हम भारत के लोग थोड़ा अलग क़िस्म के जीव हैं। चुप हों तो ऐसे कि गूँगा भी ख़ुशफ़हमी पालने लगे। बोलने पर आ जाएँ तो इतना बोलें कि सिर चकराने लगे। सहने की हद तो इतनी कि सदियों तक ग़ुलामी की जंज़ीर को ज़ेवर ही समझते रहे। अत्याचारियों को देवता बनाकर पूजते रहे। ...और अगर विरोध का ख़ब्त सवार हो तो मुद्दे की परवाह किए बग़ैर नारा बुलंद करने लगें। वैसे अभी एक साल पहले तक मुझे भी इस ख़ूबी का इल्म नहीं था। ‘जनलोकपाल’ को लेकर अन्ना आंदोलन के बाद से नौबत ये है कि जनता मौक़ा ढूँढती रहती है। हालांकि 16 दिसंबर 2012 की लोमहर्षक घटना और उसके बाद दिल्ली के जंतर मंतर को तहरीर स्क्वॉयर में तब्दील कर देने वाला उतावलापन, फिर कभी नज़र नहीं आया। लेकिन “मैं भी अन्ना, तू भी अन्ना” और निर्भया कांड के बाद वाला तख़्ता-पलट जोश, सड़क से सिमटते-सिमटते घर के अंदर पड़े कम्प्यूटर सिस्टम में जज़्ब हो गया। अनुभव की कमी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के सनसनी मास्टर्स अर्थात नौटंकीबाज़ एंकर्स और उनकी आक्रामक शैली ने दूर कर दी और तब से सोशल मीडिया, जो पहले अभिव्यक्ति और संवाद-सेतु का काम कर रहा था, क्रांति-केन्द्र के रूप में स्थापित हो गया। शालीनता और संवाद के लिए यहाँ भी स्पेस लगातार सिकुड़ता ही जा रहा है। अब तो हालत ये है कि सोशल नेटवर्किंग साइट्स ने भस्मासुर का रूप धारण कर लिया है और दुर्भाग्य ये है कि फिलहाल परिदृश्य से शिव ग़ायब हैं। हाल की कई घटनाओं ने न सिर्फ चौंकाया है, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और इसकी आड़ में गुट बनाकर व्यक्ति-विशेष अथवा दल-विशेष के ख़िलाफ़ अथवा पक्ष में जनमत को प्रभावित करने की बढ़ती प्रवृत्ति के चलते नये क़िस्म की सामाजिक चिंता को भी जन्म दे दिया है। यानी कई घटनाओं ने सोशल साइट्स की उपादेयता को तो साबित किया है, लेकिन इसके साइड इफेक्ट्स भी अब सतह पर आने लगे हैं।
भारतीय
संविधान का अनुच्छेद 19(1)(अ) अभिव्यक्ति की आज़ादी देता है। भारत का कोई भी
नागरिक अपनी बात अथवा विचार को अभिव्यक्त कर सकता है। भारत का प्रेस भी इसी के तहत
सूचना संकलन और सम्प्रेषण का काम करता है और निश्चय ही सोशल साइट्स पर अभिव्यक्ति
भी इसी के दायरे में आती है। लेकिन हमारे साथ समस्या ये है कि हम सोच के स्तर पर
बुरी तरह से एकांगी दृष्टि के शिकार हैं। समस्या यहीं से शुरू होती है। ठीक है कि
देश आज़ाद है और आप भी आज़ाद हैं। लेकिन सिर्फ आप ही नहीं, देश का
प्रत्येक नागरिक आज़ाद है। लिहाज़ा अगर आप अपनी आज़ादी को अक्षुण्ण रखना चाहते हैं
तो आपको सभी की आज़ादी का सम्मान करना होगा। इसी तरह अभिव्यक्ति के अधिकार पर भी
सिर्फ आप ही का कॉपीराईट नहीं है। सबसे अहम बात ये कि अधिकारों के साथ ही कर्तव्य
भी नत्थी होते हैं, जिनका सम्मान और ध्यान रखना बेहद ज़रूरी होता है। जैसे
संविधान के अनुच्छेद 19(1)(अ) के साथ ही उप-अनुच्छेद(2) भी है, जिसके
तहत देश की सम्प्रभुता, अखंडता, राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेशी
राज्यों से संबंध, आपसी भाईचारा, शालीनता, नैतिकता
का सम्मान करने के साथ ही अदालतों की अवमानना और उकसावे की कार्रवाई से परहेज की
नसीहत भी दर्ज़ है। यानी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ मर्यादाओं के निर्वाह का
दायित्व भी जुड़ा हुआ है। लेकिन हमारे जैसे स्वार्थी लोग इसकी अनदेखी करते रहते
हैं। ख़ासतौर से मीडिया के परिप्रेक्ष्य में संकट की शुरुआत यहीं से होती है। अब
देखिए न, प्रेस और साइबर क़ानून के तहत महिला अथवा बच्चों के ख़िलाफ़ ‘सेक्सुअल
असॉल्ट’ या बाल अपराध की घटनाओं में आरोपी और पीड़ित की पहचान गुप्त
रखने का निर्देश है। यानी पीड़ित की तस्वीर, नाम या
कोई भी ऐसी जानकारी सार्वजनिक नहीं की जा सकती, जिससे कि
उसकी पहचान सार्वजनिक हो जाए। लेकिन ऐसा अब धड़ल्ले से हो रहा है। अपुष्ट, आधारहीन,
भ्रामक, अश्लील, अफ़वाहों पर आधारित या
तोड़ी-मरोड़ी गई किसी ख़बर को प्रकाशित या प्रसारित करना क़ानूनन ग़लत है और अपराध
की श्रेणी में आता है, लेकिन मीडिया बेशर्मी से ऐसा करता रहा है। किसी
व्यक्ति अथवा संस्थान के खिलाफ अपमानजनक अथवा घृणास्पद भाषा का इस्तेमाल
ग़ैरक़ानूनी है। ऐसी ख़बर जिससे किसी व्यक्ति अथवा संस्था की प्रतिष्ठा धूमिल होती
हो, को बिना वाजिब कारण और सबूत के प्रकाशित अथवा प्रसारित नहीं
किया जा सकता। यहाँ तक कि व्यक्ति विशेष के ख़िलाफ़ आरोप सही होने की स्थिति में
भी अपमानजनक और फूहड़ भाषा के इस्तेमाल पर पाबंदी है। अब आप ही बताइए कि क्या
मीडिया और हम इसका पालन करते हैं? हम तो इस नियम का पालन भी नहीं
करते कि किसी मृत व्यक्ति के ख़िलाफ़ व्यक्तिगत टिप्पणी करना ग़लत है।
इसमें
संदेह नहीं कि ‘फेसबुक’ और ‘ट्वीटर’
ने लोगों को जोड़ा है। लोग राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों पर न सिर्फ विचार-विमर्श करते
हैं, बल्कि साहित्य और संस्कृति से जुड़ी चीज़ें भी बड़ी मात्रा में शेयर की जाती
हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों के लोग जो प्रत्यक्ष रूप से कभी शायद ही मिल सकें,
इन्हीं साइट्स की मदद से एक-दूसरे के साथ जुड़ने में कामयाब हो रहे हैं। एक-दूसरे
के विचारों को जान-समझ रहे हैं और इनके बीच एक रागात्मक सम्बंध भी विकसित हो रहा
है। बल्कि आप ये भी कह सकते हैं कि यह एक तरह से मुख्यधारा से दरकिनार कर दी गई
सांस्कृतिक विरासत को फिर से जीवन देने और चंद पत्रिकाओं में सिमटी साहित्यिक
गतिविधियों के फलक विस्तार में बेहद कारगर साबित हुई है। राजनीतिक दलों के साथ ही
अब तो सत्ता-प्रतिष्ठान भी सोशल साइट्स के बढ़ते प्रभाव का लाभ उठाने का प्रयास कर
रहे हैं। नौकरीपेशा मध्यवर्ग, जिसकी जिन्दगी घर से दफ़्तर और दफ्तर से घर तक ही
सिमटी पड़ी थी, को भी सोशल साइट्स ने एक नया फलक दिया और वे भी अब
सामाजिक-राजनीतिक ही नहीं बल्कि सांस्कृतिक मामलों में अपना शाब्दिक हस्तक्षेप
करने लगे हैं। ‘स्ट्रीट जर्नलिज्म’ और ‘सिटिजन
जर्नलिज्म’ की जो परिकल्पना थी, वो अब ज़मीनी स्तर पर साकार होती नज़र
आने लगी है। निर्भया कांड के बाद भड़के जनांदोलन के दौरान इंडिया गेट के पास एक
कांस्टेबल की मौत और उसके बाद पुलिस के फ़र्जीवाड़े का ख़ुलासा भी सोशल साइट के
कारण ही संभव हुआ था। फेसबुक पर पोस्ट की गई घटना की तस्वीरों से पुलिस के उस दावे
की पोल खुल गई थी, जिसमें यह कहा गया था कि कांस्टेबल की मौत प्रदर्शनकारियों
द्वारा पीटे जाने से हुई थी। और इस तरह कई निर्दोष युवक जेल जाते-जाते बच गए थे और
दिल्ली पुलिस की ख़ूब किरकिरी हुई थी। अन्ना आंदोलन और निर्भया कांड के दौरान
लोगों को एकजुट करने और सरकार पर दबाव के लिए सोशल साइट्स का भरपूर इस्तेमाल हुआ
और इसका नतीज़ा सड़कों पर भी साफ़ नज़र आया था। और भी ऐसे कई मामले हैं (मसलन
आसाराम-नारायण साईं), जिनमें सोशल मीडिया ने मेनस्ट्रीम मीडिया के साथ कंधे से
कंधा मिलाने में कहीं कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी।
भारत में
अभिव्यक्ति की आज़ादी का जो कंसेप्ट है, उसका सबसे ज़्यादा दुरुपयोग
सियासी लोगों ने किया है। और सूचना क्रांति के बाद यही प्रवृत्ति पहले मीडिया और
अब आम आदमी में पनप रही है। पनप क्या रही है, यूँ कहें कि
अपनी जड़ें जमा चुकी है। ‘मेनस्ट्रीम मीडिया’
ने तो फिर भी थोड़ी लाज-शर्म बचा रखी है, लेकिन सोशल साइट्स इन दिनों पृथकतावादी
तत्वों और सामाजिक सौहार्द्र के दुश्मनों का स्वर्ग बना हुआ है। धर्म और जाति के
आधार पर न सिर्फ अभद्र टिप्पणियाँ, बल्कि अफवाहें उड़ाई जाती हैं। समुदाय विशेष के
लोगों को झुंड बनाकर टार्गेट किया जाता है। उनके ख़िलाफ़ तथ्यहीन बातें फैलाई जाती
हैं। और तो और साम्प्रदायिक दंगों के दौरान भी बेसिर-पैर की सूचनाओं के माध्यम से
हालात को बदतर बनाने के प्रयास किए जाते हैं। मुजफ़्फ़रनगर की घटना इसका सबसे बड़ा
उदाहरण है। यहाँ न सिर्फ़ फर्जी वीडियोज, बल्कि फर्जी सूचनाओं के माध्यम से भी
दंगे की आग में घी डालने के प्रयास किए गए। ये काम फेसबुक के माध्यम से ही किया
गया। अफ़जल गुरू को फाँसी दिए जाने के बाद की प्रतिक्रियाएँ हों या किसी घटना में
पकड़ा गया कोई संदिग्ध, मीडिया एक पक्षकार के रूप में ही खड़ा नज़र आता है। यही
मीडिया की निष्पक्षता को संदिग्ध बनाता है। हम सभी जानते हैं कि जब तक अदालत किसी
व्यक्ति को दोषी नहीं करार देती, तब तक उसे दोषी नहीं माना जा सकता।
लेकिन पिछले दो दशकों से ये चलन आम है कि अब हम संदिग्ध अथवा आरोपी की बजाय
आतंकवादी, बलात्कारी, घोटालेबाज़, लुटेरा,
अपराधी और ऐसे ही दूसरे शब्दों का बेधड़क इस्तेमाल करने लगे हैं।
साम्प्रदायिक दंगे से जुड़े मामलों में भी सावधानी बरतने का चलन अब ख़त्म होता जा
रहा है। और तो और मेनस्ट्रीम मीडिया की बेवकूफ़ियों की कटु आलोचना करने वाला
पढ़ा-लिखा आम आदमी भी अब वही बेवकूफ़ियाँ करने लगा है। ऐसे में सोशल साइट्स पर
अभिव्यक्ति की आड़ में व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप के साथ ही सार्वजनिक जीवन से
जुड़े व्यक्तियों पर भद्दे कमेंट्स और अपशब्दों का इस्तेमाल आम बात है। कांग्रेस
के लिए ‘खान्ग्रेस’, भाजपा के लिए ‘खाजपा’,
मुलायम के लिए ‘मुल्ला-यम’, राहुल गाँधी के लिए ‘पप्पू’,
नरेन्द्र मोदी के लिए ‘फेंकू’ और मनमोहन
सिंह के लिए ‘मौनमोहन सिंह’ जैसे शब्द फेसबुक की ही देन
हैं। फेसबुक या दूसरी सोशल साइट्स के यूज़र्स को ऐसा करने से रोकना भी मुश्किल है,
क्योंकि जब मुख्यधारा की पत्रकारिता ही नैतिकता का दामन छोड़ चुकी है तो सोशल
मीडिया से क्या अपेक्षा?
जब भी इन
प्रवृत्तियों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठती है, तो हमारे अनुभवी संपादक, ‘लीगैलिटी’
बनाम ‘लेगसी’ का मसला उठाकर मामले को उलझा देते
हैं। मीडिया एथिक्स की बात तो होती है, लेकिन न तो इस पर अमल होता
है और न ही मीडिया की कार्यशैली में बदलाव। दर्शक-पाठक तो उस अबोध बच्चे(हालांकि
अपवादों की भी कमी नहीं है।) की तरह होता है, जो बड़ों
के मुँह से सुनी हर अच्छी-बुरी बात को दोहराता है। यहाँ पर आप बड़े-बुज़ुर्ग की
जगह पर मेनस्ट्रीम मीडिया और बच्चे की जगह पर सोशल मीडिया को रख सकते हैं। सिर्फ
क़ानून बनाने से समस्या का हल नहीं निकलता, बल्कि क़ानून को लेकर लोगों में जागरूकता
और इसका कड़ाई से अनुपालन सुनिश्चित किया जाना भी ज़रूरी होता है। जबकि
दुर्भाग्य से इसको लेकर न तो नागरिक और न ही प्रशासन सतर्क है। लिहाजा तमराज
किल्विष की भाषा में कहूँ तो ‘अराजकता क़ायम है‘ और
न सिर्फ ‘सोशल स्फीयर’ दूषित हो रहा है, बल्कि
प्रोपगैंडा का चलन भी ज़ोरों पर है। ऐसे में अफवाहों को हवा देना और समुदाय अथवा
व्यक्ति विशेष को टार्गेट करना भी पहले से बहुत आसान हो गया है।
सोशल
मीडिया के अपने फ़ायदे और नुकसान हैं। सच तो ये है कि कर्तव्य के बिना अधिकार,
व्यक्ति को अपराध की हद तक उश्रृंखल बना देता है। सियासी गोलबंदी के मामले में ही
देखें। बीजेपी की तरफ से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी और ‘आप’
के पक्ष में जनमत को गोलबंद करने के लिए बड़े पैमाने पर सोशल मीडिया की भी मदद ली
गई और ली जा रही है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी को मिली चुनावी जीत में सोशल
मीडिया की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। ठीक वैसे ही नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता
में उत्तरोत्तर बढोतरी में भी मेनस्ट्रीम मीडिया और उसके प्रोपगेंडा के साथ ही
सोशल मीडिया पर संगठन और समर्थकों की तरफ़ से चलाई जा रही मुहिम का भी योगदान है।
और यह भी कि नरेन्द्र मोदी का विरोध कुछ अंध-समर्थकों के लिए देशद्रोह से कम नहीं
है। वे ऐसा करने वालों के साथ अभद्रता और अश्लीलता से पेश आते हैं। वैसे ये बात
सिर्फ मोदी-समर्थकों पर ही लागू नहीं होती। बल्कि इस हम्माम में तमाम दलों के अंध-समर्थक
नंगे हैं।
ख़ैर, आइए
अब हम उन तीन घटनाओँ की बात करें, जो हाल ही की हैं और जिनके कारण सोशल मीडिया एक
ही साथ प्रशंसा और आलोचना, दोनों की हक़दार है। तीनों
मामले में समानता ये है कि पीड़ितों ने शुरु-शुरु में प्राथमिकी दर्ज़ कराने से
परहेज बरता, लेकिन बाद में सोशल मीडिया में मामला उजागर होने के बाद पुलिस की
इंट्री हुई और पीड़िताएँ सामने आईं। तरुण तेजपाल पर एक अधीनस्थ ने रेप का आरोप
लगाया। पीड़ित मामले को पुलिस की बजाय संस्थान के भीतर ही सुलझाना चाहती थी। लेकिन
अचानक तरुण तेजपाल का ‘एक्सक्यूज़ लेटर’ फेसबुक
पर लीक हो गया। मेनस्ट्रीम मीडिया ने ख़बर को हाथों-हाथ लिया। गोवा पुलिस ने भी
स्वतः संज्ञान लेकर जाँच शुरू की और बाद में पीड़ित लड़की भी सामने आई। इस घटना के
तुरंत बाद एक लॉ इंटर्न ने भी सोशल साइट पर ही अपने यौन-शोषण की बात लिखी। सुप्रीम
कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस ए के गांगुली पर आरोप लगाया। कुछ ही देर
बाद युवती ने वो पोस्ट हटा ली थी, लेकिन तब तक ख़बर फैल चुकी थी और
मीडिया ने भी लपक लिया था। सुप्रीम
कोर्ट ने जाँच समिति बनाई और पीड़ित लड़की ने भी अपना बयान दर्ज करा दिया। आरोपों
को सही पाने के बाद कार्रवाई को लेकर माथापच्ची जारी है। तीसरा मामला सोशल
एक्टिविस्ट से जुड़ा है। एक युवती ने अपने कुछ मित्रों को बताया कि एनजीओ संचालक
ख़ुर्शीद अनवर ने उसके साथ रेप किया है, लेकिन वह क़ानूनी कार्रवाई के लिए तैयार
नहीं थी। कुछ दिनों बाद ही वह अपने गृह प्रदेश भी लौट गई, लेकिन उसके मित्रों ने सोशल
वर्कर मधु किश्वर की मौजूदगी में पीड़ित के बयान की हुई वीडियो रिकॉर्डिंग को आधार
बनाकर करीब तीन महीने तक अप्रत्यक्ष रूप से आरोपी के ख़िलाफ सोशल मीडिया में जमकर
कैम्पेन किया। आरोपी ने कुछ लोगों के ख़िलाफ़ मानहानि का मुक़दमा भी दर्ज करवाया।
और अंततः 16 दिसंबर, 2013 को न सिर्फ एफआईआर दर्ज हुआ, बल्कि एक न्यूज़ चैनल ने
ख़बर भी प्रसारित की और उसके अगले ही दिन आरोपी ने ख़ुदकुशी कर ली। इस घटना
के अब इतने वर्शन हैं कि ‘सच क्या है, झूठ क्या है’
का निर्धारण सहज नहीं रहा।
अंतिम
घटना ने सोशल मीडिया ही नहीं, बल्कि मेनस्ट्रीम मीडिया को लेकर भी एक नयी बहस को
जन्म दिया है। अब पीड़ित की ही तरह आरोपी की पहचान को गुप्त रखने और तटस्थता की
बजाय पीड़ित के पक्ष में ख़बर प्रसारण पर सवाल उठाए जा रहे हैं। साथ ही ‘मीडिया
ट्रायल’ की ही तरह एक नया टर्म ‘फेसबुक
ट्रायल’ भी अस्तित्व में आ गया है। संदेह नहीं कि ट्रायल के साथ
मीडिया जुड़ा हो या फेसबुक, दोनों ही ऋणात्मक हैं। ख़ुर्शीद अनवर से जुड़े मामलों
में दोनों ही पक्षों के कुछ कृत्य, न सिर्फ मीडिया एथिक्स के ख़िलाफ़, बल्कि
अभिव्यक्ति की आज़ादी के साथ जुड़े कर्तव्यों के विरुद्ध भी हैं। ये प्रवृत्ति
चिंतित करने वाली है और कॉरपोरेट नियंत्रित मेनस्ट्रीम मीडिया के ख़िलाफ एक
स्वस्थ्य ‘सोशल स्फीयर’ के निर्माण की उम्मीदों का गला
घोंटने वाली भी। जिस तरह से कॉरपोरेट और सियासी जगत सोशल मीडिया में सेंधमारी कर
रहे हैं, उसके मद्देनज़र न सिर्फ प्रशासन बल्कि एक आम नागरिक की हैसियत से हमें भी
सचेत होने की ज़रूरत है। सोशल मीडिया के साइड इफेक्ट्स से बचने और इसके ग़लत
इस्तेमाल की बढ़ती प्रवृत्ति पर अंकुश ज़रूरी है, नहीं तो इसका हाल भी मेनस्ट्रीम
मीडिया जैसा ही होगा। बताने की ज़रूरत नहीं कि ‘सोशल
स्फीयर’ जब संदिग्ध होता है तो सच और न्याय का गला भी घुटता है।

जनाब!
जवाब देंहटाएंमेरे लिए राजनीति समझ के बाहर है और उसे समझना भी नहीं चाहता है.......परन्तु आपका यह लेख राजनीति से कहीं ज्यादा है. अतः आप बधाई के पात्र.....
जनाब!
जवाब देंहटाएंमेरे लिए राजनीति समझ के बाहर है और उसे समझना भी नहीं चाहता है.......परन्तु आपका यह लेख राजनीति से कहीं ज्यादा है. अतः आप बधाई के पात्र.....
सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति के दुरूपयोग की बढ़ती प्रवृत्ति को रेखांकित करते इस मननीय आलेख के लिए आपका साधुवाद ,रिज़वी भाई |
जवाब देंहटाएंइस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
जवाब देंहटाएंआज के परिप्रक्ष्य में इस आलेख पर न केवल सोसल मीडिया, बल्कि परंपरात मीडिया से जुड़े लोगों को भी गौर फरमाने की जरूरत है।
जवाब देंहटाएं