गुरुवार, 30 जून 2016

पुतुल : जीवन का प्रतिरूप

कठपुतली! एक व्यंजनामूलक शब्द है— सामान्य-जीवन में भी, कला-साहित्य में भी। तुलसी-रचित रामचरितमानस के किष्किन्धाकाण्ड में भगवान शिव अपनी पत्नी पार्वती से कहते हैं, उमा दारु जोषित की नाई। सबहि नचावत रामु गोसाई।। फ़िल्म 'आनंद' के लिए गुलज़ार इसी भाव को अपने अंदाज़ में संवादबद्ध करते हैं। आनंद अपने मित्र डॉ. भास्कर से कहता है— हम सब रंगमंच की कठपुतलियाँ हैं, जिनकी डोर उस ऊपर वाले के हाथों में है। हालांकि गुलज़ार के इस संवाद से अधिक परिपक्व कथन जॉर्ज बकनर का है, उनके मुताबिक हमलोग महज कठपुतलियाँ हैं, जिनकी डोर अज्ञात शक्तियों के हाथों में है। सहज शब्दों में कहें तो हम उन शक्तियों द्वारा नियंत्रित और संचालित हैं, जो हमेशा नेपथ्य में रहती हैं। यही बात सातवें अखिल भारतीय पुतुल महोत्सव के उद्घाटन अवसर पर बिना किसी अगर-मगर के कपिला वात्सायन ने कही— ऐसे या वैसे, चाहे जैसे, हम सब पपेट्स हैं। फिर भी यह प्रश्न तो मन को व्यथित करता ही है कि क्या सचमुच हाड़-मांस का हमारा यह शरीर भी काठ सरीखा निर्जीव है? और यह भी कि क्या हम जो कुछ भी करते-सोचते हैं, वह सब महज हमारा भ्रम है? कि हमारी प्रज्ञा, हमारा विवेक, हमारी दृष्टि और दृष्टिकोण, हमारी भावनाएँ—इनका कोई महत्व नहीं है? कि यह सब कल्पना-मात्र हैं? मानव-अस्तित्व से जुड़े इन भारी-भरकम प्रश्नों को यदि हल्के में ही लें और इनकी सांकेतिकता को भी सामान्यीकृत कर लें, फिर भी यह बात कम परेशान करने वाली तो ख़ैर नहीं ही है कि हाड़-मांस से निर्मित, प्रकृति का सर्वश्रेष्ठ प्राणी भी अन्ततः कठपुतली सरीखा है, जिसकी एक-एक गतिविधि पर किसी अज्ञात कुल-शील शक्ति का नियंत्रण है! इस लिहाज़ से देखें तो कठपुतलियाँ, मनुष्य से अधिक स्वभाविक जान पड़ती हैं; विशेष रूप से तब, जब यह साहित्य और सामान्य जीवन में प्रयुक्त होने वाले मुहावरे से इतर, रंगमंच पर अवतरित होती हैं।

रविवार, 24 अप्रैल 2016

अक्कड़-बक्कड़ः कथ्य और स्वरूप में विरल उपन्यास

अक्कड़-बक्कड़ है क्या? औपन्यासिक कृति या कोई बाल-क्रीड़ा? रपटन-भरी भाषा में फिसलती-गिरती ज़िन्दगी की शल्यक्रिया या किसी बेशर्म गप्पी का वायवीय गल्प? यह क्या सचमुच वैसा ही है जैसा कि अस्सी-नब्बे पूरे सौ?’ शैली तो कुछ ऐसी ही है जैसे कोई बच्चा शब्दों से मगन-भाव खेल रहा हो! लय और लोच के सहारे भावात्मक रूप से हल्के हिंडोले पर डोल रहा हो! लेकिन ऐसा है नहीं। पाठ के समय धैर्य और सावधानी ज़रूरी है क्योंकि असावधानी की स्थिति में रपटने, वाग्जाल में उलझने, शब्दों के कीचड़ में लिथड़ने और लक्ष्यार्थ तक पहुँचने में बिल्कुल जलालपुरिए की तरह अंततः विफल रहने की पूरी गुंजाइश है। सावधानी और गंभीरता इसलिए भी कि यह व्यंग्य उपन्यास है और बकौल श्रीलाल शुक्ल व्यंग्य लेखन का सम्बंध सामाजिक स्थिति की मूल्यगत आलोचना से है। तो उपन्यास पढ़ते वक़्त इस सूत्र-वाक्य को दिमाग़ में रखना ज़रूरी है, तभी हम वास्तविक कथ्य और वातावरण तक पहुँच पाएँगे क्योंकि उपन्यास की भाषा में भी रपटन है। यह आपको नंगलों की तरह भटका भी सकती है और आप किसी क्षेत्र-विशेष की मरीचिका में उलझ सकते हैं, कथ्य और वातावरण के भेदाभेद को समझने से चूक सकते हैं।

रविवार, 27 दिसंबर 2015

अधूरे जीवन का पूरा कोलाज

उपन्यास का नाम है- चिरकुट और इत्तेफ़ाक़ देखिए कि शीर्षक को छोड़, उपन्यास में कहीं और ये शब्द इस्तेमाल नहीं किया गया। लिहाजा मन में उठा यह सवाल वाजिब था कि आख़िर क्यों हितेन्द्र पटेल ने अपने उपन्यास का नाम चिरकुट रखा? क्या इसलिए कि वो जिस सांस्कृतिक समाज का अंग रहे हैं, उसमें यह शब्द आमफ़हम है? या कि कथा-नायक अथवा कथा में विन्यस्त घटनाएँ, प्रवृत्तियाँ और जीवन-दशाएँ ऐसी हैं, जो अपनी समग्रता में चिरकुट शब्द के अर्थ एवं अभिप्राय को भाव-गम्य बनाती हैं? जब ये सवाल मेरे मन को मथने लगा तो हमने शब्दकोश की मदद ली। पता चला कि चिरकुट शब्द दरअसल दो शब्दों के बड़े टुकड़ों का योग है। अर्थात चिरना+कुटना=चिरकुट(यहाँ नानियत है)। शाब्दिक अर्थों में फटा-पुराना कपड़ा, चिथड़ा, कपड़े का छोटा सा टुकड़ा। लेकिन मन संतुष्ट नहीं हुआ क्योंकि साहित्य महज शब्द और उसके रूढ़ अर्थों से निर्देशित नहीं होता, बल्कि इसका नियंता, भाव होता है। चिरकुट शब्द से जो भाव ध्वनित होता है, वह उसके शब्दकोशीय अर्थ से साम्य नहीं रखता। ऐसे में चिरकुट शब्द का वास्तविक अर्थ जानने के लिए लोक में जाना होगा और वहाँ से चिरकुटशब्द का वाजिब अर्थ ग्रहण करना होगा। गाँव-मोहल्ले में वैसा व्यक्ति चिरकुट कहलाता है, जो छोटी-छोटी बेवकूफ़ियाँ, चालाकियाँ, होशियारियाँ या साजिशें करता है और ऐसे कृत्यों से उसका कोई ख़ास भला तो होता नहीं, उल्टे वह लोगों की नज़र में आ जाता है। या फिर वैसा व्यक्ति चिरकुट कहलाता है, जो समाज में गरिष्ठ और निम्न अथवा हेय समझे जाने वाले क्रिया-व्यापारों में लिप्त रहता है। कभी-कभार हम व्यक्ति से इतर किसी काम को भी चिरकुट शब्द से अभिहित करते हैं। मसलन- अरे यार! एक चिरकुट से काम के लिए तुम इतने परेशान क्यों हो? ये तो बस यूँ चुटकी बजाते ही हो जाएगा। ख़ैर, इस माथापच्ची के बाद चिरकुट को लेकर मेरी सामान्य जिज्ञासा तो संतुष्ट हो गई है, लेकिन अब भी मेरी कथित बौद्धिक-दृष्टि इस बात को लेकर पशोपेश में है और ज़िद ठाने बैठी है कि उपन्यासकार ने यहाँ चिरकुट शब्द का इस्तेमाल महज इसलिए नहीं किया है कि इसका अर्थ लोग सहज ही लगा लेंगे, बल्कि वह इसके माध्यम से कुछ और ही कहना चाहता है। तो क्या चिरकुट शब्द का निहितार्थ जीवन-जगत से जुड़ी वैसी छोटी-छोटी घटनाएँ और व्यवहार-विचार सरणियाँ हैं, जिनके बग़ैर जीवन संभव नहीं है, फिर भी उनका लेखा रखने की ज़रूरत इतिहास महसूस नहीं करता? मेरे संशय को तब और बल मिलता है, जब रामचन्द्र शुक्ल लिखते हैं कि संसार में मनुष्य-जीवन संबंधी बहुत सी ऐसी-ऐसी बातें नित्य होती रहती हैं, जिनका इतिहास लेखा नहीं रख सकता, पर जो बड़े महत्व की होती हैं। व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन, इन्हीं छोटी-छोटी घटनाओं का जोड़ है। पर बड़े से बड़े इतिहास और बड़े से बड़े जीवन-चरित्र में भी इन घटनाओं का समावेश नहीं हो सकता।(रामचन्द्र शुक्ल, चिन्तामणि-3, प्र.सं. 1983, पृ.सं.102) अपने इसी निबंध(उपन्यास) में वो फिर लिखते हैं कि मानव जीवन के अनेक रूपों का परिचय कराना उपन्यास का काम है। यह उन सूक्ष्म से सूक्ष्म घटनाओं को प्रत्यक्ष करने का यत्न करता है, जिनसे मनुष्य का जीवन बनता है और जो इतिहास आदि की पहुँच के बाहर हैं।(वही, पृ.सं.102) यहीं पर यह राज़ भी फ़ाश होता है कि आख़िर हितेन्द्र पटेल जैसा इतिहासकार अपनी अभिव्यक्ति के लिए साहित्य की सबसे महत्वपूर्ण विधा उपन्यासको क्यों चुनता है? और यही मेरे उस सवाल का भी जवाब है कि आख़िर उपन्यास का शीर्षक चिरकुट क्यों रखा गया?

रविवार, 29 नवंबर 2015

अमरकांतः साधारण भाषा में असाधारण का संधान

20वीं सदी का छठा दशक हिन्दी साहित्य की दृष्टि से एक बड़ी उपलब्धि लेकर आया था। नई कहानी ने न सिर्फ ज़िन्दगी को देखने का नज़रिया बदला, बल्कि कहानी की बनी-बनाई पुरानी लीक भी तोड़ दी। हालांकि तोड़ना की जगह नई दिशा शब्द का इस्तेमाल अधिक सटीक होता। ख़ैर, साठ का दशक बदलावों का दशक था। तेज़ी से उभरता निम्न-मध्यवर्ग, ग्रामीण परिवेश से मुक्ति के लिए छटपटा रहा था। युवाओं के सपने अँगड़ाइयाँ ले रहे थे। शहर का आकर्षण उन्हें अपनी तरफ खींच रहा था। बड़ी तादाद में वे शहरों का रुख़ कर रहे थे। राजनीतिक वातावरण लगातार दूषित होता जा रहा था। सामाजिकता अपना महत्व खोती जा रही थी और नैतिकता की पकड़, व्यक्ति पर कमज़ोर पड़ती जा रही थी। कुंठा और संत्रास के ब्रह्मफांस में उलझी युवा-पीढ़ी मोहभंग की सहज शिकार बन रही थी। कुपथगामी हो रही थी। सामंतवाद का बूढ़ा-प्रेत अब भी लोकतांत्रिक देश की छाती पर तना बैठा था। उसके पैने नाख़ून और नुकीले दाँतों से मानवीयता का हृदय छलनी हो रहा था। गाँधी की टोपीपहन-पहन कर जन-प्रतिनिधि बनने वाले राजनेता चुनाव के बाद जनता को या तो टोपियाँ पहना रहे थे, या उनकी टोपियाँ उछाल रहे थे। अर्थात राजनीति, समाज और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में जब बदलाव(नैतिक अथवा अनैतिक) स्पष्ट नज़र आ रहा था तो कहानी भला कैसे अछूती रहती? शहरी मध्यवर्गीय परिवार महत्वाकांक्षाओं के अतिशय बोझ के कारण चरमरा रहा था। इस टूटन, घुटन और बिखराव की कथा मोहन राकेश, राजेन्द्र यादव और कमलेश्वर लिख रहे थे। प्रगतिशील चेतना के बढ़ते दबावों के बावजूद पुरुष-सत्तात्मक समाज का सामंतवादी प्रेत हार मानने को तैयार नहीं था और निम्न-मध्यवर्ग झूला-नट की तरह दोनों को साधने में अपनी ऊर्जा का बड़ा हिस्सा ख़र्च करने को अभिशप्त था। भारत का साधारण मनुष्य जवाहरलाल नेहरू नहीं था। लिहाजा पंचशील के सिद्धांत जैसे महान उद्देश्य अथवा दर्शन में भी उसकी कोई दिलचस्पी नहीं थी। उसकी तो बेहद छोटी-छोटी समस्याएँ और आकांक्षाएँ थीं। रहने के लिए घर। खाने के लिए अन्न। पहनने के लिए कपड़े। इलाज के लिए अस्पताल। बेरोजगार बेटे के लिए नौकरी और जवान बेटी के लिए योग्य-वर। उसे धर्म अथवा जाति के नाम पर होने वाले अत्याचारों-अनाचारों से मुक्ति और शांति की ज़रूरत थी। व्यवस्था का छलावा और आदर्शों का भुलावा, समस्यापूर्ति के लिए काफ़ी नहीं थे। शिक्षित मध्यवर्ग और बुद्धिजीवियों का ढोंग और भावनात्मक स्तर पर शोषण और स्त्री की परम्परागत छवि को बनाए रखने की साजिश। गाँव और शहर के बीच सेतुबंध के रूप में तेज़ी से आकार ग्रहण करता यह क़स्बाई समाज और क्षेत्र, जटिल जीवन-अनुभूतियों और संबंधों के त्रिविमीय प्रदर्शन का असाधारण रंगमंच बना हुआ था। सभ्यता के इसी अंधेरे प्रेक्षागृह से अमरकांत जीवन का आँखों देखा हाल सुना रहे थे। शिक्षित मध्यवर्ग की मनोदशा, उसके सपने, उसके काइयाँपन और यथार्थ-जीवन की सहज सांकेतिक अभिव्यक्ति का दायित्व अमरकांत ने अपने मज़बूत कंधों पर ले रखा था।

रविवार, 16 अगस्त 2015

मीडिया मंडप में चिकित्सक से मुलाकात

हमारे एक मित्र हैं। पेशे से चिकित्सक हैं। एक दिन बातचीत हो रही थी। बातचीत के दौरान उन्होंने शिकायत की। उनकी शिकायत थी कि पत्रकार बेलगाम हो रहे हैं। मैंने उनका वाक्य सुधारा, 'पत्रकार नहीं मीडिया बेलगाम हो रहा है।' मित्र ने दलील दी, 'दोनों एक ही बात है। मीडिया अपने-आप में कोई ऐक्टिंग अथॉरिटी नहीं है।' मैंने विरोध किया, 'यह कोई तर्क नहीं है।' उसने उदाहरण पेश करते हुए कहा, 'मान लो कार से कोई दुर्घटना होती है तो इसका मतलब यह तो नहीं कि कार को दोषी ठहराया जाए! बल्कि किसी से भी पूछो तो वह यही कहेगा कि ड्राइवर की बदमाशी या लापरवाही के कारण हादसा हुआ। यानी दुर्घटना की स्थिति में कार नहीं ड्राइवर दोषी होता है। इस लिहाज़ से अगर मीडिया बेलगाम है तो साफ है कि मीडियाकर्मी बेलगाम हैं।' मैंने कहा, इसका मतलब आप की निगाह में मीडियाकर्मी ही मीडिया का निर्देशक है?’ मित्र ने मुस्कराते हुए कहा, 'बिल्कुल।' मैंने थोड़ा तुनकने वाले अंदाज़ में कहा, 'जी नहीं। मीडिया कोई कार नहीं है, और न ही कोई मीडियाकर्मी ही ड्राइवर है। यह आपकी निजी सोच है।' मित्र मानने को तैयार नहीं हुए। उन्होंने आरोप लगाया, 'तुम मीडिया में काम कर चुके हो इसलिए अपनी बिरादरी की असलियत छुपाने की कोशिश कर रहे हो।' मुझे बुरा लगा। मैंने विरोध जताया, 'ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। मैं मीडियाकर्मी रहा हूँ इसलिए जानता हूँ कि मीडिया और मीडियाकर्मी दोनों पर्यायवाची नहीं हैं। दोनों में बहुत फ़र्क़ है।' मित्र ने निर्णयात्मक स्वर में कहा, 'क्या तुम इस बात से भी इनकार करोगे कि मीडियाकर्मी ही मीडिया रूपी भवन के निर्माण के लिए ईंटें तैयार करते हैं?' मैंने दृढ़ता का प्रदर्शन किया, 'हाँ, बिल्कुल करूँगा क्योंकि मैं जानता हूँ कि मीडियाकर्मी मीडिया रूपी भवन के लिए ईंटों का निर्माण नहीं करते बल्कि वे स्वयं ईंट के रूप में इस्तेमाल किए जाते हैं।' मित्र ने ज़ोरदार ठहाका लगाया, 'अच्छा मज़ाक है।

मंगलवार, 21 जुलाई 2015

न वो समझे हैं, न समझेंगे मेरी बात

या रब, न वो समझे हैं, न समझेंगे मेरी बात। दे और दिल उनको, जो न दे मुझको ज़ुबाँ और।।अब या तो इस शेर को उसकी तात्पर्य-वृत्ति के अनुकूल समझा जाए और तीखे व्यंग्य की दाद दी जाए। या फिर यूँ हो कि ग़ालिब को इस हेकड़ी के लिए ख़ूब खरीखोटी सुनाई जाए- अमाँ मियाँ ये ग़ालिब भी न, बड़े ख़ब्ती क़िस्म के शायर थे। चले न जाने आँगन टेढ़ा। ख़ुद तो सीधी-सादी बात को बेवजह घुमा-फिरा कर कहते हैं और इल्ज़ाम पाठक पर मँढ़ते हैं। मतलब यह कि जो भी बात समझ में न आए, वो बकवास है। अच्छा है कि ग़ालिब हमारे ज़माने में न हुए, वरना अपना सिर पीट लेते। वैसे ग़ालिब के ज़माने में आज जैसे क़द्रदान भी न हुए, वरना वो दीवान क्या खाकर लिखते! ख़ैर, ग़ालिब का ये शेर हमेशा मेरी ज़ुबान पर कुछ इस अंदाज़ में होता है, जैसे बाँध तोड़ने पर उतारू कोई उफनती हुई नदी। मुश्किल ये कि बार-बार दुहराऊँ तो ख़ब्ती कहे जाने का डर है। और ज़ुबाँ पर काबू रखूँ तो बेचारा दिल रुआँसा हुआ जाता है। दिमाग़ है कि ढाढ़स बँधाने की बजाय दिल को कोंचने में ज़्यादा मज़ा पाता है। कभी-कभी खीझ इतनी ज़्यादा बढ़ जाती है कि सिर के बाल नोंचने लगता हूँ। कई बार तो तन्हाई में ख़ुद को तमाचा भी जड़ चुका हूँ। लेकिन कोई फ़ायदा नहीं! दिल-दिमाग भारतीय लोकतंत्र के दो दलों की तरह बर्ताव करने से परहेज़ बरतने को तैयार ही नहीं होते! दिल और दिमाग की नूरा-कुश्ती थमती ही नहीं! समझौते की तमाम कोशिशें नाकाम। समझ में नहीं आता, क्या करूँ? कई बार सोचा कि दिल-दिमाग के झमेले में जिस्म को ही तकलीफ़ क्यों हो? लेकिन जिस्म ऑथोरिटी  नहीं है। ये पॉवर तो दिमाग के ही पास है। दिल उसी पॉवर में हिस्सेदारी चाहता है। इसलिए बात-बेबात हस्तक्षेप करता रहता है। वैसे दिल की बात भी वाजिब है। जिस भाषा को लोग समझते ही नहीं, उस भाषा में कुछ कहने की ज़रूरत क्या है? लेकिन दिमाग़ है कि ज़िद ठाने बैठा है! कहता है- अभिव्यक्ति के अनुकूल भाषा तो होनी ही चाहिए। जो लोग अभिधा-व्यंजना में फ़र्क़ नहीं कर सकते, उनके लिए हलकान होने की ज़रूरत नहीं है।

शनिवार, 11 जुलाई 2015

मालिकों का बोझ ढोता मीडिया

दो विवाद और चार मीडिया समूह। पहला विवाद इंडियाज़ डॉटर डॉक्यूमेंट्री से जुड़ा है तो दूसरे का रिश्ता वक़्त ने किया क्या हसीं सितम धारावाहिक से है। प्रत्यक्ष रूप से जो प्रदर्शित किया गया, वह यह था कि विवाद का सम्बंध इंडियाज़ डॉटर और वक़्त ने किया क्या हसीं सितम के कंटेंट से है। दोनों ही मामलों में राष्ट्र की छवि और राष्ट्रवाद की आड़ लेकर प्रतिस्पर्धी मीडिया समूहों ने अपने-अपने क्षुद्र हितों का पोषण करने की नापाक़ कोशिश की। नतीज़ा क्या निकला? हम-आप से छुपा नहीं है। टाइम्स और एनडीटीवी समूह के बीच व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा की चरम परिणति केन्द्र सरकार के उस बचकाना फैसले में हुई, जिसकी वैश्विक स्तर पर आलोचना हुई। जिन्हें डॉक्यूमेंट्री में दिलचस्पी नहीं भी हो सकती थी, वैसे लोगों ने भी प्रतिबंध के कारण उत्सुकता के अतिरेक में देख लिया और एनडीटीवी ने तो डॉक्यूमेंट्री के लिए निश्चित प्रसारण समय पर अपना स्क्रीन भी ब्लैक रखा। टाइम्स नाउ पर अर्णब गोस्वामी ने दावा किया कि इंडियाज़ डॉटर वास्तव में भारत की छवि धूमिल करने वाला वृत्तचित्र है, जबकि देश के बहुसंख्यक बुद्धिजीवी तबके की सोच इसके विपरीत थी। जनसत्ता के संपादक ओम थानवी की प्रतिक्रिया थी कि जिस किसी ने बीबीसी की डॉक्युमेंट्री 'इंडियाज़ डॉटर' देख ली है, उसने बड़ी सहजता से इस बलात्कार-विरोधी फिल्म को भारत में प्रतिबंधित करवाने वाली मानसिकता और अभिव्यक्ति का गला घोंटकर दुनिया भर में भारत की नाक कटवाने वाली बुद्धि पर तरस ही खाया होगा। बहरहाल यह एपिसोड अब लगभग ख़त्म हो चुका है और अगर मैं ग़लत नहीं हूँ तो हममें से ज़्यादातर लोग इसको भूल भी चुके हैं!

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'साक्षी है इतिहास' तथा अन्य चार कविताएँ

1.      साक्षी है इतिहास ( मार्टिन नीमोलर को समर्पित) जानता हूँ आप जहमत नहीं उठाएँगे अपनी सलीब पर टँगे रहने का लुत्फ बेग़...