‘समझ’ का उम्र से रिश्ता है भी और
नहीं भी है। वैसे ही जैसे उम्र और ज़िन्दगी के गुज़रने में फ़र्क़ होता है। हम जिस
मुल्क में रहते हैं, वहाँ बड़ी आबादी की सिर्फ़ उम्र गुज़रती है, ज़िन्दगी नहीं।
इसके विपरीत एक तबका ऐसा भी है, जिसकी
ज़िन्दगी तो गुज़रती है, लेकिन
उम्र है कि साठ में भी छब्बीसवें बसंत का मुखौटा चस्पाँ किए इतराती फिरती है। जलने
वाले जलते हैं तो जलें, उनकी
बला से! अतः उम्र का सम्बंध ज़िन्दगी से है भी और नहीं भी। आदर्श स्थिति तो यही है
कि दोनों अन्योन्याश्रित हों!
किन्तु ऐसा विरले ही हो पाता है क्योंकि उम्र का सम्बंध प्रकृति से है और ज़िन्दगी
का भौतिक संसाधनों, लालसा और आत्मिक उल्लास से। भौतिक कारक अधिक अहमियत रखते हैं।
अतः त्याग से आत्मिक उल्लास की प्राप्ति का मार्ग विकट भी है और संदिग्ध भी,
क्योंकि लालसा मनुष्य की अनिवार्य दुर्गुण है। कबीर ने सही पहचाना था- “माया महा ठगनी हम जानी/तिरगुन
फांस लिए कर डोले/बोले मधुरे बानी।”
शुक्रवार, 20 मार्च 2015
रविवार, 8 मार्च 2015
‘डार्क रीऐलिटी’ के चितेरे हैं मधुर
20वीं
सदी के अंतिम दशक में हिन्दुस्तान में जो कुछ घटित हुआ, उसने कम-अज़-कम बौद्धिक
जगत में कुछ ऐसे पारिभाषिक शब्द प्रचलित किए, जो अब तक हमारे लिए बिल्कुल अनजान
थे। ‘भूमंडलीकरण’ और ‘उदारीकरण’ को बतौर उदाहरण प्रस्तुत किया
जा सकता है। जिन ग्रामीण बालाओं को ‘बर्फ़
का गोला’ भी
कभी-कभार ही नसीब हो पाता था, उन्हें रूप बदलकर गाँव पहुँचा बॉलीवुड का नायक, कुएँ
से ‘कोका
कोला’
निकाल-कर पीने-पिलाने लगा। ‘याराँ
दा टशन’ का
वो दौर अब भी जारी है। ‘डीटीएच’ ने शहरी मध्य-वर्गीय स्त्रियों
की ठसक और ऐंठ के साथ ही रुतबे पर भी बुरा असर डाला है। गर्मी की छुट्टियाँ बिताने
या तीज-त्यौहार पर गाँव जाने वाली इन विदुषियों का प्रभामंडल छिन्न-भिन्न हो चुका
है। अब न तो इनकी पहले-सी आवभगत होती है और न ही कोई ‘सास भी कभी बहू थी’ की अकथ-कथा सुनने के लिए
ख़ुशामदी अंदाज़ में इनके आगे-पीछे ही करती हैं। और तो और दूरदर्शन पर शुक्रवार के
दिन आनेवाली फिल्मों का क्रेज़ भी खत्म हो चुका है। मार्शल मैक्लूहान के ‘ग्लोबल विलेज़’ का ‘ग्लोबल’ बेचारा कब-का ‘ग्लोकल’ द्वारा अपदस्थ किया जा चुका
है। फिल्मों का नायक तो पहले ही बदल चुका था, अब तो कथानक भी बदल गया है। कुछ
रामगोपाल वर्मा टाईप हो गए हैं तो कुछ ने ख़ुद को कपिल और राजू श्रीवास्तव की
श्रेणी में फिट कर लिया है। फिल्मों में ‘भूतिया
दौर’ भले
ही ढंग से कभी आ नहीं पाया हो, लेकिन टीवी सोप्स ने बॉलीवुड की इस कमज़ोरी को अपने
अथक-परिश्रम से ढंक लिया है। भगवान कृष्ण ने बड़ा होने से मना कर दिया है और अब तो
गणेश की भी उम्र नहीं बढ़ती क्योंकि दोनों का बाल-रूप ही बच्चों को अट्रैक्ट करता
है। हाँ, एक महादेव हैं, जिन्हें अब तक बच्चा बनने का सौभाग्य नहीं मिला है। ‘हनुमान’ और ‘मूसकराज’ जैसे इनके सहयोगियों को भी
अच्छा-ख़ासा ‘फुटेज’ मिलने लगा है। नगरीय सभ्यता
के कामकाजी-जीवन और परिवार के विघटन से जो धार्मिक और पौराणिक गैप पैदा हुआ था,
उसे टीवी ने बख़ूबी भर दिया है। दिन-रात खट-खटकर बेहाल लोगों की सेहत का ख़्याल
रखते हुए धर्म-दर्शन का पुण्य-लाभ भी वाया टीवी अथवा सिनेमा, घर बैठे ही प्राप्त किया
जा सकता है।
रविवार, 22 फ़रवरी 2015
भरि-भरि मारै बान
हम जब
भोजन बनाते हैं तो ध्यान उसके स्वाद पर ही होता है। चिकित्सक भले पौष्टिकता का
आग्रह पालें। सामान्य व्यक्ति के लिए तो स्वाद भोजन की सबसे बड़ी विशेषता है। जिन
लोगों को स्वाद में दिलचस्पी नहीं होती, वे वैसे लोग होते हैं जिन्हें किसी रोग
अथवा व्याधी ने जकड़ रखा हो!
उनके लिए सेहत अधिक अहम होती है। हालांकि ‘स्वाद’ के प्रति आकर्षण तो वहाँ भी
बना ही रहता है। भय भले हाथ पर अंकुश लगा दें, नेत्र और जीभ ललचते ही रहते हैं।
मान लीजिए आप किसी के मेहमान हुए!
मेज़बान के घर ‘शाही
पनीर’ बना।
उसके रंग-सुगंध से ही आपकी क्षुधा का ‘ग्राफ’ ऊपर चढ़ने लगा। लेकिन आपने पहला
कौर मुँह में डाला और निगलने की बजाय उगल दिया। कारण यह कि रसोइया भोजन बनाते समय नमक
डालना भूल गया था। नमक की अनुपस्थिति से ‘शाही
पनीर’ के
रंग अथवा गंध पर तो फ़र्क़ नहीं पड़ा, लेकिन स्वाद बिगड़ गया। आपके सामने पड़ी
प्लेट में वह अब भी उतना ही मनोहारी दिख रहा है। उसकी गंध जो आपके नथूनों तक पहुँच
रही है, उसके जादू से अब भी आपके मुँह में पानी भरा है। लेकिन दूसरा कौर मुँह तक
लाने की इच्छा नहीं हो रही। क्या ऐसी ही स्थिति तब भी नहीं आती, जब सब्ज़ी में नमक
की मात्रा सामान्य से अधिक हो?
व्यंग्य के नाम पर लिखे जा रहे अकूत साहित्य पर दृष्टिपात करें तो बहुत हद तक यही
स्थिति नज़र आती है। वाक्य-वक्रता के बल पर व्यंग्य तो दूर हास्य भी उत्पन्न नहीं
किया जा सकता। फिर भी किया जा रहा है। मंचाश्रयी कवियों का काम तो फिर भी
शारीरिक-सांकेतिक पराक्रमों से चल सकता है, किन्तु लेखन के मामले में ‘भाव’ के बिना साहित्य के भवसागर को
पार करना, असम्भव है। यदि साहित्य आस्वाद का विषय है तो पढ़ते समय पाठक को स्वाद तो
मिलना ही चाहिए। लेकिन कुछ-एक को छोड़ दें तो व्यंग्य की नैया के ज़्यादातर
खेवनहार वाक्य-वक्रता की पतवार ही थामे नज़र आते हैं और व्यंग्य की नैया है कि न
इस किनारे आती है, न उस किनारे जाती है, बस शब्दों के बीच भंवर में फंसी चकरघिन्नी
की तरह बस गोल-गोल घूमती जाती है। पाठक को कुछ वाक्यों के बाद ही चक्कर आने शुरू
होते हैं और फिर मितली से उल्टी तक की प्रक्रिया पूर्ण हो जाती है। इस प्रकार पाठक
को आस्वाद के रूप में न तो हास्य की अनुभूति हो पाती है और न ही व्यंग्य का बोध।
ऐसी परिस्थिति में शब्दों की मर्यादा खंडित होती है और शिल्पी की छवि भी।
मंगलवार, 17 फ़रवरी 2015
रेत की परतें
बाढ़ का पानी अब उतार पर था। जलमग्न धरती कहीं-कहीं
अपना कूबड़ दिखाने लगी थी। छोटी-छोटी
मछलियों की छलमलाहट बढ़ गई थी। वही जल-धारा, जो कल तक उन्मादिनी सी हिलोरें मार रही थी, आज सुस्त-सी नज़र आ रही थी। डूबता सूरज भी आज अनासक्त-सा पानी को बस छू-कर चला गया था। उसने डूबने में दिलचस्पी ही नहीं ली। सीमा की यह
साध तो पुरानी ही थी, लेकिन
आज ही दिल से ज़ुबाँ तक का सफ़र तय कर पाई थी। उसने सरजू की बाँह पर अपनी पकड़ थोड़ी मज़बूत करते हुए कहा- 'क्या हम सुबह फिर यहाँ आ सकते हैं? मैं देखना
चाहती हूँ कि डूबी धरती, पानी से उबरने के तुरंत बाद कैसी लगती है?' सरजू ने ‘हाँ’
में सिर हिलाया और फिर निगाहें पानी के बीच उभरे धरती के कूबड़ों पर टिका दीं। सीमा जैसा उल्लास-मिश्रित
विस्मय,
सरजू के चेहरे पर नहीं आ पाया
था। वहाँ विषाद की एक और गहरी परत जम गई थी। ठीक वैसे ही, जैसे पानी उतरते समय उर्वर धरती पर बालू की एक
मोटी अनुपजाऊ परत छोड़ जाता है। सरजू
सोच रहा था- 'क्या
बेग़म-बादशाहों की तरह ही फ़सलों की क़ब्रें भी आकर्षक हुआ करती हैं, कि लोग देखने को दौड़ पड़ते हैं!?'
शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2015
केवल दो नर ना अघाते थे
10-12
साल पहले की एक घटना है। घटना का मीडिया से कोई सम्बंध नहीं है। तब हमारे गांव में
कुल पाँच ही दुकानें हुआ करती थीं। उनमें से भी केवल तीन ही लोकतांत्रिक थीं
अर्थात ऐसी दुकानें जहाँ प्रत्येक वर्ग-समुदाय और स्वभाव के लोग बिना किसी
दुराव-छिपाव के आ-जा सकते थे। शेष दो दुकानों पर वही लोग आते-जाते थे, जिन्हें
ताड़ी-दारू की तलब हुआ करती थी। मैं जिस घटना का ज़िक्र करने वाला हूँ, उसका
सम्बंध शेष दो दुकानों में से किसी एक से है!
घटना का मुख्य पात्र इनरदेव मंडल है। हमारे गाँव के ही एक मुहल्ले का निवासी। जो
बस-खलासी का काम करता था।
स्वभाव का दबंग तो था ही उसको अपनी ताक़त का घमंड भी था। इसलिए गाँव के
बड़े-बुज़ुर्ग कभी भी उसको यह समझाने का जोख़िम नहीं उठा पाए कि ‘भई ताड़ी-दारू नहीं पीते। सेहत
ख़राब होती है।’ हमउम्रों
में कभी इतनी हिम्मत हुई नहीं कि कोई उसके साथ तू-तड़ाक कर सके। नशेड़ी भले हो
लेकिन वह शील का बिल्कुल पक्का-सच्चा था। शोहदों से उसकी पुरानी दुश्मनी थी। अगर किसी
बंदे से ऊँच-नीच हो गई और इनरदेव को पता चल गया तो फिर उस बंदे की हड्डी
टूटे-न-टूटे, दो-तीन दिन के लिए खाट पकड़ना तो तय ही था। लेकिन उस शाम इनरदेव जमकर
पीने के बावजूद नशे में नहीं था। उसके अंदर का दबंग भी पस्त पड़ा हुआ था और उसकी
अकड़ न जाने कहाँ ग़ायब हो गई थी। वह सिर झुकाए शर्मिंदा सा पान की गुमटी से पीठ
टिकाए खड़ा था। हाँ, उसकी बहन ज़रूर ग़ुस्से में थी और अपने भाई के कथित दोस्त को
लानत-मलामत भेज रही थी। सामने वाला बंदा भी शर्मिंदा था और बार-बार यही सफ़ाई पेश
कर रहा था कि ‘यार
मुझे नहीं पता था कि ये तेरी ही बहन है।’
बात दरअसल ये थी कि इनरदेव को उसके दोस्त ने पार्टी दी थी। उसका दोस्त भी बस
स्टैंड में ही काम करता था। होगी ख़ुशी की कोई बात! ...तो दोनों ने पहले पासीखाने में चखने के साथ
ताड़ी का लुत्फ़ उठाया और फिर झूमते हुए पान खाने आ पहुँचे। पनवाड़ी जिस वक़्त पान
लगा रहा था और ये दोनों सुरूर में झूम रहे थे, ठीक उसी वक़्त इनरदेव की बहन दुकान
से सौदा ले घर लौट रही थी। जब वह पान की गुमटी के पास से गुजर रही थी तभी इनरदेव
के मित्र की निगाह उस पर पड़ी और उसने एक भद्दा सा फ़िकरा कस दिया। लड़की ने पहले
तो उस व्यक्ति के कुल-ख़ानदान की शान में क़सीदे पढ़े। फिर भाई को भी लताड़ दिया।
कोई और मौक़ा होता तो इनरदेव अब तक उस व्यक्ति की हड्डियाँ चटखा चुका होता। किन्तु
आज ख़ुद उसकी बहन पर फ़िकरा कसा गया था और वह था कि सिर झुकाए मौन खड़ा था। वह
अपने दोस्त की सफ़ाई के जवाब में बार-बार दाँत पीसते हुए धीमी आवाज़ में एक ही बात
दुहरा रहा था- ‘चुपचाप
चल जाओ। ताड़ी पिला के नाक काट लिया। भाग जाओ!’
इनरदेव ने अपने मित्र के पैसे की ताड़ी पी थी, इसलिए उसके हाथ शिथिल पड़ गए।
इनरदेव ने अपने मित्र के पैसे का चखना चखा था, इसलिए उसकी ज़ुबान क्रोध के अतिरेक
के बावजूद अपशब्द निकाल पाने में स्वयं को असहज महसूस कर रही थी। दूसरों की
माँ-बहनों की बेइज़्ज़ती बर्दाश्त नहीं कर पाने वाला इनरदेव आज स्वयं अपनी बहन के
क्रोध में भागीदार नहीं बन पा रहा था। आप चाहें तो इन तीन पात्रों को प्रतीकात्मक
मान सकते हैं। इनरदेव को मीडिया, इनरदेव की बहन को जनता और इनरदेव के मित्र को
पूँजी के रूप में यदि देखें तो वर्तमान मीडिया का वास्तविक चित्र और चरित्र उद्घाटित
हो सकता है। लेकिन यह इनरदेव के साथ अन्याय होगा! इनरदेव को तो अपनी भूल पर पछतावा था। लेकिन
मीडिया इसको भूल नहीं बल्कि अपना कौशल मानता है। वह चखना और ताड़ी को इंज्वॉय कर
रहा है। पूँजी द्वारा जनता के साथ भद्दा मज़ाक उसके लिए शर्म या आक्रोश का विषय
नहीं है।
रविवार, 4 जनवरी 2015
सामासिक संस्कृति की संभाव्यता का आख्यान
गौरीनाथ
के उपन्यास ‘दाग’ को पढ़ने के बाद मेरी यह धारणा
और मज़बूत हुई है कि अंतःप्रज्ञा साहित्य का सबसे महत्वपूर्ण घटक है। इसके बिना
साहित्य-सृजन संभव नहीं है। अंतःप्रज्ञा का अभाव, साहित्य को एक ऐसे तालाब में तब्दील कर देता है, जिसमें पानी तो है लेकिन मछली
अर्थात जीवन नहीं है। और अगर हम जीवन को मछली मान लेते हैं तो पानी को उस समाज के
रूप में चिन्हित करना होगा, जिसमें
मनुष्य जन्म से मृत्यु तक रहता है। अर्थात साहित्य न सिर्फ समाज और मानव-जीवन के
जटिल अंतर्संबंधों से प्रभावित होता है, बल्कि
वह सार्थक हस्तक्षेप भी करता है। हस्तक्षेप की त्वरा कितनी है? या कि वह समाज पर कितना प्रभाव
छोड़ती है? यह
साहित्यकार की अंतःप्रज्ञा पर निर्भर करता है। जबकि अंतःप्रज्ञा की आधार-भूमि
संवेदनात्मक ज्ञान और ज्ञानात्मक संवेदन है। बकौल मुक्तिबोध ‘जिस प्रकार हम संवेदनात्मक
ज्ञान और ज्ञानात्मक संवेदन द्वारा बचपन से ही बाह्य जीवन जगत को आत्मसात कर उसे
मनोवैज्ञानिक रूप देते आते हैं, उसी
तरह हम इस आत्मसात्कृत अर्थात मन द्वारा संशोधित, सम्पादित, संस्कारित, गठित-पुनर्गठित, जीवन-जगत को बाह्य रूप भी देते
हैं।’ स्पष्ट
है कि हम अपने संवेदनात्मक ज्ञान और ज्ञानात्मक संवेदन की मदद से जीवन, समाज, संस्कार, धर्म और अन्यायन्य चीजों को
देखते-समझते और आत्मसात करते चलते हैं और उसे संशोधन-सम्पादन के बाद अभिव्यक्ति भी
देते हैं। बाहरी जीवन-जगत का आभ्यन्तरीकरण और आभ्यन्तरीकृत का बाह्यीकरण एक सनातन
मानव प्रक्रिया है। कला आत्मजगत के बाह्यीकरण का ही एक मार्ग है, जिसको अंतःप्रज्ञा से आलोक
मिलता है। ‘दाग’ का सर्जक इस कसौटी पर बिल्कुल
खरा उतरता है। वरना कोई कारण नहीं कि सामाजिक-सांस्कृतिक धरातल पर असंभव सी लगने
वाली यह कथा पाठक को सहज ही पूर्णतः विश्वसनीय प्रतीत होने लगती है। यह
विश्वसनीयता यदि संभव हुई है तो निश्चय ही इसका सीधा संबंध लेखक के ज्ञानात्मक
संवेदन, संवेदनात्मक
ज्ञान और उसकी अंतःप्रज्ञा का ही कमाल है।
शुक्रवार, 2 जनवरी 2015
क्रांति ऐसे नहीं आती
(भगत सिंह को याद करते हुए)
क्रांति कोई चूँ-चूँ
का मुरब्बा नहीं
क्रांति डालडा
का खाली डब्बा नहीं
क्रांति अद्धा, पौव्वा या सिक्का भी नहीं
क्रांति उद्घोष
या नारों का नाम नहीं
झंडे को मीनार
पर टाँगने का नाम नहीं
क्रांति कोई मादक
गंध भी नहीं है कि
फूल से झड़ते
शब्दों पर कोई हो जाए क़ुर्बान!
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