गुरुवार, 19 सितंबर 2013

हमारी अर्थी शाही हो नहीं सकती

ये जो टीवी पर अपने चैनल का बूम थामे, बाँहें चढ़ाए, बड़ी-बड़ी बातें करता हुआ शख़्स आपको नज़र आता है। जो तमाम घटनाओं की बारीकियों से आपको रू-ब-रू करवाता है। जो सरकार की नीतियों की धज्जियाँ पूरे आत्म-विश्वास के साथ उड़ाता है। वही, जिसके किसी थाने या दफ़्तर में पहुँचते ही पुलिस और कर्मचारी मुस्तैद नज़र आने लगते हैं, थोड़ी घबराहट के शिकार भी हो जाया करते हैं। जो कभी स्टूडियो में बैठा, किसी राज्य के मंत्री की जिम्मेदारी तय करता दिखता है। जो तमाम छोटी-बड़ी घटनाओं पर एक्सपर्ट कमेंट देने में बिल्कुल भी झिझक महसूस नहीं करता। वही, जो मजदूरों की हड़ताल या बंद के दौरान उनकी समस्याओं की बजाय देश और कम्पनी की अर्थ-व्यवस्था को होने वाले नुकसान को लेकर ज्यादा चिंतित नज़र आता है। जो बंद के दौरान स्टूडियो में बैठे रहने के बावजूद यात्रियों से ज़्यादा परेशानी महसूस करता है और बंद का आह्वान करने वालों को कठघरे में खड़ा करता है। जो सड़कों पर बरसात के मौसम में होने वाले वक़्ती जल-जमाव को भी सरकार के निकम्मेपन की निशानी क़रार देता है। जो राजनीति से लेकर विदेश नीति और क्रिकेट से लेकर केट विंसलेट तक के बारे में तमाम छोटी-बड़ी जानकारी रखता है।

शुक्रवार, 6 सितंबर 2013

वीरा हार को अभिशप्त है, क्यों?

फिल्मों के बारे में अक्सर कहा जाता है कि होती तो दो-ढाई घंटों की हैं, मगर कई फिल्मों का असर सदियों तक बना रहता है। अभी तो उम्र के चौथे दशक की सीमा में प्रवेश मिला है। सदियाँ देखी नहीं है। लेकिन हां, बात बेमानी नहीं। आज़ादी के बाद भारतीय सिनेमा ने कई रंग देखे। फिल्मों के कई दौर आए-गए, नायक-महानायक हुए। फिल्म निर्माण इंडस्ट्री स्टैबलिश हुई और अब तो हालत ये है कि सालाना सैंकड़ों की तादाद में फिल्में बनती हैं, रिलीज होती हैं। लोग देखते-सराहते भी हैं। हमें लगता है कि साहित्य में जितनी धाराएं और आंदोलन हुए हैं। फिल्मों में भी ऐसे ही वर्गीकरण हैं।

रविवार, 4 अगस्त 2013

मीडिया का च्युइंगम फेज


देवर्षि नारद का नाम तो आपने सुना ही होगा। धार्मिक वांग्मय तो उनके कारनामों से भरा-पड़ा है। पत्रकारिता का आदि अथवा आदर्श पुरुष भी यही हैं। बहुत से विद्वानों ने रामायण के हनुमान और महाभारत के संजय को भी इस पद के दावेदारों में शुमार किया था, लेकिन कई कारणों से नारद ही इस पद के निर्विवाद अधिकारी करार दिए गए। पहली बात तो यही कि नारद ब्रह्मा के मानस पुत्र हैं। जिस पवन के सुत हनुमान हैं, वही पवन इनकी पादुका यानी ‘पैर का जूता हैं। हनुमान की दुनिया राम तक ही सीमित रही। उनको रिपोर्टिंग का भी एक ही बार मौका मिला। वह श्रीलंका में सीता का पता लगाने के लिए भेजे गए थे। लेकिन वहाँ उन्होंने जिस तरह से पत्रकार की भूमिका के निर्वाह में कोताही बरती, वह जगजाहिर है। पत्रकार का काम तो शब्दों और संवादों से आग लगाना होता है, इन्होंने शब्द की बजाय सचमुच के आग से काम लिया। जबकि नारद मुनि के मुँह से कभी कटु बोल नहीं निकले। वह तो तीखी से तीखी बात भी मुस्कराते हुए कह जाते थे। इन्होंने जो कुछ भी किया, शब्दों की मदद से ही किया। इन्होंने कभी अपनी सीमा तय नहीं की। कभी भी एक ठौर नहीं ठहरे। तीनों लोक नापते रहे। ज्ञान और विद्या का शायद ही कोई क्षेत्र हो, जिन पर इनकी पकड़ न हो!  नारायण-नारायण की रट लगाते रहने के बावजूद नारद ने अपनी पैठ और पूछ समाज के सभी वर्गों में बना रखी थी। देव ही नहीं, मानव और दानव भी इनके प्रशंसक थे। वाणी तो मधुमय थी ही, वीणा बजाने में भी ये महारथ रखते थे।

सोमवार, 22 जुलाई 2013

मोदीनामा अथवा अमरीकी राज़ीनामा

नहीं-नहीं, आप इस मुग़ालते में न रहें कि मैं मोदी को लेकर सचमुच परेशान हूँ। पेशेवर मीडियाकर्मी हूँ। बयान तो आते-जाते रहते हैं। शिफ्ट ख़त्म, मुद्दा ख़त्म और टेंशन भी ख़त्म। ड्यूटी के दौरान बयान का छिन्द्रान्वेषण करना, बात का बतंगड़ बनाना, हमारी जिम्मेदारी में शुमार है। यह करना ही पड़ता है। पक्ष-विपक्ष के नेताओं को फुटेज देने के मामले में हम पूरे फ़राख़दिल हैं। इसके दो फ़ायदे हैं- पहला तो यही कि ख़बरों के कबाड़ख़ाने में घुसने और हाथ-दिमाग़ को गंदा करने से मुक्ति मिल जाती है, दूसरे एंकर को एक्सपोज़र मिलता है और टॉक के लिए आए नेताओं से संपादकों के संबंध प्रगाढ़ होते हैं, जो कालांतर में चैनल और उसको चलाने वालों के हित में कार-आमद साबित होते हैं।

शुक्रवार, 12 जुलाई 2013

आपदा बनाम मीडिया अर्थात गिद्धोत्सव परंपरा

सदाचार का पाठ हमेशा ख़ौफ़ की ज़िल्द में लिपटा रहता है। ऐसा ही रिवाज़ है। यह पाठ हमेशा बच्चे, बुज़ुर्ग और कमज़ोर तबके को ही पढ़ाया जाता है। ख़ासतौर से ख़ुदा का ख़ौफ़ और सामाजिक मर्यादा। प्रभुवर्ग का गुनगान भी रिवाज़ ही है। रिवाज़ यानी परंपरा। जिस कर्म या बात की दुहाई परंपरा के नाम पर दी जाती है, वह सनातन नहीं होती। कभी वह भी पहली बार ही किसी के द्वारा किसी पर आरोपित की गई होती है। बाद में बार-बार दुहराव होता है। लोग उसे सही और ज़रूरी मान बैठते हैं। फिर उसे परंपरा या रिवाज़ का नाम दे दिया जाता है। ऐसे बहुत से रिवाज़ थे, जो अब नहीं हैं। बहुत से रिवाज़ ऐसे हैं, जिन्हें आज भी हमने बंदरिया की तरह छाती से चिपका रखा है। इस बात से आप इनकार नहीं कर सकते कि ज़्यादातर रिवाज़ पारिवारिक अथवा सामाजिक गौरव की आड़ में ही जीवनी-शक्ति पाते रहे हैं, जबकि वास्तव में वे मानव-जाति के लिए अभिशाप थे। जौहर, सतीप्रथा, पर्दा-प्रथा, बाल-विवाह जैसे रिवाज़ इसी श्रेणी में जगह पाते हैं। कई बार प्रभुवर्ग अपने कुकृत्यों को छुपाने के लिए परंपरा की आड़ लेता है। कई बार किसी को दोषी साबित करने के लिए भी परंपरा की आड़ ली जाती है। सीता का दोबारा वन-गमन और उसी के आलोक में स्त्रियों की यौन-शुचिता का मसला परंपरा बन जाती है। कहने की ज़रूरत नहीं कि अपने शुरुआती दौर में बंदिशें, या तो ख़ौफ़ या फिर मर्यादा की आड़ लेकर ही आती हैं। बाद में यह रूढ़ हो जाती हैं और सनातन सत्य के रूप में स्थापित भी।

रविवार, 9 जून 2013

पीतमय जग जानी

नया उत्साह, नई तरंगों की पीठ पर सवार हो और अचानक कोई रोड़ा राह में झटका दे, तो ऐसी स्थिति में क्या होगा? बात ज़्यादा गंभीर नहीं है। वैसे भी जिस मुल्क में बड़ी-से-बड़ी समस्या भी गंभीरता की श्रेणी में जगह नहीं बना पाती, वहां एक बात की क्या औक़ात! अगर मैं ग़लत कह रहा हूँ, तो आप टोक सकते हैं। लेकिन मेरी एक छोटी सी शर्त है। कम-से-कम एक उदाहरण के साथ आपको पक्ष रखना होगा। वैसे विरोध का चलन भी पुराना है। सत्ता-पक्ष के साथ विपक्ष की संवैधानिक अनिवार्यता का सीधा संबंध इसी से है। हमने ‘निंदा’, ‘भर्त्सना’, ‘नैतिकता’, ‘समर्थन’, ‘अविश्वास’, ‘शपथ’, ‘त्याग’, ‘खंडन’, ‘विरोध’, ‘संघर्ष’, ‘आंदोलन’, ‘जनहित’ और ‘प्रस्ताव’ जैसे शब्द तो इसी व्यवस्था से सीखे हैं। (ऐसा कहते वक़्त, हमें आशंका है कि सांस्कृतिक पुनरुत्थान के पोषक तत्व, विरोध में उठ खड़े होंगे और इन शब्दों के सांस्कृतिक मर्म-धर्म बांचने को उद्धत हो उठेंगे। लेकिन अभिव्यक्ति के ख़तरे तो उठाने ही पड़ते हैं। भले ही वह बंध्या हो और प्रभाव के स्तर पर बिल्कुल बेकार। ख़ैर हम सफ़ाई पेश करना चाहते हैं कि इन शब्दों का उद्भव चाहे जिस किसी काल-खंड अथवा सांस्कृतिक परिवेश में हुआ हो, लेकिन हम तक इसकी पहुंच लोकतंत्र के वीर सिपाहियों की मदद से ही बनी है। इसलिए क्रेडिट हम इसी व्यवस्था को देंगे।)

रविवार, 26 मई 2013

अप्रत्याशित नहीं थी घटना


शनिवार को छत्तीसगढ़ में जो कुछ हुआ। वह अप्रत्याशित नहीं था। आपको यह अटपटा लग सकता है। आपकी दृष्टि में मेरी मानसिक स्थिति भी संदिग्ध हो सकती है। वैसे भी हम जिस लोकतांत्रिक दौर से गुज़र रहे हैं, उसमें कुछ भी असंदिग्ध नहीं है। यह आम धारणा है कि प्रभु-वर्ग या उससे जुड़े लोगों के विरुद्ध जो कुछ भी निगेटिव होता है, वह अप्रत्याशित ही होता है। प्रत्याशित घटनाएँ तो आमलोगों से जुड़ी होती हैं। दलित-आदिवासी और कमज़ोर तबके के लोगों का शोषण-दमन-उत्पीड़न प्रत्याशित होता है। यही समाज और व्यवस्था-सम्मत धारणा है। हत्या, लूट या बलात्कार हो या आंदोलन ये तभी बड़े होते हैं, जब बड़े लोगों के साथ हों या कि वे इनसे जुड़े हों। अब से पहले तक नक्सलियों ने सुरक्षा-बलों को ही अपना निशाना बनाया था। सैंकड़ों जवान मारे गए होंगे। लेकिन राजनेताओं के चेहरे पर ऐसी हवाइयाँ पहले कभी उड़ती नहीं देखी। यह देश के नक्सली इतिहास की सबसे बड़ी घटना है। ऐसा नहीं कि हम दुखी नहीं हैं। हमारे लिए तो हर-एक ज़िन्दगी अहम है, चाहे वह किसी कर्मा की हो या पटेल की या कि किसी ग़रीब आदिवासी की।

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'साक्षी है इतिहास' तथा अन्य चार कविताएँ

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