सन 1968 की घटना है। आत्मा राम की एक फ़िल्म आई थी। फ़िल्म का नाम था—शिकार। शिकार के लेखक थे—अबरार। अबरार यानी संत पुरुष। शिकार में एक गीत था। गीतकार थे—हसरत (जयपुरी) और आवाज़ थी आशा (भोसले) की, जिन्हें आजकल आशा ताई कहने का फ़ैशन है। यह बहुत कुछ मैक्लूहान के ‘ग्लोबल विलेज़’ या भारतीय संस्कृति के स्वर्गीय राग ‘वासुधैव कुटुम्बकम’ की तर्ज़ पर नया-नया तैयार हुआ उत्तर आत्मीय शब्दबंध है। गीत के बोल थे—“पर्दे में रहने दो, पर्दा न उठाओ / पर्दा जो उठ गया तो भेद खुल जाएगा।” फिल्म में मुख्य भूमिका ‘धर्मेन्द्र’ की थी जो ‘अजय’ बने थे और नायिका का नाम ‘किरण’ था, जिसको पर्दे पर जीने की ज़िम्मेदारी पुनश्च आशा (पारेख) ने निभाई थी। मैं आगे बढ़ने से पहले आपको सचेत करना चाहता हूँ कि उपरोक्त विवरण को आप फिल्मी डिस्क्लेमर की तरह काल्पनिक मानने की भूल न करें, क्योंकि ऐसा करते ही आप वर्तमान में आ जाएँगे। न सिर्फ़ आ जाएँगे, बल्कि खो भी जाएँगे और खोने के बाद आप जो हैं, वह नहीं रह पाएँगे। ऐसे में इस ‘मैं-मैं’ के ज़माने में मुमकिन है कि आप कबीर-रोग अर्थात ‘तू-तू’ के शिकार हो जाएँ! अतः सावधान! वैसे यदि आप आत्मा, राम, अबरार (संत), धर्म, इन्द्र, अजय, हसरत, आशा, किरण, पर्दा, रहस्य आदि का स्मरण रखेंगे तो अच्छा ही रहेगा।
बुधवार, 21 जून 2017
पर्दे में रहने दो, पर्दा न उठाओ
सन 1968 की घटना है। आत्मा राम की एक फ़िल्म आई थी। फ़िल्म का नाम था—शिकार। शिकार के लेखक थे—अबरार। अबरार यानी संत पुरुष। शिकार में एक गीत था। गीतकार थे—हसरत (जयपुरी) और आवाज़ थी आशा (भोसले) की, जिन्हें आजकल आशा ताई कहने का फ़ैशन है। यह बहुत कुछ मैक्लूहान के ‘ग्लोबल विलेज़’ या भारतीय संस्कृति के स्वर्गीय राग ‘वासुधैव कुटुम्बकम’ की तर्ज़ पर नया-नया तैयार हुआ उत्तर आत्मीय शब्दबंध है। गीत के बोल थे—“पर्दे में रहने दो, पर्दा न उठाओ / पर्दा जो उठ गया तो भेद खुल जाएगा।” फिल्म में मुख्य भूमिका ‘धर्मेन्द्र’ की थी जो ‘अजय’ बने थे और नायिका का नाम ‘किरण’ था, जिसको पर्दे पर जीने की ज़िम्मेदारी पुनश्च आशा (पारेख) ने निभाई थी। मैं आगे बढ़ने से पहले आपको सचेत करना चाहता हूँ कि उपरोक्त विवरण को आप फिल्मी डिस्क्लेमर की तरह काल्पनिक मानने की भूल न करें, क्योंकि ऐसा करते ही आप वर्तमान में आ जाएँगे। न सिर्फ़ आ जाएँगे, बल्कि खो भी जाएँगे और खोने के बाद आप जो हैं, वह नहीं रह पाएँगे। ऐसे में इस ‘मैं-मैं’ के ज़माने में मुमकिन है कि आप कबीर-रोग अर्थात ‘तू-तू’ के शिकार हो जाएँ! अतः सावधान! वैसे यदि आप आत्मा, राम, अबरार (संत), धर्म, इन्द्र, अजय, हसरत, आशा, किरण, पर्दा, रहस्य आदि का स्मरण रखेंगे तो अच्छा ही रहेगा।
बुधवार, 10 मई 2017
सोमवार, 24 अप्रैल 2017
नौटंकी थी, नौटंकी है (भाग 2)
“नाच-नौटंकी शुद्ध
मनोरंजन होता, उजरा-मुजरा वर्जित था, पर नौटंकी देखने तो औरतें भी सँपनी गाड़ी
चढ़कर आतीं। औरतों के लिए परदे का इंतज़ाम होता। वैसे, आयोजकों को औरतों का आना
अच्छा नहीं लगता। औरतें आएँगी तो बच्चे आएँगे, बच्चे रहेंगे तो चिल्ल-पों मची
रहेगी, ख़्वाहमख़्वाह रंग में भंग पड़ता रहेगा। इधर जालिम सिंह के चरण मालिनी
आँसुओं से पखार रही होगी, उधर कोई रोंवटिया बच्चा चिल्लाएगा, ‘बाबूजी हो, मैया मरलक हो।’ हँसी का
फव्वारा छूटेगा, सारी संवेदना बिला जाएगी। हुआ न रंग में भंग।”(शुरुआत से पहले) कहने की ज़रूरत नहीं कि ‘नौटंकी’ पहले खेल थी। स्त्री-पुरुष
सभी देखते थे। स्त्री की उपस्थिति आयोजकों को अच्छी नहीं लगती थी, तो उसका कारण था
‘रंग में भंग’ की आशंका। आजकल जो
नौटंकी के नाम पर परोसा जा रहा है, क्या उसे पूर्व की भांति स्त्रियाँ देख सकती
हैं? मैं नौटंकी के पुराने कलाकार अज़ीम मास्टर से मिलकर
रावतपुर गाँव से लौटा हूँ और अभी बगाही बाकरगंज में रम्पत-रानीबाला के घर पर हूँ।
नौटंकी दिखाने की ज़िद के कारण भरी महफ़िल में अपमान झेलने वाले अज़ीम मास्टर की
डबडबाई आँखें मेरी पीठ पर सवार हैं और मेरे सामने बैठे रम्पत अपने ‘क्लाइंट’ से बुकिंग की बात कर रहे
हैं, ‘तीन दिन के तीस हज़ार लगेंगे।’ ग्राहक कहता है, ‘अरे घर का मामला है,
हम बोल के आए हैं इस बार रम्पत का नौटंकी होगा। यार मामा नाक का सवाल है। थोड़ा कम
कर लो।’ बात अटकती है। वह बंदा किसी को फोन करता है। रम्पत कम पर
तैयार नहीं है। उनकी दलील है, ‘छह लड़की होगी।’ ग्राहक कहता है, ‘क्या यार मामा,
कम-से-कम आठ लाओ।’ थोड़ी ज़िच के बाद ‘साटा’ तय हो जाता है। मैं पूरे वार्तालाप का साक्षी हूँ। इसमें ‘नौटंकी’ कहीं नहीं है। केन्द्र में
है—लड़की और उसकी संख्या। वहाँ से खिन्न मन मैं जब बाहर निकलता हूँ तो अपने साथी
से पूछता हूँ—“यह कौन सी नौटंकी है?” वह कहता
है, “सरकारी कार्यक्रमों और कुछ संगठनों को छोड़कर बाक़ी जहाँ
कहीं भी नौटंकी होती है, वह यही होती है।” लेकिन फिर पता चलता
है कि हम-आप कला के नाम पर चाहे जो कह-कर लें, लेकिन रम्पत नहीं हो तो बहुत से घरों
में चूल्हा जलना मुश्किल हो जाएगा। साल-छह महीने में किसी कलाकार को एक ‘रोल’ और उसके एवज़ में
हज़ार-पन्द्रह सौ रूपये दे देने से क्या ज़िन्दगी चल जाएगी? अगर नहीं तो फिर ‘शुद्धता’ के चोले को अंततः क़फ़न में ही तब्दील होना है। ठीक है, आतमजीत
सिंह की ‘लैला-मंजनूं’ के चश्मे से देखें
तो रम्पत की ‘लैला-मजनूं’ बिल्कुल फूहड़ हैं,
वे बहरे-तबील और चौबोले की जगह पर सस्ते फिल्मी गाने ज़्यादा गाते हैं। लैला और
कैश के बीच ‘मदरसे’ में जो पाक मुहब्बत परवान
चढ़ सकती थी, उसको जोकर के द्विअर्थी संवाद दूषित बनाते हैं। लेकिन साहब पेट तो
इसी से चलता है। नौटंकी के परम्परागत कलाकारों के जीवन-बसर की कोई और राह न तो
कला-संस्थानों/विभागों ने निकाली है और न ही कला में आ रही गिरावट और अश्लीलता पर ज़ार-ज़ार
रोने वाले कला-प्रेमियों ने। बल्कि नौटंकी के स्वर्णिम अतीत को वर्तमान करने की
दिशा में क्रियाशील लोगों के प्रति भी इनके मन में कुढ़न और आक्रोश है। एक कलाकार
ने राहत इंदौरी का शेर पढ़ा, “कल तक दर दर फिरने वाले, घर के
अन्दर बैठे हैं / और बेचारे घर के मालिक, दरवाज़े पर बैठे हैं”। हालांकि इनसे यह
पूछा जा सकता है कि जब आप घर में थे तो घर की मर्यादा का ध्यान क्यों नहीं रखा? अपनी कला को, इस विधा को, इसके स्वर्णिम शिखर से च्युत
क्यों किया अथवा होने दिया? अगर उसी वक़्त तमाम
कलाकारों ने श्याम सुंदर का विरोध किया होता तो ‘वेरायटी’ की नींव ही नहीं पड़ती। ख़ैर, मकान तो जैसा कल था, आज भी
है, बस मक़ीन बदल रहे हैं। नौटंकी के परम्परागत कलाकारों के बहुत से तम्बू उखड़ गए
हैं, कुछ हैं जो अब भी अपना अस्तित्व बचाए हुए हैं। नये-पुराने अभिनेताओं, नई-पुरानी
कहानियों और साज-सज्जा के साथ नौटंकी अब भी जारी है।
नौटंकी थी, नौटंकी है (भाग 1)
कहाँ थे आप ज़माने के बाद आए हैं
मेरे शबाब के जाने के बाद आए हैं
वो चेहरे जो झुर्रियों की गिरफ़्त में थे, वो आँखें जो
खोई-खोई सी नज़र आती थीं, वो जिस्म जो हड्डियों के गठ्ठर बन गए थे, और सबके-सब
सुरंग जैसी अँधेरी तंग गलियों के बोसीदा क़फ़सनुमा कमरों के गुमनाम मकीन थे।
कानपुर हो, मथुरा हो, वृंदावन हो, कासगंज हो, हाथरस हो, आगरा हो, टुंडला हो,
खुर्जा हो, या कोई और मुलुक—परम्परागत नौटंकी के सितारों की दुनिया जुदा-जुदा नहीं
थी। सब अपने-अपने अंतिम अरण्य में बेदिली से ज़िन्दगी का सलीब ढोने को मजबूर।
उम्मीद की चिड़िया कभी-कभी अपने पर फड़फड़ाती थी तो आँखों के कोर आँसू की बूँदों
से लबलबा जाते थे, झुर्रियों की परत जोश के ज़ेरे-असर धूमिल पड़ने लगती थी, अतीत
अचानक वर्तमान हो उठता था, हड्डियों का ढाँचा गठीले जवान की मानिंद तन जाता था और
आवाज़ में जवानी की खनक लौट आती थी। नीम अँधेरे कमरों के इन बाशिंदों की आँखें
बिल्लौरी हो उठती थीं और आसमानी सितारों की मानिंद चमकने लगती थीं। कमरा मंच में
तब्दील हो जाता था। दमा का मरीज़ आबिद मास्टर, जिसकी ज़िन्दगी महज चंद दिनों की
मेहमान थी, अपनी टूटी चारपाई को जहाँगीर का तख़्त समझ बैठता और हुक्म फ़रमाने लगता—“मंगल सिंह, तुम्हारा फ़ेल क़ानून की निगाह में तुम्हें मुजरिम
क़रार देता है, लिहाजा इसके मुआवज़े में हम, मिनजानिब ये फ़ैसला सादिर फ़रमाते हैं
कि ख़ून का बदला ख़ून ! तुम्हें फांसी देकर
मक़्तूलाओं के ख़ून की क़ीमत चुका ली जाए, मगर चूँकि आमदे-माहे-रमज़ानुल-मुबारक
है, इसलिए इसके एहतराम में तमाम फाँसी के फैसले मुल्तवी किए जाते हैं और बाद
एख़्तेताम माहे-सय्याम तामील-ए-हुक्म हो।” जिस्म से लगभग लाग़र
और नाक के बदले मुँह से जबरन साँसें खींचते, बड़ी-बड़ी लेकिन बिल्कुल पीली पड़
चुकी आँखों वाले तकरीबन नब्बे साल के इस बुज़ुर्ग को जब मैं ब-आवाज़े बुलंद ‘जहाँगीर का इंसाफ’ के संवाद अदा करते
देखता-सुनता हूँ तो उनका बताया इतिहास मानो मेरी आँखों के सामने वर्तमान हो उठता
है। मुझे लगता है, मैं किसी गाँव में बाँस-बल्ली और चौकी की मदद से बनाए गए मचान
पर तख़्तनशीं जहाँगीर को देख रहा हूँ। मचान जैसा यह मंच चारों तरफ़ से खुला है।
पूरा गाँव मंच के इर्द-गिर्द जमा है। लालटेन और मशालें रौशन हैं और इस रौशनी में
जहाँगीर बने आबिद मास्टर का चेहरा दमक रहा है। लोगों ने मान लिया है कि मंच पर जो
मामूली-सी कुर्सी पड़ी है, वह मामूली कुर्सी नहीं है बल्कि जहाँगीर का तख़्त है और
वे लोग जहाँ बैठे हैं, वह गाँव का कोई ऊसर मैदान नहीं, बल्कि बादशाह का दीवान-ए-आम
है, जहाँ पर वह अपने ही एक सिपाही के ख़िलाफ़ क़त्ल का मुकदमा सुन रहे हैं और
फैसला सुना रहे हैं।
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