संचार
क्रांति के बाद मीडिया और बाज़ार का संबंध और प्रगाढ हुआ है। दोनों की गलबहियाँ के
साइड इफेक्ट्स ही नहीं, बल्कि फायदों से भी आप बख़ूबी वाक़िफ़ हैं। पहला फ़ायदा तो
यही कि हिन्दी रोज़गार की भाषा के रूप में स्थापित हुई। ग्रामीण क्षेत्रों के
सुविधा-विहीन छात्रों की मजबूरी और कॉलेज-यूनिवर्सिटी के उपेक्षित विभाग के रूप
में चिन्हित एक ऐसी भाषा, जो मेधा के मामले में पिछड़े छात्रों की अंतिम शरण-स्थली
हुआ करती थी, अब अँग्रेज़ी स्कूल से पास-आउट छात्रों की भी मजबूरी बन गई। लोग
अँग्रेज़ी का तड़का लगाकर ही सही, हिन्दी लिखने और बोलने को बाध्य हुए। ऐसा, लोगों
के हिन्दी-भाषा से रागात्मक संबंधों के कारण कम, बाज़ार के दबाव के कारण ज़्यादा
हुआ है।
मंगलवार, 12 नवंबर 2013
शनिवार, 26 अक्टूबर 2013
कूप-जल नहीं, भाखा बहता नीर
भारत
में भाषा का टंटा नया नहीं है। प्राचीन-काल से उठा-पटक चली आ रही है। देव-भाषा के
साथ लोक-भाषा की रस्साकशी के फ़साने बहुत हैं, लेकिन हमें विश्वास है कि
आप बेवजह भाषा का इतिहास खंगालने या उसमें होते रहे परिवर्तनों की कथा सुनने के
मूड में नहीं होंगे। हमें भी ज़्यादा दिलचस्पी नहीं। लिहाजा भूमिका का क्षेत्रफल
कम रहे तो कोई दिक्कत नहीं। हम भाषा पर बात तो करना चाहते हैं, लेकिन हमारे हाथ
में शास्त्रीयता का लौहदंड नहीं है। हमारा विमर्श व्याकरण की पटरी पर सरपट दौड़ने
का हामी भी नहीं है। भाषा की ज़रूरत और अनिवार्यता को चुनौती देना या व्याकरण के
ख़िलाफ़ विद्रोह का झंडा बुलंद करने में भी हमारी कोई दिलचस्पी नहीं है। बल्कि
हमारा मक़सद यह पड़ताल है कि क्या वाकई भाषा(भारतीय संदर्भ में) की शुद्धता इतनी
अहम है कि उसकी क़ीमत सम्प्रेषण में व्यवधान से चुकाई जाए? क्या समय के साथ सामाजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक बदलाव और
ज़रूरतों के हिसाब से भाषा में बदलाव नहीं होने चाहिए? माध्यम के अनुरूप भाषा में बदलाव मान्य नहीं होना चाहिए? ऐसे और भी सवाल हैं, जो आप अपनी तरफ से जोड़ सकते हैं।
गुरुवार, 19 सितंबर 2013
हमारी अर्थी शाही हो नहीं सकती
ये जो टीवी पर अपने चैनल का बूम
थामे, बाँहें चढ़ाए, बड़ी-बड़ी बातें करता हुआ शख़्स आपको नज़र आता है। जो तमाम
घटनाओं की बारीकियों से आपको रू-ब-रू करवाता है। जो सरकार की नीतियों की धज्जियाँ
पूरे आत्म-विश्वास के साथ उड़ाता है। वही, जिसके किसी थाने या दफ़्तर में पहुँचते
ही पुलिस और कर्मचारी मुस्तैद नज़र आने लगते हैं, थोड़ी घबराहट के शिकार भी हो
जाया करते हैं। जो कभी स्टूडियो में बैठा, किसी राज्य के मंत्री की जिम्मेदारी तय
करता दिखता है। जो तमाम छोटी-बड़ी घटनाओं पर एक्सपर्ट कमेंट देने में बिल्कुल भी
झिझक महसूस नहीं करता। वही, जो मजदूरों की हड़ताल या बंद के दौरान उनकी समस्याओं
की बजाय देश और कम्पनी की अर्थ-व्यवस्था को होने वाले नुकसान को लेकर ज्यादा
चिंतित नज़र आता है। जो बंद के दौरान स्टूडियो में बैठे रहने के बावजूद यात्रियों
से ज़्यादा परेशानी महसूस करता है और बंद का आह्वान करने वालों को कठघरे में खड़ा
करता है। जो सड़कों पर बरसात के मौसम में होने वाले वक़्ती जल-जमाव को भी सरकार के
निकम्मेपन की निशानी क़रार देता है। जो राजनीति से लेकर विदेश नीति और क्रिकेट से
लेकर केट विंसलेट तक के बारे में तमाम छोटी-बड़ी जानकारी रखता है।
शुक्रवार, 6 सितंबर 2013
वीरा हार को अभिशप्त है, क्यों?
फिल्मों के बारे में अक्सर कहा जाता है कि होती तो
दो-ढाई घंटों की हैं, मगर कई फिल्मों का असर सदियों तक बना रहता है। अभी तो उम्र
के चौथे दशक की सीमा में प्रवेश मिला है। सदियाँ देखी नहीं है। लेकिन हां, बात
बेमानी नहीं। आज़ादी के बाद भारतीय सिनेमा ने कई रंग देखे। फिल्मों के कई दौर
आए-गए, नायक-महानायक हुए। फिल्म निर्माण इंडस्ट्री स्टैबलिश हुई और अब तो हालत ये
है कि सालाना सैंकड़ों की तादाद में फिल्में बनती हैं, रिलीज होती हैं। लोग
देखते-सराहते भी हैं। हमें लगता है कि साहित्य में जितनी धाराएं और आंदोलन हुए
हैं। फिल्मों में भी ऐसे ही वर्गीकरण हैं।
रविवार, 4 अगस्त 2013
मीडिया का च्युइंगम फेज
देवर्षि नारद का नाम तो
आपने सुना ही होगा। धार्मिक वांग्मय तो उनके कारनामों से भरा-पड़ा है। पत्रकारिता
का आदि अथवा आदर्श पुरुष भी यही हैं। बहुत से विद्वानों ने रामायण के हनुमान और
महाभारत के संजय को भी इस पद के दावेदारों में शुमार किया था, लेकिन कई कारणों से
नारद ही इस पद के निर्विवाद अधिकारी करार दिए गए। पहली बात तो यही कि नारद ब्रह्मा
के मानस पुत्र हैं। जिस पवन के सुत हनुमान हैं, वही पवन इनकी पादुका यानी ‘पैर का जूता’
हैं। हनुमान की दुनिया राम तक ही सीमित रही। उनको रिपोर्टिंग का भी एक ही बार मौका
मिला। वह श्रीलंका में सीता का पता लगाने के लिए भेजे गए थे। लेकिन वहाँ उन्होंने
जिस तरह से पत्रकार की भूमिका के निर्वाह में कोताही बरती, वह जगजाहिर है। पत्रकार
का काम तो शब्दों और संवादों से आग लगाना होता है, इन्होंने शब्द की बजाय सचमुच के
आग से काम लिया। जबकि नारद मुनि के मुँह से कभी कटु बोल नहीं निकले। वह तो तीखी से
तीखी बात भी मुस्कराते हुए कह जाते थे। इन्होंने जो कुछ भी किया, शब्दों की मदद से
ही किया। इन्होंने कभी अपनी सीमा तय नहीं की। कभी भी एक ठौर नहीं ठहरे। तीनों लोक
नापते रहे। ज्ञान और विद्या का शायद ही कोई क्षेत्र हो, जिन पर इनकी पकड़ न हो! ‘नारायण-नारायण’
की रट लगाते रहने के बावजूद नारद ने अपनी पैठ और पूछ समाज के सभी वर्गों में बना
रखी थी। देव ही नहीं, मानव और दानव भी इनके प्रशंसक थे। वाणी तो मधुमय थी ही, वीणा
बजाने में भी ये महारथ रखते थे।
सोमवार, 22 जुलाई 2013
मोदीनामा अथवा अमरीकी राज़ीनामा
नहीं-नहीं, आप इस मुग़ालते में न रहें कि मैं मोदी को
लेकर सचमुच परेशान हूँ। पेशेवर मीडियाकर्मी हूँ। बयान तो आते-जाते रहते हैं। शिफ्ट
ख़त्म, मुद्दा ख़त्म और टेंशन भी ख़त्म। ड्यूटी के दौरान बयान का छिन्द्रान्वेषण
करना, बात का बतंगड़ बनाना, हमारी जिम्मेदारी में शुमार है। यह करना ही पड़ता है। पक्ष-विपक्ष
के नेताओं को फुटेज देने के मामले में हम पूरे फ़राख़दिल हैं। इसके दो फ़ायदे हैं-
पहला तो यही कि ख़बरों के कबाड़ख़ाने में घुसने और हाथ-दिमाग़ को गंदा करने से
मुक्ति मिल जाती है, दूसरे एंकर को एक्सपोज़र मिलता है और टॉक के लिए आए नेताओं से
संपादकों के संबंध प्रगाढ़ होते हैं, जो कालांतर में चैनल और उसको चलाने वालों के
हित में कार-आमद साबित होते हैं।
शुक्रवार, 12 जुलाई 2013
आपदा बनाम मीडिया अर्थात गिद्धोत्सव परंपरा
सदाचार
का पाठ हमेशा ख़ौफ़ की ज़िल्द में लिपटा रहता है। ऐसा ही रिवाज़ है। यह पाठ हमेशा
बच्चे, बुज़ुर्ग और कमज़ोर तबके को ही पढ़ाया जाता है। ख़ासतौर से ख़ुदा का ख़ौफ़
और सामाजिक मर्यादा। प्रभुवर्ग का गुनगान भी रिवाज़ ही है। रिवाज़ यानी परंपरा।
जिस कर्म या बात की दुहाई परंपरा के नाम पर दी जाती है, वह सनातन नहीं होती। कभी वह
भी पहली बार ही किसी के द्वारा किसी पर आरोपित की गई होती है। बाद में बार-बार
दुहराव होता है। लोग उसे सही और ज़रूरी मान बैठते हैं। फिर उसे परंपरा या रिवाज़
का नाम दे दिया जाता है। ऐसे बहुत से रिवाज़ थे, जो अब नहीं हैं। बहुत से रिवाज़
ऐसे हैं, जिन्हें आज भी हमने बंदरिया की तरह छाती से चिपका रखा है। इस बात से आप
इनकार नहीं कर सकते कि ज़्यादातर रिवाज़ पारिवारिक अथवा सामाजिक गौरव की आड़ में ही
जीवनी-शक्ति पाते रहे हैं, जबकि वास्तव में वे मानव-जाति के लिए अभिशाप थे। जौहर, सतीप्रथा, पर्दा-प्रथा, बाल-विवाह
जैसे रिवाज़ इसी श्रेणी में जगह पाते हैं। कई बार प्रभुवर्ग अपने कुकृत्यों को
छुपाने के लिए परंपरा की आड़ लेता है। कई बार किसी को दोषी साबित करने के लिए भी
परंपरा की आड़ ली जाती है। सीता का दोबारा वन-गमन और उसी के आलोक में स्त्रियों की
यौन-शुचिता का मसला परंपरा बन जाती है। कहने की ज़रूरत नहीं कि अपने शुरुआती दौर
में बंदिशें, या तो ख़ौफ़ या फिर मर्यादा की आड़ लेकर ही आती हैं। बाद में यह रूढ़
हो जाती हैं और सनातन सत्य के रूप में स्थापित भी।
रविवार, 9 जून 2013
पीतमय जग जानी
नया उत्साह, नई तरंगों की पीठ पर सवार हो और अचानक कोई रोड़ा राह में झटका दे, तो ऐसी स्थिति में क्या होगा? बात ज़्यादा गंभीर नहीं है। वैसे भी जिस मुल्क में बड़ी-से-बड़ी समस्या भी गंभीरता की श्रेणी में जगह नहीं बना पाती, वहां एक बात की क्या औक़ात! अगर मैं ग़लत कह रहा हूँ, तो आप टोक सकते हैं। लेकिन मेरी एक छोटी सी शर्त है। कम-से-कम एक उदाहरण के साथ आपको पक्ष रखना होगा। वैसे विरोध का चलन भी पुराना है। सत्ता-पक्ष के साथ विपक्ष की संवैधानिक अनिवार्यता का सीधा संबंध इसी से है। हमने ‘निंदा’, ‘भर्त्सना’, ‘नैतिकता’, ‘समर्थन’, ‘अविश्वास’, ‘शपथ’, ‘त्याग’, ‘खंडन’, ‘विरोध’, ‘संघर्ष’, ‘आंदोलन’, ‘जनहित’ और ‘प्रस्ताव’ जैसे शब्द तो इसी व्यवस्था से सीखे हैं। (ऐसा कहते वक़्त, हमें आशंका है कि सांस्कृतिक पुनरुत्थान के पोषक तत्व, विरोध में उठ खड़े होंगे और इन शब्दों के सांस्कृतिक मर्म-धर्म बांचने को उद्धत हो उठेंगे। लेकिन अभिव्यक्ति के ख़तरे तो उठाने ही पड़ते हैं। भले ही वह बंध्या हो और प्रभाव के स्तर पर बिल्कुल बेकार। ख़ैर हम सफ़ाई पेश करना चाहते हैं कि इन शब्दों का उद्भव चाहे जिस किसी काल-खंड अथवा सांस्कृतिक परिवेश में हुआ हो, लेकिन हम तक इसकी पहुंच लोकतंत्र के वीर सिपाहियों की मदद से ही बनी है। इसलिए क्रेडिट हम इसी व्यवस्था को देंगे।)
रविवार, 26 मई 2013
अप्रत्याशित नहीं थी घटना
शनिवार को छत्तीसगढ़ में जो कुछ हुआ। वह अप्रत्याशित
नहीं था। आपको यह अटपटा लग सकता है। आपकी दृष्टि में मेरी ‘मानसिक
स्थिति’ भी संदिग्ध हो सकती है। वैसे भी हम जिस लोकतांत्रिक दौर से
गुज़र रहे हैं, उसमें कुछ भी असंदिग्ध नहीं है। यह आम धारणा है कि प्रभु-वर्ग या
उससे जुड़े लोगों के विरुद्ध जो कुछ भी निगेटिव होता है, वह अप्रत्याशित ही होता
है। प्रत्याशित घटनाएँ तो आमलोगों से जुड़ी होती हैं। दलित-आदिवासी और कमज़ोर तबके
के लोगों का शोषण-दमन-उत्पीड़न प्रत्याशित होता है। यही समाज और व्यवस्था-सम्मत
धारणा है। हत्या, लूट या बलात्कार हो या आंदोलन— ये तभी बड़े होते हैं, जब बड़े
लोगों के साथ हों या कि वे इनसे जुड़े हों। अब से पहले तक नक्सलियों ने सुरक्षा-बलों
को ही अपना निशाना बनाया था। सैंकड़ों जवान मारे गए होंगे। लेकिन राजनेताओं के
चेहरे पर ऐसी हवाइयाँ पहले कभी उड़ती नहीं देखी। यह देश के नक्सली इतिहास की सबसे
बड़ी घटना है। ऐसा नहीं कि हम दुखी नहीं हैं। हमारे लिए तो हर-एक ज़िन्दगी अहम है,
चाहे वह किसी कर्मा की हो या पटेल की या कि किसी ग़रीब आदिवासी की।
शनिवार, 18 मई 2013
मर्ज कुछ, इलाज कुछ
छुटपन की एक घटना याद आती है। गाँव की एक लड़की, गाँव
के ही युवक के साथ पकड़ी गई। मामला प्रेम-प्रसंग का था। बड़े-बुज़ुर्गों की सदारत
में पंचायत बैठी। दोनों पंचायत में पेश हुए। पंचों को बताया कि वे एक-दूसरे से
प्यार करते हैं और शादी करना चाहते हैं। लेकिन
पंचों ने प्रस्ताव को नकार दिया। मामला नैतिक-अनैतिक के बिन्दु तक ही सीमित कर
दिया गया। सवाल-जवाब से ज़्यादा दोनों की लानत-मलामत हुई और सज़ा मुक़र्रर कर दी
गई। दो-चार शोहदे टाईप के जवान मुस्तैदी से उठे और बाँस की कच्ची कमाचियाँ काट लाए।
इस तरह प्रेमी-युगल की पीठ पर भरी पंचायत में सदाचार की लकीरें उकेरी गईं। दोनों
को माँ-बाप ही नहीं बल्कि सामाजिक संस्कार की अवहेलना का भी दोषी ठहराया गया। सज़ा
और सुनवाई का केन्द्र-बिन्दु प्रेम नहीं था।
गुरुवार, 9 मई 2013
हलाल का बदला झटका
सआदत
हसन मंटो की एक छोटी सी कहानी है- ‘हलाल और झटका’। यह कहानी आज बेतरह याद आ रही है। कहानी में दो किरदार हैं।
पहला कहता है- “मैंने उसकी शहरग पर छुरी रखी,
हौले-हौले फेरी और उसको हलाल कर दिया।” दूसरा चौंकता है- “यह तुमने क्या किया?” सवाल के जवाब में पहले का
सवाल आता है- “क्यों?”
दूसरा अपने सवाल को थोड़ी तफ्सील देता है- “इसको हलाल क्यों किया?” पहला रस लेते हुए कहता है- “मज़ा
आता है, इस तरह...” दूसरा खीझ कर कहता है- “मज़ा आता है के बच्चे... तुझे झटका करना चाहिए था... इस तरह।” और हलाल करने वाले की गर्दन का झटका हो गया। हो सकता है कि मंटो
अपने दौर का सच लिख रहे हों! लेकिन यह हमारे दौर का भी
सच है।
शुक्रवार, 26 अप्रैल 2013
विरासत की बेदखली, --विश्वनाथ त्रिपाठी
![]() |
यह चाहे जितना भी खेदजनक हो, लेकिन यह कहने का समय आ गया है कि कम से कम कथा साहित्य में, हिन्दी में लिखने वाले मुसलमान लेखकों को वह स्थान नहीं मिला जिसके वह हक़दार थे या हैं। मैं जान-बूझकर पुरस्कार या सम्मान की बात नहीं करना चाहता, क्योंकि यह कोई मानदंड नहीं है। लेकिन उपेक्षा हुई है। इसके क्या कारण रहे हैं, उसकी पड़ताल या छानबीन का यह अवसर नहीं है। लेकिन उपन्यास पर बात करते समय मैं इस तथ्य की तरफ इशारा जरूरी समझता हूँ। बहुत दिनों से यह सवाल मेरे मन में बना हुआ है और इसका कोई स्पष्ट कारण मुझे समझ में नहीं आता। सामान्यतः हिन्दी साहित्य का जो माहौल है, वह बिल्कुल साम्प्रदायिक नहीं है, बल्कि यह सम्प्रदाय विरोधी है। फिर भी ऐसा क्यों होता है या हो रहा है? यह मैं नहीं जानता।
रविवार, 14 अप्रैल 2013
बुधवार, 10 अप्रैल 2013
मौत की किताब (उपन्यास का अंश)
मैं जल्लाद के पीछे-पीछे चल रहा हूँ। क्या मुझे झूलते
हुए रस्सी के फन्दे की तरफ़ ले जाया जा रहा है? इन सब के वज़नी बूट मेरे आगे मार्च कर रहे हैं। मैं रात
भर जागा हूँ। अभी तो नींद आई थी कि रुख़्सत का वक़्त आ पहुँचा। मैं एक बार फिर सुबह
की नींद के खि़लाफ़ चल रहा हूँ। अपने काहिल और ढीले हाथ-पैरों से मैं नींद के ख़िलाफ़
एक बयानिया फिर लिख रहा हूँ। आज सारे इक़बाले जुर्म और चश्मदीद गवाह पूरे हो गए।
सोमवार, 25 मार्च 2013
सोमवार, 11 मार्च 2013
घड़ा बदलने से पानी नहीं बदलता
15 अगस्त 1947। भारत के लिए पर्व का दिन। इतिहास का
टर्निंग प्वॉइंट। मान्यता के मुताबिक आधी रात को आज़ादी दबे-पाँव देश में दाखिल
हुई थी। लोग-बाग जश्न में डूबे थे। पटाखे फूट रहे थे। नारे गूँज रहे थे। आम जनता
मदमस्त थी। उसको इस बात की चिंता ही नहीं थी कि सदियों बाद लौटी आज़ादी के
रहने-सहने का बंदोबस्त कौन करेगा? वह ठहरेगी कहाँ?
शनिवार, 2 मार्च 2013
गुरुवार, 21 फ़रवरी 2013
आन वर्सेस स्वाभिमान- सुनवाई जारी है
‘सवाल
सिर्फ मंदिर का नहीं। स्वाभिमान का भी है। तुम साले बाबर की औलाद... पुरखों का पाप तो भोगोगे ही।
बहुत हो गया।’ उसकी आवाज़ नफ़रत के कीचड़ में पूरी
तरह से लिथड़ी हुई थी। सामने खड़ा करीब 13 साल का लड़का राय साहब के बेटे के इस बर्ताव
से अचंभे में
पड़ा, कुछ देर वहीं खड़ा रहा। वह अचानक उफनी इस नफ़रत का कारण जानना चाहता था। वह
उससे पूछना चाहता था। लेकिन पूछने की हिम्मत नहीं जुटा सका। उनकी आंखों में नफ़रत
की भड़कती चिंगारी देख, उसकी अपनी आँखों में ख़ौफ़ उतर आया। वह चुपचाप वहां से लौट आया।
मंगलवार, 19 फ़रवरी 2013
इतिहास का उल्था वाया अयोध्या
'उल्टी करते-करते जाह्नवी की आँखें उलट गई थीं।
वह निश्छल और पवित्र कहां रह पाई! शिव की जटा से निकल, जब महावीर कर्ण के
घर चम्पावती पहुंची थी, तब सपने में भी नहीं सोचा था कि सुजानगढ़ के लोग ही
उसके साथ कभी ऐसा सलूक भी करेंगे। जाह्नवी तो सोचती थी कि यहां ज्ञान,
मानवता और न्याय का पाठ पढ़ाया जाता है। असुरों को परास्त करने के लिए
मथानी और रस्से की व्यवस्था जहां के लोगों ने की हो, उनके बारे में अशुभ
विचार कैसे पनप सकते थे! लेकिन मनुष्य की
प्रवृत्ति कब और कैसे बदल जाए, कौन जानता है?' कथा कहते-कहते बुज़ुर्ग का
गला अचानक भर्रा उठा, उसकी लंबी सफेद दाढ़ी आटा-चक्की वाले ईंजन की तरह
कांप रही थी। आँखें लाल स्याही से रंग चुकी थीं।
गुरुवार, 14 फ़रवरी 2013
सोमवार, 4 फ़रवरी 2013
आसान नहीं होता 'शोकगीत गाना'
![]() |
| तस्वीर में- ख़ालिद जावेद, डॉ. संजीव कुमार, प्रो. दुर्गा प्रसाद गुप्त, प्रो. अब्दुल बिस्मिल्लाह, प्रो. शम्सुलहक़ उस्मानी एवं अन्य |
जामिया मिल्लिया इस्लामिया का टैगोर हॉल श्रोताओं से
खचाखच भरा था। जितने कुर्सियों पर बैठे थे, उससे कहीं ज्यादा लोग फ़र्श पर बैठे या
फिर खड़े थे। मौका था हिन्दी विभाग की तरफ से ‘सृजन एवं
संवाद’ कार्यक्रम के तहत कहानी पाठ का। उर्दू भाषा के सिद्धहस्त
कथाकार डॉ. ख़ालिद जावेद, अपनी कहानी ‘शोकगीत गानेवाला’
का जब पाठ कर रहे थे, वहां मौजूद श्रोता, एक अलग क़िस्म की दुनिया में गोते लगा
रहे थे। पाठ के दौरान श्रोताओं के चेहरे पर आते-जाते हर्ष-विषाद के भिन्न भाव, कथा
के साथ न सिर्फ उनके तादात्म्य का बोध करा रहे थे, बल्कि इस बात का अहसास भी दिला
रहे थे कि यह कहानी उनके अंदर अरसे से ‘काई’ की तरह
जमे उन भावों पर भी खराशें डाल रही थी, जो शिल्प के अभाव में अभिव्यक्ति नहीं पा
सके थे।
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