शनिवार, 7 जून 2014

नक़ाब

(हरिगंधा के अप्रेैल-मई 2014 में प्रकाशित लघुकथा)

अदब- ज़रा ये तो बताना... तुम नक़ाब क्यों लगाती हो?
अदीबा- बस यूँ ही... अच्छा लगता है। ख़ुद को सेक्योर फील करती हूँ।
अदब- तो क्या वो तमाम लड़कियाँ इनसेक्योर होती हैं, जो नक़ाब नहीं लगातीं?
अदीबा- नहीं... ऐसा मैंने कब कहा?
अदब- तुम्हारी बातों से तो ऐसा ही लगा...

गुरुवार, 22 मई 2014

जन-आंदोलनः अर्थ, निहितार्थ और मीडिया

2004 में एक तेलुगु फिल्म आई थी। फिल्म का नाम था मास। फिल्म के नायक थे- अक्कीनेनी नागार्जुन। पटकथा और निर्देशन राघव लॉरेंस का था। कहानी का नायक अनाथ था। अनाथ तो बेनाम बादशाह में अनिल कपूर भी था। वैसे अनिल कपूर की ही एक और फिल्म है- नायक। 2001 में आई, ये फिल्म मास-मूवमेंट की वास्तविक झांकी प्रस्तुत करती है। बल्कि अन्ना आंदोलन से उभरे अरविंद केजरीवाल में, भारत के युवा मानस ने उसी नायक शिवाजी की छवि देखी थी। नायक फिल्म का नायक भी तो भ्रष्टाचार और अपराध से ही निराश और नाराज़ था। उसने मुख्यमंत्री को इसी मुद्दे पर घेरा था। परिस्थितियों ने उसे एक दिन का मुख्यमंत्री बनाया। फिर मीडिया ने, इस कैमरामैन से रिपोर्टर और रिपोर्टर से एक दिन का मुख्यमंत्री बने शिवाजी को इतना लोकप्रिय बना दिया कि भ्रष्टाचार, अत्याचार, जातिवाद और तमाम तरह से त्रस्त जनता ने उसको अपना उद्धारक मान लिया। शिवाजी जबरन पॉलिटिक्स में घसीट लिया गया। इन सबके बावजूद मैं बॉलीवुड की बजाय टॉलीवुड की फिल्म को तरजीह दे रहा हूँ तो इसका कारण सिर्फ फिल्म का नाम ही है। ख़ैर, फिल्म का नाम दरअसल नायक के नाम पर आधारित है। यानी नागार्जुन ने इस फिल्म में जिस किरदार को जिया है, वो मास है। गुंडों की धुनाई के समय ही सही, लेकिन नायक ने मासकी परिभाषा देने की कोशिश की है। मास की प्रेमिका ने भी हाथ नचा-नचाकर, भौंहें चढ़ा-चढ़ाकर और शब्दों को चबा-चबाकर मास की ख़ूबियों का बखान किया है। लेकिन मैं उस परिभाषा से संतुष्ट नहीं हूँ। साहित्य में वीरगाथा काल को बहुत पहले ही आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने न सिर्फ चिन्हित कर दिया था, बल्कि उसके अवसान को भी रेखांकित कर दिया था। और अब तो बहुत हद तक फिल्मी वीरगाथा काल का भी बॉलीवुड से लोप होने को है। इसलिए मास की टॉलीवुडीय परिभाषा को स्वीकार नहीं किया जा सकता। लिहाजा मास मूवमेंट और मास मीडिया के अंतर्संबंधों की पड़ताल के लिए अभी मैं जिस सतही प्रस्थान बिन्दु पर हूँ, वहाँ से इस गंभीर विषय की गरिमा को बरकरार रखना संभव नहीं है। लिहाजा मास मूवमेंट शब्द का वास्तविक अर्थ और जन-आंदोलन के संदर्भ में इसके इस्तेमाल के कारणों की पड़ताल का रास्ता ज्यादा सटीक जान पड़ता है।

मंगलवार, 6 मई 2014

विभ्रम के धुंधलके में सच की तलाश

हां, जीतता कौन है? शुद्ध लाभ किसे होता है? शुद्ध लाभ मतलब अर्थ लाभ, पद्लाभ, प्रतिष्ठा लाभ, सम्मान लाभ या कोई और लाभ? परिभाषाएँ भोथरी हैं। किस रास्ते पर चलोगे तो मंजिल मिलेगी? सोच लो कहीं वही मंजिल न हो, जहां से यात्रा शुरू की हो? और कहीं चलनेवाला ही मंजिल हुआ तो? ...सोचने के कई तरीके, पहलू, अन्दाज़, ढंग और आज़ादी न होती तो कुछ न होता।

कैसी आगी लगाई उपन्यास का कथा नायक साज़िद अपने सपनों और क्रांतिवादिता की रोमांचक दुनिया से बेदखली एवं यथार्थ की पथरीली ज़मीन पर धराशायी होने के बाद पराजय-बोध से मुक्ति के लिए जो तर्क ढूंढता है, वह यही है। यहां कोई ठोस हल, पहल या उत्तर नहीं है। सिर्फ अनुत्तरित प्रश्न हैं और आश्चर्यजनक रूप से द्वंद्वपूर्ण साधु-भाव है। सपनों की राजधानी दिल्ली से विरक्ति और इससे नफ़रत की पराकाष्ठा है- मैं तुमसे पक्का और सच्चा वादा करता हूँ। क़सम खाता हूँ... कि दिल्ली कभी नहीं लौटूँगा... मतलब रहने या काम करने...
...
इस शहर पर थूक दो।

मंगलवार, 15 अप्रैल 2014

अविश्वसनीय दौर में विश्वसनीयता का सवाल

अब तो ज़माना बदल रहा है। ख़ास तौर से शहरों में माँ-बाप अपने बच्चों की पसंद को तरजीह देने लगे हैं। लव कम अरेंज मैरेज का चलन है। लेकिन ग्रामीण इलाकों में अभी भी शादी का परंपरागत तौर-तरीक़ा ही स्थापित है। ऐसी शादियाँ बिना अगुआ के मुमकिन नहीं हुआ करतीं। अगुआ की भूमिका को समझने का सबसे आसान तरीक़ा तो यही है कि आप किसी मवेशी मेले में जाएँ और वहाँ गाय-भैंस या बैल की बिक्री में जुटे दलाल की बातें सुनें। जैसी बातें वहाँ पर होती हैं, कमोबेश वैसे ही संवाद अगुआ के मुँह से निर्झर की तरह उस वक़्त झड़ते हैं, जब वह किसी विवाह योग्य वर अथवा वधू के बारे में संबंधित पक्ष को बता रहा होता है। अगुआ की छवि कैसी होती है? इसको जानने के लिए लोकगीतों पर भी ग़ौर किया जा सकता है। अगुआ से जुड़ा शायद ही कोई ऐसा लोकगीत आपको मिले, जिसमें उसकी प्रशंसा की गई हो या धन्यवाद दिया गया हो!

बुधवार, 12 मार्च 2014

चर्नलिज़्म के चारण

एक क्विज हो जाए? ज्यादा भारी-भरकम नहीं है। बस एक ही शब्द है, जिसका आपको अर्थ बताना है। चर्नलिज्मशब्द सुना है आपने? जर्नलिज्म का सहोदर जैसा लगता है- है भी। हाँ, फ़र्क़ सिर्फ इतना है कि जैसे ही हम चर्नलिज्म का इस्तेमाल करते हैं, जर्नलिज्म की आभा थोड़ी मलिन हो जाया करती है। वैसे ये टर्म भले नया हो, प्रवृत्ति नई नहीं है। और तो और इसका रूप भी नहीं बदला है। जबकि संचार क्रांति ने बहुत कुछ बदल दिया है। आपको भी मालूम है। दोहराने की आवश्यकता नहीं। हम उस दौर से बहुत आगे आ चुके हैं, जब न्यूज़ रूम का देवता टेली-प्रिंटर हुआ करता था। जब उसकी कचर-कचर-कच जैसी आवाज़ न्यूज़रूम की पहचान हुआ करती थी। ये आवाज़ न्यूज़रूम में टेबुल के चारों तरफ़ कुर्सियों पर बैठे कॉपी एडिटर्स के लिए अलार्मिंग साउंड की हैसियत रखती थी।

बुधवार, 19 फ़रवरी 2014

उम्मीद(अप्रैल-जून, 2014) में प्रकाशित तीन कविताएँ

आवरण- शिरीष कुमार मौर्य

दुःस्वप्नों के ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं होती

रुदालियों अपने-अपने घर जाओ
यहाँ अब रूदन का कोई अर्थ नहीं
दधीचियों हो सके तो वापस ले लो
अपनी अस्थियाँ कि अब ज़रूरत नहीं
मेरे शूरवीर क्रांतिकारियों तंबू उखाड़ो
कुमुक बंद होने वाला है और युद्ध स्थगित
न्याय-न्याय रटना बंद करो भाई युधिष्ठिर
कोई और काम नहीं है क्या?

आँसुओं ने धुँधला दी है संजय की आँख
अब तो बख़्श दो इसको युग के धृतराष्ट्र
न वो कर सकता है कुछ और न ही तुम
फिर क्यों कर रहे हो समय बर्बाद?

गुरुवार, 13 फ़रवरी 2014

पूँजी की पीठ पर मीडिया नाच

कुछ शब्द ऐसे हैं जो आजकल हर आम-ओ-ख़ास की ज़ुबान पर तकियाक़लाम की तरह चढ़े बैठे हैं और किसी भी सूरत में उतरने को तैयार नहीं हैं। हमें इन शब्दों से कोई आपत्ति भी नहीं है और न ही हमारी ऐसी कोई चाहत है कि लोग इसे अपनी ज़ुबान से उतार दें। उत्तर आधुनिक परिदृश्य में इन शब्दों से छुटकारा संभव है भी नहीं। आप भी इस बात से इत्तेफ़ाक़ रखते होंगे कि प्रत्येक युग की अपनी अलग भाषा और विमर्श-प्रणाली होती है। समय के अनुकूल शब्दों के अर्थ तो बदलते ही हैं, नये शब्दों का जन्म भी होता है और कुछ पुराने शब्दों की डेंटिंग-पेंटिंग भी की जाती है, ताकि वे नये अर्थ-संदर्भों का भार वहन कर सकें। ऐसे ही कुछ पारिभाषिक शब्द हैं- ग्लोबलाइजेशन (वैश्वीकरण), लिबरलाइजेशन (उदारीकरण), डेमोक्रेटाइजेशन (लोकतांत्रीकरण), इंडस्ट्रियलाइजेशन (उद्योगीकरण), कैपिटलिज्म (पूँजीवाद), कन्ज्यूमरिज़्म (उपभोक्तावाद) आदि। वैसे कुछ शब्दों में नियोअथवा नव उपसर्ग लगाकर भी उनका नवीकरण किया गया है, ताकि प्रवृत्तिगत बदलाव को रेखांकित किया जा सके। आप ग़ौर करेंगे तो पाएँगे कि कोई भी विमर्श इन शब्दों के बिना अधूरा है। यहाँ पर इन शब्दों का ज़िक्र रस्मी तौर पर नहीं किया गया है, बल्कि जिस विषय पर हम बात करना चाहते हैं, उसका इन शब्दों से प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष संबंध ज़रूर है। वैसे भी जीवन-जगत का प्रत्येक क्रिया-व्यापार एक-दूसरे से जुड़ा होता है और किसी एक में बदलाव का प्रभाव शेष पर पड़ना स्वभाविक है।

Featured Post

'साक्षी है इतिहास' तथा अन्य चार कविताएँ

1.      साक्षी है इतिहास ( मार्टिन नीमोलर को समर्पित) जानता हूँ आप जहमत नहीं उठाएँगे अपनी सलीब पर टँगे रहने का लुत्फ बेग़...