तो ऐसे कि गूँगा भी ख़ुशफ़हमी पालने लगे। बोलने पर आ जाएँ तो इतना बोलें कि सिर चकराने लगे। सहने की हद तो इतनी कि सदियों तक ग़ुलामी की जंज़ीर को ज़ेवर ही समझते रहे। अत्याचारियों को देवता बनाकर पूजते रहे। ...और अगर विरोध का ख़ब्त सवार हो तो मुद्दे की परवाह किए बग़ैर नारा बुलंद करने लगें। वैसे अभी एक साल पहले तक मुझे भी इस ख़ूबी का इल्म नहीं था। ‘जनलोकपाल’ को लेकर अन्ना आंदोलन के बाद से नौबत ये है कि जनता मौक़ा ढूँढती रहती है। हालांकि 16 दिसंबर 2012 की लोमहर्षक घटना और उसके बाद दिल्ली के जंतर मंतर को तहरीर स्क्वॉयर में तब्दील कर देने वाला उतावलापन, फिर कभी नज़र नहीं आया। लेकिन “मैं भी अन्ना, तू भी अन्ना” और निर्भया कांड के बाद वाला तख़्ता-पलट जोश, सड़क से सिमटते-सिमटते घर के अंदर पड़े कम्प्यूटर सिस्टम में जज़्ब हो गया। अनुभव की कमी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के सनसनी मास्टर्स अर्थात नौटंकीबाज़ एंकर्स और उनकी आक्रामक शैली ने दूर कर दी और तब से सोशल मीडिया, जो पहले अभिव्यक्ति और संवाद-सेतु का काम कर रहा था, क्रांति-केन्द्र के रूप में स्थापित हो गया। शालीनता और संवाद के लिए यहाँ भी स्पेस लगातार सिकुड़ता ही जा रहा है। अब तो हालत ये है कि सोशल नेटवर्किंग साइट्स ने भस्मासुर का रूप धारण कर लिया है और दुर्भाग्य ये है कि फिलहाल परिदृश्य से शिव ग़ायब हैं। हाल की कई घटनाओं ने न सिर्फ चौंकाया है, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और इसकी आड़ में गुट बनाकर व्यक्ति-विशेष अथवा दल-विशेष के ख़िलाफ़ अथवा पक्ष में जनमत को प्रभावित करने की बढ़ती प्रवृत्ति के चलते नये क़िस्म की सामाजिक चिंता को भी जन्म दे दिया है। यानी कई घटनाओं ने सोशल साइट्स की उपादेयता को तो साबित किया है, लेकिन इसके साइड इफेक्ट्स भी अब सतह पर आने लगे हैं।
मंगलवार, 14 जनवरी 2014
सबकुछ है धुआँ-धुआँ
कुछ दिनों पहले ख़ालिद जावेद का उपन्यास ‘मौत
की किताब’ पढ़ रहा था। उपन्यास में एक जगह कथा-नायक अपनी ज़िन्दगी के
अनुभव को कुछ यूँ बयान करता है- “मैं हमेशा एक ऐसी फिल्म देखता रहा,
जिसके हर-एक मंज़र से उसका डायलॉग थोड़ा आगे या पीछे होता है। आवाज़ उसके साथ फिट
नहीं होती। आवाज़ हर मंज़र को मुँह चिढ़ाती, फिल्म के फ़्रेम में बहती रहती है।”1 भारतीय
सिनेमा के संदर्भ में यह उक्ति बिल्कुल सटीक बैठती है।
बुधवार, 1 जनवरी 2014
अनफ़ेयर होता सोशल स्फीयर
हम जिस
युग में जी रहे हैं, वह अत्याधुनिक सूचना-तकनीकों से लैस है। चिट्ठी-पत्री,
लिफाफा-पोस्टकार्ड का ज़माना काफी पीछे छूट गया है। सार्वजनिक टेलीफोन-बूथों की
परंपरा भी दम तोड़ने की कगार पर आ पहुँची है। अब गाँवों के लोग भी मोबाइल फोन से
ही संवाद-सम्प्रेषण को तरजीह देने लगे हैं। सूचना और मनोरंजन का एकमात्र सहारा
दूरदर्शन और उसके लोकप्रिय प्रोग्राम ‘संध्या समाचार’
और ‘चित्रहार’ की जवानी को ढले भी अरसा बीत गया।
गाँवों में अब अधिकांश घरों की छत पर डीटीएच की छतरी आकाश को मुँह चिढ़ाती है। बिजली
की समस्या है, लेकिन कोई बात नहीं। सम्पन्न घरों के पिछवाड़े में जेनसेट पड़ा है।
जिन घरों और घरानों के प्रति लक्ष्मी अभी अधिक उदार नहीं हो सकी हैं, वैसे घरों
में इनवर्टर, बैट्रा और चार्जिंग उपकरणों ने इस कमी को पूरा कर दिया है। शहरों में
तो फिर भी एफएम ने रेडियो की लाज बचा रखी है, लेकिन गाँवों के लोगों ने इसका
फिलहाल बायकॉट कर रखा है। केवल दूरदर्शन और डीडी न्यूज़ देखने की बाध्यता ख़त्म हो
चुकी है और लोग आराम से मन-मुताबिक ढाई-तीन सौ चैनलों के जंगल में भटकते रहते हैं।
कहने की ज़रूरत नहीं कि उदारीकरण की सहेली सूचना-क्रांति ने हमारी परंपरागत
जीवन-संस्कृति को बदल दिया है और बदलाव की प्रक्रिया अभी जारी है। गाँव के वैसे
युवा जो बमुश्किल दस्तख़त करने की दक्षता रखते हैं, उनके पास भी मोबाइल है। मोबाइल
में इंटरनेट है और फेसबुक है।
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