सोमवार, 22 जुलाई 2013

मोदीनामा अथवा अमरीकी राज़ीनामा

नहीं-नहीं, आप इस मुग़ालते में न रहें कि मैं मोदी को लेकर सचमुच परेशान हूँ। पेशेवर मीडियाकर्मी हूँ। बयान तो आते-जाते रहते हैं। शिफ्ट ख़त्म, मुद्दा ख़त्म और टेंशन भी ख़त्म। ड्यूटी के दौरान बयान का छिन्द्रान्वेषण करना, बात का बतंगड़ बनाना, हमारी जिम्मेदारी में शुमार है। यह करना ही पड़ता है। पक्ष-विपक्ष के नेताओं को फुटेज देने के मामले में हम पूरे फ़राख़दिल हैं। इसके दो फ़ायदे हैं- पहला तो यही कि ख़बरों के कबाड़ख़ाने में घुसने और हाथ-दिमाग़ को गंदा करने से मुक्ति मिल जाती है, दूसरे एंकर को एक्सपोज़र मिलता है और टॉक के लिए आए नेताओं से संपादकों के संबंध प्रगाढ़ होते हैं, जो कालांतर में चैनल और उसको चलाने वालों के हित में कार-आमद साबित होते हैं।

शुक्रवार, 12 जुलाई 2013

आपदा बनाम मीडिया अर्थात गिद्धोत्सव परंपरा

सदाचार का पाठ हमेशा ख़ौफ़ की ज़िल्द में लिपटा रहता है। ऐसा ही रिवाज़ है। यह पाठ हमेशा बच्चे, बुज़ुर्ग और कमज़ोर तबके को ही पढ़ाया जाता है। ख़ासतौर से ख़ुदा का ख़ौफ़ और सामाजिक मर्यादा। प्रभुवर्ग का गुनगान भी रिवाज़ ही है। रिवाज़ यानी परंपरा। जिस कर्म या बात की दुहाई परंपरा के नाम पर दी जाती है, वह सनातन नहीं होती। कभी वह भी पहली बार ही किसी के द्वारा किसी पर आरोपित की गई होती है। बाद में बार-बार दुहराव होता है। लोग उसे सही और ज़रूरी मान बैठते हैं। फिर उसे परंपरा या रिवाज़ का नाम दे दिया जाता है। ऐसे बहुत से रिवाज़ थे, जो अब नहीं हैं। बहुत से रिवाज़ ऐसे हैं, जिन्हें आज भी हमने बंदरिया की तरह छाती से चिपका रखा है। इस बात से आप इनकार नहीं कर सकते कि ज़्यादातर रिवाज़ पारिवारिक अथवा सामाजिक गौरव की आड़ में ही जीवनी-शक्ति पाते रहे हैं, जबकि वास्तव में वे मानव-जाति के लिए अभिशाप थे। जौहर, सतीप्रथा, पर्दा-प्रथा, बाल-विवाह जैसे रिवाज़ इसी श्रेणी में जगह पाते हैं। कई बार प्रभुवर्ग अपने कुकृत्यों को छुपाने के लिए परंपरा की आड़ लेता है। कई बार किसी को दोषी साबित करने के लिए भी परंपरा की आड़ ली जाती है। सीता का दोबारा वन-गमन और उसी के आलोक में स्त्रियों की यौन-शुचिता का मसला परंपरा बन जाती है। कहने की ज़रूरत नहीं कि अपने शुरुआती दौर में बंदिशें, या तो ख़ौफ़ या फिर मर्यादा की आड़ लेकर ही आती हैं। बाद में यह रूढ़ हो जाती हैं और सनातन सत्य के रूप में स्थापित भी।

रविवार, 9 जून 2013

पीतमय जग जानी

नया उत्साह, नई तरंगों की पीठ पर सवार हो और अचानक कोई रोड़ा राह में झटका दे, तो ऐसी स्थिति में क्या होगा? बात ज़्यादा गंभीर नहीं है। वैसे भी जिस मुल्क में बड़ी-से-बड़ी समस्या भी गंभीरता की श्रेणी में जगह नहीं बना पाती, वहां एक बात की क्या औक़ात! अगर मैं ग़लत कह रहा हूँ, तो आप टोक सकते हैं। लेकिन मेरी एक छोटी सी शर्त है। कम-से-कम एक उदाहरण के साथ आपको पक्ष रखना होगा। वैसे विरोध का चलन भी पुराना है। सत्ता-पक्ष के साथ विपक्ष की संवैधानिक अनिवार्यता का सीधा संबंध इसी से है। हमने ‘निंदा’, ‘भर्त्सना’, ‘नैतिकता’, ‘समर्थन’, ‘अविश्वास’, ‘शपथ’, ‘त्याग’, ‘खंडन’, ‘विरोध’, ‘संघर्ष’, ‘आंदोलन’, ‘जनहित’ और ‘प्रस्ताव’ जैसे शब्द तो इसी व्यवस्था से सीखे हैं। (ऐसा कहते वक़्त, हमें आशंका है कि सांस्कृतिक पुनरुत्थान के पोषक तत्व, विरोध में उठ खड़े होंगे और इन शब्दों के सांस्कृतिक मर्म-धर्म बांचने को उद्धत हो उठेंगे। लेकिन अभिव्यक्ति के ख़तरे तो उठाने ही पड़ते हैं। भले ही वह बंध्या हो और प्रभाव के स्तर पर बिल्कुल बेकार। ख़ैर हम सफ़ाई पेश करना चाहते हैं कि इन शब्दों का उद्भव चाहे जिस किसी काल-खंड अथवा सांस्कृतिक परिवेश में हुआ हो, लेकिन हम तक इसकी पहुंच लोकतंत्र के वीर सिपाहियों की मदद से ही बनी है। इसलिए क्रेडिट हम इसी व्यवस्था को देंगे।)

रविवार, 26 मई 2013

अप्रत्याशित नहीं थी घटना


शनिवार को छत्तीसगढ़ में जो कुछ हुआ। वह अप्रत्याशित नहीं था। आपको यह अटपटा लग सकता है। आपकी दृष्टि में मेरी मानसिक स्थिति भी संदिग्ध हो सकती है। वैसे भी हम जिस लोकतांत्रिक दौर से गुज़र रहे हैं, उसमें कुछ भी असंदिग्ध नहीं है। यह आम धारणा है कि प्रभु-वर्ग या उससे जुड़े लोगों के विरुद्ध जो कुछ भी निगेटिव होता है, वह अप्रत्याशित ही होता है। प्रत्याशित घटनाएँ तो आमलोगों से जुड़ी होती हैं। दलित-आदिवासी और कमज़ोर तबके के लोगों का शोषण-दमन-उत्पीड़न प्रत्याशित होता है। यही समाज और व्यवस्था-सम्मत धारणा है। हत्या, लूट या बलात्कार हो या आंदोलन ये तभी बड़े होते हैं, जब बड़े लोगों के साथ हों या कि वे इनसे जुड़े हों। अब से पहले तक नक्सलियों ने सुरक्षा-बलों को ही अपना निशाना बनाया था। सैंकड़ों जवान मारे गए होंगे। लेकिन राजनेताओं के चेहरे पर ऐसी हवाइयाँ पहले कभी उड़ती नहीं देखी। यह देश के नक्सली इतिहास की सबसे बड़ी घटना है। ऐसा नहीं कि हम दुखी नहीं हैं। हमारे लिए तो हर-एक ज़िन्दगी अहम है, चाहे वह किसी कर्मा की हो या पटेल की या कि किसी ग़रीब आदिवासी की।

शनिवार, 18 मई 2013

मर्ज कुछ, इलाज कुछ

छुटपन की एक घटना याद आती है। गाँव की एक लड़की, गाँव के ही युवक के साथ पकड़ी गई। मामला प्रेम-प्रसंग का था। बड़े-बुज़ुर्गों की सदारत में पंचायत बैठी। दोनों पंचायत में पेश हुए। पंचों को बताया कि वे एक-दूसरे से प्यार करते हैं और शादी करना चाहते हैं लेकिन पंचों ने प्रस्ताव को नकार दिया। मामला नैतिक-अनैतिक के बिन्दु तक ही सीमित कर दिया गया। सवाल-जवाब से ज़्यादा दोनों की लानत-मलामत हुई और सज़ा मुक़र्रर कर दी गई। दो-चार शोहदे टाईप के जवान मुस्तैदी से उठे और बाँस की कच्ची कमाचियाँ काट लाए। इस तरह प्रेमी-युगल की पीठ पर भरी पंचायत में सदाचार की लकीरें उकेरी गईं। दोनों को माँ-बाप ही नहीं बल्कि सामाजिक संस्कार की अवहेलना का भी दोषी ठहराया गया। सज़ा और सुनवाई का केन्द्र-बिन्दु प्रेम नहीं था।

गुरुवार, 9 मई 2013

हलाल का बदला झटका

सआदत हसन मंटो की एक छोटी सी कहानी है- हलाल और झटका। यह कहानी आज बेतरह याद आ रही है। कहानी में दो किरदार हैं। पहला कहता है- मैंने उसकी शहरग पर छुरी रखी, हौले-हौले फेरी और उसको हलाल कर दिया। दूसरा चौंकता है- यह तुमने क्या किया?” सवाल के जवाब में पहले का सवाल आता है- क्यों?” दूसरा अपने सवाल को थोड़ी तफ्सील देता है- इसको हलाल क्यों किया?” पहला रस लेते हुए कहता है- मज़ा आता है, इस तरह... दूसरा खीझ कर कहता है- मज़ा आता है के बच्चे... तुझे झटका करना चाहिए था... इस तरह। और हलाल करने वाले की गर्दन का झटका हो गया। हो सकता है कि मंटो अपने दौर का सच लिख रहे हों! लेकिन यह हमारे दौर का भी सच है।

शुक्रवार, 26 अप्रैल 2013

विरासत की बेदखली, --विश्वनाथ त्रिपाठी



यह चाहे जितना भी खेदजनक हो, लेकिन यह कहने का समय आ गया है कि कम से कम कथा साहित्य में, हिन्दी में लिखने वाले मुसलमान लेखकों को वह स्थान नहीं मिला जिसके वह हक़दार थे या हैं। मैं जान-बूझकर पुरस्कार या सम्मान की बात नहीं करना चाहता, क्योंकि यह कोई मानदंड नहीं है। लेकिन उपेक्षा हुई है। इसके क्या कारण रहे हैं, उसकी पड़ताल या छानबीन का यह अवसर नहीं है। लेकिन उपन्यास पर बात करते समय मैं इस तथ्य की तरफ इशारा जरूरी समझता हूँ। बहुत दिनों से यह सवाल मेरे मन में बना हुआ है और इसका कोई स्पष्ट कारण मुझे समझ में नहीं आता। सामान्यतः हिन्दी साहित्य का जो माहौल है, वह बिल्कुल साम्प्रदायिक नहीं है, बल्कि यह सम्प्रदाय विरोधी है। फिर भी ऐसा क्यों होता है या हो रहा है? यह मैं नहीं जानता।

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