नया उत्साह, नई तरंगों की पीठ पर सवार हो और अचानक कोई रोड़ा राह में झटका दे, तो ऐसी स्थिति में क्या होगा? बात ज़्यादा गंभीर नहीं है। वैसे भी जिस मुल्क में बड़ी-से-बड़ी समस्या भी गंभीरता की श्रेणी में जगह नहीं बना पाती, वहां एक बात की क्या औक़ात! अगर मैं ग़लत कह रहा हूँ, तो आप टोक सकते हैं। लेकिन मेरी एक छोटी सी शर्त है। कम-से-कम एक उदाहरण के साथ आपको पक्ष रखना होगा। वैसे विरोध का चलन भी पुराना है। सत्ता-पक्ष के साथ विपक्ष की संवैधानिक अनिवार्यता का सीधा संबंध इसी से है। हमने ‘निंदा’, ‘भर्त्सना’, ‘नैतिकता’, ‘समर्थन’, ‘अविश्वास’, ‘शपथ’, ‘त्याग’, ‘खंडन’, ‘विरोध’, ‘संघर्ष’, ‘आंदोलन’, ‘जनहित’ और ‘प्रस्ताव’ जैसे शब्द तो इसी व्यवस्था से सीखे हैं। (ऐसा कहते वक़्त, हमें आशंका है कि सांस्कृतिक पुनरुत्थान के पोषक तत्व, विरोध में उठ खड़े होंगे और इन शब्दों के सांस्कृतिक मर्म-धर्म बांचने को उद्धत हो उठेंगे। लेकिन अभिव्यक्ति के ख़तरे तो उठाने ही पड़ते हैं। भले ही वह बंध्या हो और प्रभाव के स्तर पर बिल्कुल बेकार। ख़ैर हम सफ़ाई पेश करना चाहते हैं कि इन शब्दों का उद्भव चाहे जिस किसी काल-खंड अथवा सांस्कृतिक परिवेश में हुआ हो, लेकिन हम तक इसकी पहुंच लोकतंत्र के वीर सिपाहियों की मदद से ही बनी है। इसलिए क्रेडिट हम इसी व्यवस्था को देंगे।)
रविवार, 9 जून 2013
रविवार, 26 मई 2013
अप्रत्याशित नहीं थी घटना
शनिवार को छत्तीसगढ़ में जो कुछ हुआ। वह अप्रत्याशित
नहीं था। आपको यह अटपटा लग सकता है। आपकी दृष्टि में मेरी ‘मानसिक
स्थिति’ भी संदिग्ध हो सकती है। वैसे भी हम जिस लोकतांत्रिक दौर से
गुज़र रहे हैं, उसमें कुछ भी असंदिग्ध नहीं है। यह आम धारणा है कि प्रभु-वर्ग या
उससे जुड़े लोगों के विरुद्ध जो कुछ भी निगेटिव होता है, वह अप्रत्याशित ही होता
है। प्रत्याशित घटनाएँ तो आमलोगों से जुड़ी होती हैं। दलित-आदिवासी और कमज़ोर तबके
के लोगों का शोषण-दमन-उत्पीड़न प्रत्याशित होता है। यही समाज और व्यवस्था-सम्मत
धारणा है। हत्या, लूट या बलात्कार हो या आंदोलन— ये तभी बड़े होते हैं, जब बड़े
लोगों के साथ हों या कि वे इनसे जुड़े हों। अब से पहले तक नक्सलियों ने सुरक्षा-बलों
को ही अपना निशाना बनाया था। सैंकड़ों जवान मारे गए होंगे। लेकिन राजनेताओं के
चेहरे पर ऐसी हवाइयाँ पहले कभी उड़ती नहीं देखी। यह देश के नक्सली इतिहास की सबसे
बड़ी घटना है। ऐसा नहीं कि हम दुखी नहीं हैं। हमारे लिए तो हर-एक ज़िन्दगी अहम है,
चाहे वह किसी कर्मा की हो या पटेल की या कि किसी ग़रीब आदिवासी की।
शनिवार, 18 मई 2013
मर्ज कुछ, इलाज कुछ
छुटपन की एक घटना याद आती है। गाँव की एक लड़की, गाँव
के ही युवक के साथ पकड़ी गई। मामला प्रेम-प्रसंग का था। बड़े-बुज़ुर्गों की सदारत
में पंचायत बैठी। दोनों पंचायत में पेश हुए। पंचों को बताया कि वे एक-दूसरे से
प्यार करते हैं और शादी करना चाहते हैं। लेकिन
पंचों ने प्रस्ताव को नकार दिया। मामला नैतिक-अनैतिक के बिन्दु तक ही सीमित कर
दिया गया। सवाल-जवाब से ज़्यादा दोनों की लानत-मलामत हुई और सज़ा मुक़र्रर कर दी
गई। दो-चार शोहदे टाईप के जवान मुस्तैदी से उठे और बाँस की कच्ची कमाचियाँ काट लाए।
इस तरह प्रेमी-युगल की पीठ पर भरी पंचायत में सदाचार की लकीरें उकेरी गईं। दोनों
को माँ-बाप ही नहीं बल्कि सामाजिक संस्कार की अवहेलना का भी दोषी ठहराया गया। सज़ा
और सुनवाई का केन्द्र-बिन्दु प्रेम नहीं था।
गुरुवार, 9 मई 2013
हलाल का बदला झटका
सआदत
हसन मंटो की एक छोटी सी कहानी है- ‘हलाल और झटका’। यह कहानी आज बेतरह याद आ रही है। कहानी में दो किरदार हैं।
पहला कहता है- “मैंने उसकी शहरग पर छुरी रखी,
हौले-हौले फेरी और उसको हलाल कर दिया।” दूसरा चौंकता है- “यह तुमने क्या किया?” सवाल के जवाब में पहले का
सवाल आता है- “क्यों?”
दूसरा अपने सवाल को थोड़ी तफ्सील देता है- “इसको हलाल क्यों किया?” पहला रस लेते हुए कहता है- “मज़ा
आता है, इस तरह...” दूसरा खीझ कर कहता है- “मज़ा आता है के बच्चे... तुझे झटका करना चाहिए था... इस तरह।” और हलाल करने वाले की गर्दन का झटका हो गया। हो सकता है कि मंटो
अपने दौर का सच लिख रहे हों! लेकिन यह हमारे दौर का भी
सच है।
शुक्रवार, 26 अप्रैल 2013
विरासत की बेदखली, --विश्वनाथ त्रिपाठी
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यह चाहे जितना भी खेदजनक हो, लेकिन यह कहने का समय आ गया है कि कम से कम कथा साहित्य में, हिन्दी में लिखने वाले मुसलमान लेखकों को वह स्थान नहीं मिला जिसके वह हक़दार थे या हैं। मैं जान-बूझकर पुरस्कार या सम्मान की बात नहीं करना चाहता, क्योंकि यह कोई मानदंड नहीं है। लेकिन उपेक्षा हुई है। इसके क्या कारण रहे हैं, उसकी पड़ताल या छानबीन का यह अवसर नहीं है। लेकिन उपन्यास पर बात करते समय मैं इस तथ्य की तरफ इशारा जरूरी समझता हूँ। बहुत दिनों से यह सवाल मेरे मन में बना हुआ है और इसका कोई स्पष्ट कारण मुझे समझ में नहीं आता। सामान्यतः हिन्दी साहित्य का जो माहौल है, वह बिल्कुल साम्प्रदायिक नहीं है, बल्कि यह सम्प्रदाय विरोधी है। फिर भी ऐसा क्यों होता है या हो रहा है? यह मैं नहीं जानता।
रविवार, 14 अप्रैल 2013
बुधवार, 10 अप्रैल 2013
मौत की किताब (उपन्यास का अंश)
मैं जल्लाद के पीछे-पीछे चल रहा हूँ। क्या मुझे झूलते
हुए रस्सी के फन्दे की तरफ़ ले जाया जा रहा है? इन सब के वज़नी बूट मेरे आगे मार्च कर रहे हैं। मैं रात
भर जागा हूँ। अभी तो नींद आई थी कि रुख़्सत का वक़्त आ पहुँचा। मैं एक बार फिर सुबह
की नींद के खि़लाफ़ चल रहा हूँ। अपने काहिल और ढीले हाथ-पैरों से मैं नींद के ख़िलाफ़
एक बयानिया फिर लिख रहा हूँ। आज सारे इक़बाले जुर्म और चश्मदीद गवाह पूरे हो गए।
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