गुरुवार, 26 जुलाई 2018

तुम कब ठहरोगे?


मिर्ज़ा ग़ालिब का एक शेर याद आता है—हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है/तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तुगू क्या है! अंदाज़-ए-गुफ़्तुगू यानी बात करने का अंदाज़ अथवा सलीक़ा या तरीक़ा। जब कभी मैं मुस्लिम समाज और संस्कृति को केन्द्र में रखकर बनाई गई फ़िल्में देखता हूँ तो ज़्यादातर फ़िल्मों को देखने के बाद जो पहली प्रतिक्रिया मेरे ज़ेहन में उभरती है, वह यही है। बड़ी कोफ़्त होती है। एक अजीब क़िस्म की अज़ीयत से दो-चार होता हूँ। सतही तौर पर देखें तो ये फ़िल्में मुसलमानों के ज़ख़्मों पर मरहम रखने वाली लगती हैं, मुसलमानों की तरफ़दारी करने वाली नज़र आती हैं। लेकिन हक़ीक़त में ये बिल्कुल अलग रोल अदा करती हैं। कम-से-कम बॉलीवुड की बहुसंख्य फ़िल्मी कहानियों में जिन स्टिरियोटाइप्स को बुना जाता है, वे अपने वास्तविक स्वरूप में मुसलमान-विरोधी धारणाओं को पुष्ट करने वाले होते हैं। मैंने जान-बूझकर शब्द धर्म का इस्तेमाल नहीं किया है क्योंकि मैं जानता हूँ कि धर्म और समाज बिल्कुल जुदा चीज़ें हैं, जबकि बदक़िस्मती से हमारे मुल्क में मुस्लिम समाज और इस्लाम दोनों को पर्यायवाची मान लिया गया है। (हालांकि यही बात हिन्दू अथवा अन्य समाज और धर्म के लिए भी बहुत हद तक सही है।) आख़िर इतने मोटे भेद को इतना महीन किसने और क्यों बना दिया? क्या यह किसी साजिश का परिणाम है? या कि मुसलमानों ने ख़ुद ही अपने सिर ये लानत लपेट रखी है? या कि बहुसंख्यक समाज के एक ख़ास तबक़े ने यह खोटा सिक्का गढ़ा और फिर अपनी पहुँच और ताक़त के बल पर आम कर दिया? फिर सोचता हूँ कि हमारे यहाँ कुछ भी मुमकिन है। हमारा समाज तो ख़ुद ही टैबू का ज़ख़ीरा है। जहाँ क़ुदरत का सबसे ख़ूबसूरत रिश्ता भी टैबू की गिरफ़्त में हो, वहाँ दो फ़िरक़ों, दो जातियों, दो धर्मों के बीच अगर सम्वादहीनता, अजनबीपन या अश्यपृश्यता की भावना घर किए बैठी भी है तो इसमें अजूबा क्या है!

बुधवार, 21 जून 2017

पर्दे में रहने दो, पर्दा न उठाओ



सन 1968 की घटना है। आत्मा राम की एक फ़िल्म आई थी। फ़िल्म का नाम था—शिकार। शिकार के लेखक थे—अबरार। अबरार यानी संत पुरुष। शिकार में एक गीत था। गीतकार थे—हसरत (जयपुरी) और आवाज़ थी आशा (भोसले) की, जिन्हें आजकल आशा ताई कहने का फ़ैशन है। यह बहुत कुछ मैक्लूहान के ग्लोबल विलेज़ या भारतीय संस्कृति के स्वर्गीय राग वासुधैव कुटुम्बकम की तर्ज़ पर नया-नया तैयार हुआ उत्तर आत्मीय शब्दबंध है। गीत के बोल थे—पर्दे में रहने दो, पर्दा न उठाओ / पर्दा जो उठ गया तो भेद खुल जाएगा। फिल्म में मुख्य भूमिका धर्मेन्द्र की थी जो अजय बने थे और नायिका का नाम किरण था, जिसको पर्दे पर जीने की ज़िम्मेदारी पुनश्च आशा (पारेख) ने निभाई थी। मैं आगे बढ़ने से पहले आपको सचेत करना चाहता हूँ कि उपरोक्त विवरण को आप फिल्मी डिस्क्लेमर की तरह काल्पनिक मानने की भूल न करें, क्योंकि ऐसा करते ही आप वर्तमान में आ जाएँगे। न सिर्फ़ आ जाएँगे, बल्कि खो भी जाएँगे और खोने के बाद आप जो हैं, वह नहीं रह पाएँगे। ऐसे में इस मैं-मैं के ज़माने में मुमकिन है कि आप कबीर-रोग अर्थात तू-तू के शिकार हो जाएँ! अतः सावधान! वैसे यदि आप आत्मा, राम, अबरार (संत), धर्म, इन्द्र, अजय, हसरत, आशा, किरण, पर्दा, रहस्य आदि का स्मरण रखेंगे तो अच्छा ही रहेगा।

बुधवार, 10 मई 2017

कहाँ है किसानों का देश?

किसान अच्छा विषय है
लिखी जा सकती है कविता
जीता जा सकता है चुनाव
सदन में की जा सकती है बहस
बनाई जा सकती हैं नीतियाँ
बाँटे जा सकते हैं अनुदान
छीनी जा सकती है ज़मीन
उजाड़े जा सकते हैं गाँव
दी जा सकती है श्रम की मिसाल
बनाया जा सकता है मजदूर
बरसाई जा सकती हैं लाठियाँ

सोमवार, 24 अप्रैल 2017

नौटंकी थी, नौटंकी है (भाग 2)

नाच-नौटंकी शुद्ध मनोरंजन होता, उजरा-मुजरा वर्जित था, पर नौटंकी देखने तो औरतें भी सँपनी गाड़ी चढ़कर आतीं। औरतों के लिए परदे का इंतज़ाम होता। वैसे, आयोजकों को औरतों का आना अच्छा नहीं लगता। औरतें आएँगी तो बच्चे आएँगे, बच्चे रहेंगे तो चिल्ल-पों मची रहेगी, ख़्वाहमख़्वाह रंग में भंग पड़ता रहेगा। इधर जालिम सिंह के चरण मालिनी आँसुओं से पखार रही होगी, उधर कोई रोंवटिया बच्चा चिल्लाएगा, बाबूजी हो, मैया मरलक हो। हँसी का फव्वारा छूटेगा, सारी संवेदना बिला जाएगी। हुआ न रंग में भंग।(शुरुआत से पहले) कहने की ज़रूरत नहीं कि नौटंकी पहले खेल थी। स्त्री-पुरुष सभी देखते थे। स्त्री की उपस्थिति आयोजकों को अच्छी नहीं लगती थी, तो उसका कारण था रंग में भंग की आशंका। आजकल जो नौटंकी के नाम पर परोसा जा रहा है, क्या उसे पूर्व की भांति स्त्रियाँ देख सकती हैं? मैं नौटंकी के पुराने कलाकार अज़ीम मास्टर से मिलकर रावतपुर गाँव से लौटा हूँ और अभी बगाही बाकरगंज में रम्पत-रानीबाला के घर पर हूँ। नौटंकी दिखाने की ज़िद के कारण भरी महफ़िल में अपमान झेलने वाले अज़ीम मास्टर की डबडबाई आँखें मेरी पीठ पर सवार हैं और मेरे सामने बैठे रम्पत अपने क्लाइंट से बुकिंग की बात कर रहे हैं, तीन दिन के तीस हज़ार लगेंगे। ग्राहक कहता है, अरे घर का मामला है, हम बोल के आए हैं इस बार रम्पत का नौटंकी होगा। यार मामा नाक का सवाल है। थोड़ा कम कर लो। बात अटकती है। वह बंदा किसी को फोन करता है। रम्पत कम पर तैयार नहीं है। उनकी दलील है, छह लड़की होगी। ग्राहक कहता है, क्या यार मामा, कम-से-कम आठ लाओ। थोड़ी ज़िच के बाद साटा तय हो जाता है। मैं पूरे वार्तालाप का साक्षी हूँ। इसमें नौटंकी कहीं नहीं है। केन्द्र में है—लड़की और उसकी संख्या। वहाँ से खिन्न मन मैं जब बाहर निकलता हूँ तो अपने साथी से पूछता हूँ—यह कौन सी नौटंकी है?” वह कहता है, सरकारी कार्यक्रमों और कुछ संगठनों को छोड़कर बाक़ी जहाँ कहीं भी नौटंकी होती है, वह यही होती है। लेकिन फिर पता चलता है कि हम-आप कला के नाम पर चाहे जो कह-कर लें, लेकिन रम्पत नहीं हो तो बहुत से घरों में चूल्हा जलना मुश्किल हो जाएगा। साल-छह महीने में किसी कलाकार को एक रोल और उसके एवज़ में हज़ार-पन्द्रह सौ रूपये दे देने से क्या ज़िन्दगी चल जाएगी? अगर नहीं तो फिर शुद्धता के चोले को अंततः क़फ़न में ही तब्दील होना है। ठीक है, आतमजीत सिंह की लैला-मंजनूं के चश्मे से देखें तो रम्पत की लैला-मजनूं बिल्कुल फूहड़ हैं, वे बहरे-तबील और चौबोले की जगह पर सस्ते फिल्मी गाने ज़्यादा गाते हैं। लैला और कैश के बीच मदरसे में जो पाक मुहब्बत परवान चढ़ सकती थी, उसको जोकर के द्विअर्थी संवाद दूषित बनाते हैं। लेकिन साहब पेट तो इसी से चलता है। नौटंकी के परम्परागत कलाकारों के जीवन-बसर की कोई और राह न तो कला-संस्थानों/विभागों ने निकाली है और न ही कला में आ रही गिरावट और अश्लीलता पर ज़ार-ज़ार रोने वाले कला-प्रेमियों ने। बल्कि नौटंकी के स्वर्णिम अतीत को वर्तमान करने की दिशा में क्रियाशील लोगों के प्रति भी इनके मन में कुढ़न और आक्रोश है। एक कलाकार ने राहत इंदौरी का शेर पढ़ा, कल तक दर दर फिरने वाले, घर के अन्दर बैठे हैं / और बेचारे घर के मालिक, दरवाज़े पर बैठे हैं। हालांकि इनसे यह पूछा जा सकता है कि जब आप घर में थे तो घर की मर्यादा का ध्यान क्यों नहीं रखा? अपनी कला को, इस विधा को, इसके स्वर्णिम शिखर से च्युत क्यों किया अथवा होने दिया? अगर उसी वक़्त तमाम कलाकारों ने श्याम सुंदर का विरोध किया होता तो वेरायटी की नींव ही नहीं पड़ती। ख़ैर, मकान तो जैसा कल था, आज भी है, बस मक़ीन बदल रहे हैं। नौटंकी के परम्परागत कलाकारों के बहुत से तम्बू उखड़ गए हैं, कुछ हैं जो अब भी अपना अस्तित्व बचाए हुए हैं। नये-पुराने अभिनेताओं, नई-पुरानी कहानियों और साज-सज्जा के साथ नौटंकी अब भी जारी है।

नौटंकी थी, नौटंकी है (भाग 1)

कहाँ थे आप ज़माने के बाद आए हैं
मेरे शबाब के जाने के बाद आए हैं

वो चेहरे जो झुर्रियों की गिरफ़्त में थे, वो आँखें जो खोई-खोई सी नज़र आती थीं, वो जिस्म जो हड्डियों के गठ्ठर बन गए थे, और सबके-सब सुरंग जैसी अँधेरी तंग गलियों के बोसीदा क़फ़सनुमा कमरों के गुमनाम मकीन थे। कानपुर हो, मथुरा हो, वृंदावन हो, कासगंज हो, हाथरस हो, आगरा हो, टुंडला हो, खुर्जा हो, या कोई और मुलुक—परम्परागत नौटंकी के सितारों की दुनिया जुदा-जुदा नहीं थी। सब अपने-अपने अंतिम अरण्य में बेदिली से ज़िन्दगी का सलीब ढोने को मजबूर। उम्मीद की चिड़िया कभी-कभी अपने पर फड़फड़ाती थी तो आँखों के कोर आँसू की बूँदों से लबलबा जाते थे, झुर्रियों की परत जोश के ज़ेरे-असर धूमिल पड़ने लगती थी, अतीत अचानक वर्तमान हो उठता था, हड्डियों का ढाँचा गठीले जवान की मानिंद तन जाता था और आवाज़ में जवानी की खनक लौट आती थी। नीम अँधेरे कमरों के इन बाशिंदों की आँखें बिल्लौरी हो उठती थीं और आसमानी सितारों की मानिंद चमकने लगती थीं। कमरा मंच में तब्दील हो जाता था। दमा का मरीज़ आबिद मास्टर, जिसकी ज़िन्दगी महज चंद दिनों की मेहमान थी, अपनी टूटी चारपाई को जहाँगीर का तख़्त समझ बैठता और हुक्म फ़रमाने लगता—मंगल सिंह, तुम्हारा फ़ेल क़ानून की निगाह में तुम्हें मुजरिम क़रार देता है, लिहाजा इसके मुआवज़े में हम, मिनजानिब ये फ़ैसला सादिर फ़रमाते हैं कि ख़ून का बदला ख़ून ! तुम्हें फांसी देकर मक़्तूलाओं के ख़ून की क़ीमत चुका ली जाए, मगर चूँकि आमदे-माहे-रमज़ानुल-मुबारक है, इसलिए इसके एहतराम में तमाम फाँसी के फैसले मुल्तवी किए जाते हैं और बाद एख़्तेताम माहे-सय्याम तामील-ए-हुक्म हो। जिस्म से लगभग लाग़र और नाक के बदले मुँह से जबरन साँसें खींचते, बड़ी-बड़ी लेकिन बिल्कुल पीली पड़ चुकी आँखों वाले तकरीबन नब्बे साल के इस बुज़ुर्ग को जब मैं ब-आवाज़े बुलंद जहाँगीर का इंसाफ के संवाद अदा करते देखता-सुनता हूँ तो उनका बताया इतिहास मानो मेरी आँखों के सामने वर्तमान हो उठता है। मुझे लगता है, मैं किसी गाँव में बाँस-बल्ली और चौकी की मदद से बनाए गए मचान पर तख़्तनशीं जहाँगीर को देख रहा हूँ। मचान जैसा यह मंच चारों तरफ़ से खुला है। पूरा गाँव मंच के इर्द-गिर्द जमा है। लालटेन और मशालें रौशन हैं और इस रौशनी में जहाँगीर बने आबिद मास्टर का चेहरा दमक रहा है। लोगों ने मान लिया है कि मंच पर जो मामूली-सी कुर्सी पड़ी है, वह मामूली कुर्सी नहीं है बल्कि जहाँगीर का तख़्त है और वे लोग जहाँ बैठे हैं, वह गाँव का कोई ऊसर मैदान नहीं, बल्कि बादशाह का दीवान-ए-आम है, जहाँ पर वह अपने ही एक सिपाही के ख़िलाफ़ क़त्ल का मुकदमा सुन रहे हैं और फैसला सुना रहे हैं।

रविवार, 20 नवंबर 2016

'साक्षी है इतिहास' तथा अन्य चार कविताएँ

1.     साक्षी है इतिहास
(मार्टिन नीमोलर को समर्पित)

जानता हूँ आप जहमत नहीं उठाएँगे
अपनी सलीब पर टँगे रहने का लुत्फ
बेग़ैरत और बेतकल्लुफ़ होकर उठाएँगे
गर उठाइगिरों की भाषा में कहूँ तो
आपके लिए आँखें बंद कर
तत्वज्ञाता बनने का मज़ा ही कुछ और है!

जगत के धृतराष्ट्रों, मैं संजय नहीं हूँ
मैं कोई रेडियो का जौकी भी नहीं हूँ
आपके दो कौड़ी के क्रिकेट का कमेंटेटर भी नहीं
इसलिए कुछ भी नहीं सुनाऊँगा

सोमवार, 10 अक्टूबर 2016

लोकहृदय में बसते हैं राम

रामकथा बाँचने वाली शैली में कहूँ तो भारत भूमि के कण-कण में राम हैं, भारतीय मानस के क्षण-क्षण में राम हैं। भारत-भूमि पर वास करने वाले जन-जन में राम हैं। राम हैं तो भारत है। राम हैं तो हिन्दुस्तान है। राम मनुष्य-मात्र के कल्याण का निमित्त हैं। राम हैं तो मंगल है। राम करुणा-पुरुष हैं। राम मर्यादा-पुरुष हैं। दुष्ट-दलन करने वाले राम हैं। दुख-हरण करने वाले राम हैं। राम हैं तो वाल्मीकि हैं। राम हैं तो कबीर हैं। राम हैं तो तुलसीदास हैं। ऐसे लोगों की संख्या भी कम नहीं जो यह मानते हैं कि वाल्मीकि हैं तो राम हैं। कबीर हैं तो राम हैं। तुलसीदास हैं तो राम हैं। धर्म और साहित्य इसी बिन्दु पर अलग होते हैं। पहला पक्ष दूसरे के विरुद्ध साक्ष्य लेकर उपस्थित होगा और यह दावा पेश करेगा कि राम तो आदि और अनंत हैं। राम का ज़िक्र तो वेदों में है, पुराणों में है, उपनिषदों और अरण्यक में है। वाल्मीकि नहीं होते तो भी राम होते। कबीर नहीं होते तो भी राम होते। तुलसीदास नहीं होते तो भी राम होते। राम तो भगवान हैं। घट-घट व्यापी हैं, अविरल और अविनाशी हैं। आस्था तो यही कहती है, किन्तु विवेक विरोध करता है।

गुरुवार, 30 जून 2016

पुतुल : जीवन का प्रतिरूप

कठपुतली! एक व्यंजनामूलक शब्द है— सामान्य-जीवन में भी, कला-साहित्य में भी। तुलसी-रचित रामचरितमानस के किष्किन्धाकाण्ड में भगवान शिव अपनी पत्नी पार्वती से कहते हैं, उमा दारु जोषित की नाई। सबहि नचावत रामु गोसाई।। फ़िल्म 'आनंद' के लिए गुलज़ार इसी भाव को अपने अंदाज़ में संवादबद्ध करते हैं। आनंद अपने मित्र डॉ. भास्कर से कहता है— हम सब रंगमंच की कठपुतलियाँ हैं, जिनकी डोर उस ऊपर वाले के हाथों में है। हालांकि गुलज़ार के इस संवाद से अधिक परिपक्व कथन जॉर्ज बकनर का है, उनके मुताबिक हमलोग महज कठपुतलियाँ हैं, जिनकी डोर अज्ञात शक्तियों के हाथों में है। सहज शब्दों में कहें तो हम उन शक्तियों द्वारा नियंत्रित और संचालित हैं, जो हमेशा नेपथ्य में रहती हैं। यही बात सातवें अखिल भारतीय पुतुल महोत्सव के उद्घाटन अवसर पर बिना किसी अगर-मगर के कपिला वात्सायन ने कही— ऐसे या वैसे, चाहे जैसे, हम सब पपेट्स हैं। फिर भी यह प्रश्न तो मन को व्यथित करता ही है कि क्या सचमुच हाड़-मांस का हमारा यह शरीर भी काठ सरीखा निर्जीव है? और यह भी कि क्या हम जो कुछ भी करते-सोचते हैं, वह सब महज हमारा भ्रम है? कि हमारी प्रज्ञा, हमारा विवेक, हमारी दृष्टि और दृष्टिकोण, हमारी भावनाएँ—इनका कोई महत्व नहीं है? कि यह सब कल्पना-मात्र हैं? मानव-अस्तित्व से जुड़े इन भारी-भरकम प्रश्नों को यदि हल्के में ही लें और इनकी सांकेतिकता को भी सामान्यीकृत कर लें, फिर भी यह बात कम परेशान करने वाली तो ख़ैर नहीं ही है कि हाड़-मांस से निर्मित, प्रकृति का सर्वश्रेष्ठ प्राणी भी अन्ततः कठपुतली सरीखा है, जिसकी एक-एक गतिविधि पर किसी अज्ञात कुल-शील शक्ति का नियंत्रण है! इस लिहाज़ से देखें तो कठपुतलियाँ, मनुष्य से अधिक स्वभाविक जान पड़ती हैं; विशेष रूप से तब, जब यह साहित्य और सामान्य जीवन में प्रयुक्त होने वाले मुहावरे से इतर, रंगमंच पर अवतरित होती हैं।

रविवार, 24 अप्रैल 2016

अक्कड़-बक्कड़ः कथ्य और स्वरूप में विरल उपन्यास

अक्कड़-बक्कड़ है क्या? औपन्यासिक कृति या कोई बाल-क्रीड़ा? रपटन-भरी भाषा में फिसलती-गिरती ज़िन्दगी की शल्यक्रिया या किसी बेशर्म गप्पी का वायवीय गल्प? यह क्या सचमुच वैसा ही है जैसा कि अस्सी-नब्बे पूरे सौ?’ शैली तो कुछ ऐसी ही है जैसे कोई बच्चा शब्दों से मगन-भाव खेल रहा हो! लय और लोच के सहारे भावात्मक रूप से हल्के हिंडोले पर डोल रहा हो! लेकिन ऐसा है नहीं। पाठ के समय धैर्य और सावधानी ज़रूरी है क्योंकि असावधानी की स्थिति में रपटने, वाग्जाल में उलझने, शब्दों के कीचड़ में लिथड़ने और लक्ष्यार्थ तक पहुँचने में बिल्कुल जलालपुरिए की तरह अंततः विफल रहने की पूरी गुंजाइश है। सावधानी और गंभीरता इसलिए भी कि यह व्यंग्य उपन्यास है और बकौल श्रीलाल शुक्ल व्यंग्य लेखन का सम्बंध सामाजिक स्थिति की मूल्यगत आलोचना से है। तो उपन्यास पढ़ते वक़्त इस सूत्र-वाक्य को दिमाग़ में रखना ज़रूरी है, तभी हम वास्तविक कथ्य और वातावरण तक पहुँच पाएँगे क्योंकि उपन्यास की भाषा में भी रपटन है। यह आपको नंगलों की तरह भटका भी सकती है और आप किसी क्षेत्र-विशेष की मरीचिका में उलझ सकते हैं, कथ्य और वातावरण के भेदाभेद को समझने से चूक सकते हैं।

रविवार, 27 दिसंबर 2015

अधूरे जीवन का पूरा कोलाज

उपन्यास का नाम है- चिरकुट और इत्तेफ़ाक़ देखिए कि शीर्षक को छोड़, उपन्यास में कहीं और ये शब्द इस्तेमाल नहीं किया गया। लिहाजा मन में उठा यह सवाल वाजिब था कि आख़िर क्यों हितेन्द्र पटेल ने अपने उपन्यास का नाम चिरकुट रखा? क्या इसलिए कि वो जिस सांस्कृतिक समाज का अंग रहे हैं, उसमें यह शब्द आमफ़हम है? या कि कथा-नायक अथवा कथा में विन्यस्त घटनाएँ, प्रवृत्तियाँ और जीवन-दशाएँ ऐसी हैं, जो अपनी समग्रता में चिरकुट शब्द के अर्थ एवं अभिप्राय को भाव-गम्य बनाती हैं? जब ये सवाल मेरे मन को मथने लगा तो हमने शब्दकोश की मदद ली। पता चला कि चिरकुट शब्द दरअसल दो शब्दों के बड़े टुकड़ों का योग है। अर्थात चिरना+कुटना=चिरकुट(यहाँ नानियत है)। शाब्दिक अर्थों में फटा-पुराना कपड़ा, चिथड़ा, कपड़े का छोटा सा टुकड़ा। लेकिन मन संतुष्ट नहीं हुआ क्योंकि साहित्य महज शब्द और उसके रूढ़ अर्थों से निर्देशित नहीं होता, बल्कि इसका नियंता, भाव होता है। चिरकुट शब्द से जो भाव ध्वनित होता है, वह उसके शब्दकोशीय अर्थ से साम्य नहीं रखता। ऐसे में चिरकुट शब्द का वास्तविक अर्थ जानने के लिए लोक में जाना होगा और वहाँ से चिरकुटशब्द का वाजिब अर्थ ग्रहण करना होगा। गाँव-मोहल्ले में वैसा व्यक्ति चिरकुट कहलाता है, जो छोटी-छोटी बेवकूफ़ियाँ, चालाकियाँ, होशियारियाँ या साजिशें करता है और ऐसे कृत्यों से उसका कोई ख़ास भला तो होता नहीं, उल्टे वह लोगों की नज़र में आ जाता है। या फिर वैसा व्यक्ति चिरकुट कहलाता है, जो समाज में गरिष्ठ और निम्न अथवा हेय समझे जाने वाले क्रिया-व्यापारों में लिप्त रहता है। कभी-कभार हम व्यक्ति से इतर किसी काम को भी चिरकुट शब्द से अभिहित करते हैं। मसलन- अरे यार! एक चिरकुट से काम के लिए तुम इतने परेशान क्यों हो? ये तो बस यूँ चुटकी बजाते ही हो जाएगा। ख़ैर, इस माथापच्ची के बाद चिरकुट को लेकर मेरी सामान्य जिज्ञासा तो संतुष्ट हो गई है, लेकिन अब भी मेरी कथित बौद्धिक-दृष्टि इस बात को लेकर पशोपेश में है और ज़िद ठाने बैठी है कि उपन्यासकार ने यहाँ चिरकुट शब्द का इस्तेमाल महज इसलिए नहीं किया है कि इसका अर्थ लोग सहज ही लगा लेंगे, बल्कि वह इसके माध्यम से कुछ और ही कहना चाहता है। तो क्या चिरकुट शब्द का निहितार्थ जीवन-जगत से जुड़ी वैसी छोटी-छोटी घटनाएँ और व्यवहार-विचार सरणियाँ हैं, जिनके बग़ैर जीवन संभव नहीं है, फिर भी उनका लेखा रखने की ज़रूरत इतिहास महसूस नहीं करता? मेरे संशय को तब और बल मिलता है, जब रामचन्द्र शुक्ल लिखते हैं कि संसार में मनुष्य-जीवन संबंधी बहुत सी ऐसी-ऐसी बातें नित्य होती रहती हैं, जिनका इतिहास लेखा नहीं रख सकता, पर जो बड़े महत्व की होती हैं। व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन, इन्हीं छोटी-छोटी घटनाओं का जोड़ है। पर बड़े से बड़े इतिहास और बड़े से बड़े जीवन-चरित्र में भी इन घटनाओं का समावेश नहीं हो सकता।(रामचन्द्र शुक्ल, चिन्तामणि-3, प्र.सं. 1983, पृ.सं.102) अपने इसी निबंध(उपन्यास) में वो फिर लिखते हैं कि मानव जीवन के अनेक रूपों का परिचय कराना उपन्यास का काम है। यह उन सूक्ष्म से सूक्ष्म घटनाओं को प्रत्यक्ष करने का यत्न करता है, जिनसे मनुष्य का जीवन बनता है और जो इतिहास आदि की पहुँच के बाहर हैं।(वही, पृ.सं.102) यहीं पर यह राज़ भी फ़ाश होता है कि आख़िर हितेन्द्र पटेल जैसा इतिहासकार अपनी अभिव्यक्ति के लिए साहित्य की सबसे महत्वपूर्ण विधा उपन्यासको क्यों चुनता है? और यही मेरे उस सवाल का भी जवाब है कि आख़िर उपन्यास का शीर्षक चिरकुट क्यों रखा गया?

रविवार, 29 नवंबर 2015

अमरकांतः साधारण भाषा में असाधारण का संधान

20वीं सदी का छठा दशक हिन्दी साहित्य की दृष्टि से एक बड़ी उपलब्धि लेकर आया था। नई कहानी ने न सिर्फ ज़िन्दगी को देखने का नज़रिया बदला, बल्कि कहानी की बनी-बनाई पुरानी लीक भी तोड़ दी। हालांकि तोड़ना की जगह नई दिशा शब्द का इस्तेमाल अधिक सटीक होता। ख़ैर, साठ का दशक बदलावों का दशक था। तेज़ी से उभरता निम्न-मध्यवर्ग, ग्रामीण परिवेश से मुक्ति के लिए छटपटा रहा था। युवाओं के सपने अँगड़ाइयाँ ले रहे थे। शहर का आकर्षण उन्हें अपनी तरफ खींच रहा था। बड़ी तादाद में वे शहरों का रुख़ कर रहे थे। राजनीतिक वातावरण लगातार दूषित होता जा रहा था। सामाजिकता अपना महत्व खोती जा रही थी और नैतिकता की पकड़, व्यक्ति पर कमज़ोर पड़ती जा रही थी। कुंठा और संत्रास के ब्रह्मफांस में उलझी युवा-पीढ़ी मोहभंग की सहज शिकार बन रही थी। कुपथगामी हो रही थी। सामंतवाद का बूढ़ा-प्रेत अब भी लोकतांत्रिक देश की छाती पर तना बैठा था। उसके पैने नाख़ून और नुकीले दाँतों से मानवीयता का हृदय छलनी हो रहा था। गाँधी की टोपीपहन-पहन कर जन-प्रतिनिधि बनने वाले राजनेता चुनाव के बाद जनता को या तो टोपियाँ पहना रहे थे, या उनकी टोपियाँ उछाल रहे थे। अर्थात राजनीति, समाज और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में जब बदलाव(नैतिक अथवा अनैतिक) स्पष्ट नज़र आ रहा था तो कहानी भला कैसे अछूती रहती? शहरी मध्यवर्गीय परिवार महत्वाकांक्षाओं के अतिशय बोझ के कारण चरमरा रहा था। इस टूटन, घुटन और बिखराव की कथा मोहन राकेश, राजेन्द्र यादव और कमलेश्वर लिख रहे थे। प्रगतिशील चेतना के बढ़ते दबावों के बावजूद पुरुष-सत्तात्मक समाज का सामंतवादी प्रेत हार मानने को तैयार नहीं था और निम्न-मध्यवर्ग झूला-नट की तरह दोनों को साधने में अपनी ऊर्जा का बड़ा हिस्सा ख़र्च करने को अभिशप्त था। भारत का साधारण मनुष्य जवाहरलाल नेहरू नहीं था। लिहाजा पंचशील के सिद्धांत जैसे महान उद्देश्य अथवा दर्शन में भी उसकी कोई दिलचस्पी नहीं थी। उसकी तो बेहद छोटी-छोटी समस्याएँ और आकांक्षाएँ थीं। रहने के लिए घर। खाने के लिए अन्न। पहनने के लिए कपड़े। इलाज के लिए अस्पताल। बेरोजगार बेटे के लिए नौकरी और जवान बेटी के लिए योग्य-वर। उसे धर्म अथवा जाति के नाम पर होने वाले अत्याचारों-अनाचारों से मुक्ति और शांति की ज़रूरत थी। व्यवस्था का छलावा और आदर्शों का भुलावा, समस्यापूर्ति के लिए काफ़ी नहीं थे। शिक्षित मध्यवर्ग और बुद्धिजीवियों का ढोंग और भावनात्मक स्तर पर शोषण और स्त्री की परम्परागत छवि को बनाए रखने की साजिश। गाँव और शहर के बीच सेतुबंध के रूप में तेज़ी से आकार ग्रहण करता यह क़स्बाई समाज और क्षेत्र, जटिल जीवन-अनुभूतियों और संबंधों के त्रिविमीय प्रदर्शन का असाधारण रंगमंच बना हुआ था। सभ्यता के इसी अंधेरे प्रेक्षागृह से अमरकांत जीवन का आँखों देखा हाल सुना रहे थे। शिक्षित मध्यवर्ग की मनोदशा, उसके सपने, उसके काइयाँपन और यथार्थ-जीवन की सहज सांकेतिक अभिव्यक्ति का दायित्व अमरकांत ने अपने मज़बूत कंधों पर ले रखा था।

रविवार, 16 अगस्त 2015

मीडिया मंडप में चिकित्सक से मुलाकात

हमारे एक मित्र हैं। पेशे से चिकित्सक हैं। एक दिन बातचीत हो रही थी। बातचीत के दौरान उन्होंने शिकायत की। उनकी शिकायत थी कि पत्रकार बेलगाम हो रहे हैं। मैंने उनका वाक्य सुधारा, 'पत्रकार नहीं मीडिया बेलगाम हो रहा है।' मित्र ने दलील दी, 'दोनों एक ही बात है। मीडिया अपने-आप में कोई ऐक्टिंग अथॉरिटी नहीं है।' मैंने विरोध किया, 'यह कोई तर्क नहीं है।' उसने उदाहरण पेश करते हुए कहा, 'मान लो कार से कोई दुर्घटना होती है तो इसका मतलब यह तो नहीं कि कार को दोषी ठहराया जाए! बल्कि किसी से भी पूछो तो वह यही कहेगा कि ड्राइवर की बदमाशी या लापरवाही के कारण हादसा हुआ। यानी दुर्घटना की स्थिति में कार नहीं ड्राइवर दोषी होता है। इस लिहाज़ से अगर मीडिया बेलगाम है तो साफ है कि मीडियाकर्मी बेलगाम हैं।' मैंने कहा, इसका मतलब आप की निगाह में मीडियाकर्मी ही मीडिया का निर्देशक है?’ मित्र ने मुस्कराते हुए कहा, 'बिल्कुल।' मैंने थोड़ा तुनकने वाले अंदाज़ में कहा, 'जी नहीं। मीडिया कोई कार नहीं है, और न ही कोई मीडियाकर्मी ही ड्राइवर है। यह आपकी निजी सोच है।' मित्र मानने को तैयार नहीं हुए। उन्होंने आरोप लगाया, 'तुम मीडिया में काम कर चुके हो इसलिए अपनी बिरादरी की असलियत छुपाने की कोशिश कर रहे हो।' मुझे बुरा लगा। मैंने विरोध जताया, 'ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। मैं मीडियाकर्मी रहा हूँ इसलिए जानता हूँ कि मीडिया और मीडियाकर्मी दोनों पर्यायवाची नहीं हैं। दोनों में बहुत फ़र्क़ है।' मित्र ने निर्णयात्मक स्वर में कहा, 'क्या तुम इस बात से भी इनकार करोगे कि मीडियाकर्मी ही मीडिया रूपी भवन के निर्माण के लिए ईंटें तैयार करते हैं?' मैंने दृढ़ता का प्रदर्शन किया, 'हाँ, बिल्कुल करूँगा क्योंकि मैं जानता हूँ कि मीडियाकर्मी मीडिया रूपी भवन के लिए ईंटों का निर्माण नहीं करते बल्कि वे स्वयं ईंट के रूप में इस्तेमाल किए जाते हैं।' मित्र ने ज़ोरदार ठहाका लगाया, 'अच्छा मज़ाक है।

मंगलवार, 21 जुलाई 2015

न वो समझे हैं, न समझेंगे मेरी बात

या रब, न वो समझे हैं, न समझेंगे मेरी बात। दे और दिल उनको, जो न दे मुझको ज़ुबाँ और।।अब या तो इस शेर को उसकी तात्पर्य-वृत्ति के अनुकूल समझा जाए और तीखे व्यंग्य की दाद दी जाए। या फिर यूँ हो कि ग़ालिब को इस हेकड़ी के लिए ख़ूब खरीखोटी सुनाई जाए- अमाँ मियाँ ये ग़ालिब भी न, बड़े ख़ब्ती क़िस्म के शायर थे। चले न जाने आँगन टेढ़ा। ख़ुद तो सीधी-सादी बात को बेवजह घुमा-फिरा कर कहते हैं और इल्ज़ाम पाठक पर मँढ़ते हैं। मतलब यह कि जो भी बात समझ में न आए, वो बकवास है। अच्छा है कि ग़ालिब हमारे ज़माने में न हुए, वरना अपना सिर पीट लेते। वैसे ग़ालिब के ज़माने में आज जैसे क़द्रदान भी न हुए, वरना वो दीवान क्या खाकर लिखते! ख़ैर, ग़ालिब का ये शेर हमेशा मेरी ज़ुबान पर कुछ इस अंदाज़ में होता है, जैसे बाँध तोड़ने पर उतारू कोई उफनती हुई नदी। मुश्किल ये कि बार-बार दुहराऊँ तो ख़ब्ती कहे जाने का डर है। और ज़ुबाँ पर काबू रखूँ तो बेचारा दिल रुआँसा हुआ जाता है। दिमाग़ है कि ढाढ़स बँधाने की बजाय दिल को कोंचने में ज़्यादा मज़ा पाता है। कभी-कभी खीझ इतनी ज़्यादा बढ़ जाती है कि सिर के बाल नोंचने लगता हूँ। कई बार तो तन्हाई में ख़ुद को तमाचा भी जड़ चुका हूँ। लेकिन कोई फ़ायदा नहीं! दिल-दिमाग भारतीय लोकतंत्र के दो दलों की तरह बर्ताव करने से परहेज़ बरतने को तैयार ही नहीं होते! दिल और दिमाग की नूरा-कुश्ती थमती ही नहीं! समझौते की तमाम कोशिशें नाकाम। समझ में नहीं आता, क्या करूँ? कई बार सोचा कि दिल-दिमाग के झमेले में जिस्म को ही तकलीफ़ क्यों हो? लेकिन जिस्म ऑथोरिटी  नहीं है। ये पॉवर तो दिमाग के ही पास है। दिल उसी पॉवर में हिस्सेदारी चाहता है। इसलिए बात-बेबात हस्तक्षेप करता रहता है। वैसे दिल की बात भी वाजिब है। जिस भाषा को लोग समझते ही नहीं, उस भाषा में कुछ कहने की ज़रूरत क्या है? लेकिन दिमाग़ है कि ज़िद ठाने बैठा है! कहता है- अभिव्यक्ति के अनुकूल भाषा तो होनी ही चाहिए। जो लोग अभिधा-व्यंजना में फ़र्क़ नहीं कर सकते, उनके लिए हलकान होने की ज़रूरत नहीं है।

शनिवार, 11 जुलाई 2015

मालिकों का बोझ ढोता मीडिया

दो विवाद और चार मीडिया समूह। पहला विवाद इंडियाज़ डॉटर डॉक्यूमेंट्री से जुड़ा है तो दूसरे का रिश्ता वक़्त ने किया क्या हसीं सितम धारावाहिक से है। प्रत्यक्ष रूप से जो प्रदर्शित किया गया, वह यह था कि विवाद का सम्बंध इंडियाज़ डॉटर और वक़्त ने किया क्या हसीं सितम के कंटेंट से है। दोनों ही मामलों में राष्ट्र की छवि और राष्ट्रवाद की आड़ लेकर प्रतिस्पर्धी मीडिया समूहों ने अपने-अपने क्षुद्र हितों का पोषण करने की नापाक़ कोशिश की। नतीज़ा क्या निकला? हम-आप से छुपा नहीं है। टाइम्स और एनडीटीवी समूह के बीच व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा की चरम परिणति केन्द्र सरकार के उस बचकाना फैसले में हुई, जिसकी वैश्विक स्तर पर आलोचना हुई। जिन्हें डॉक्यूमेंट्री में दिलचस्पी नहीं भी हो सकती थी, वैसे लोगों ने भी प्रतिबंध के कारण उत्सुकता के अतिरेक में देख लिया और एनडीटीवी ने तो डॉक्यूमेंट्री के लिए निश्चित प्रसारण समय पर अपना स्क्रीन भी ब्लैक रखा। टाइम्स नाउ पर अर्णब गोस्वामी ने दावा किया कि इंडियाज़ डॉटर वास्तव में भारत की छवि धूमिल करने वाला वृत्तचित्र है, जबकि देश के बहुसंख्यक बुद्धिजीवी तबके की सोच इसके विपरीत थी। जनसत्ता के संपादक ओम थानवी की प्रतिक्रिया थी कि जिस किसी ने बीबीसी की डॉक्युमेंट्री 'इंडियाज़ डॉटर' देख ली है, उसने बड़ी सहजता से इस बलात्कार-विरोधी फिल्म को भारत में प्रतिबंधित करवाने वाली मानसिकता और अभिव्यक्ति का गला घोंटकर दुनिया भर में भारत की नाक कटवाने वाली बुद्धि पर तरस ही खाया होगा। बहरहाल यह एपिसोड अब लगभग ख़त्म हो चुका है और अगर मैं ग़लत नहीं हूँ तो हममें से ज़्यादातर लोग इसको भूल भी चुके हैं!

गुरुवार, 14 मई 2015

मीडिया का माइंड गेम

मेरे मुख़ालिफ़ ने चाल चल दी है/और अब/मेरी चाल के इंतेज़ार में है/मगर मैं कब से/सफेद ख़ानों/सियाह ख़ानों में रक्खे/काले-सफ़ेद मोहरों को देखता हूँ/मैं सोचता हूँ/ये मोहरे क्या हैं…” (जावेद अख़्तर, ये खेल क्या है) उलझन वाजिब है। शतरंज की बिसात को जंग का मैदान समझें या खेल! सफ़ेद-काले मोहरों को लकड़ी का टुकड़ा मानें या हक़ीक़त! अगर यह महज खेल है तो फिर हार-जीत का ज़्यादा महत्व नहीं। और जो हार-जीत अहम है तो फिर खेल को जंग की तरह क्यों न लें? और यह भी कि क्या मोहरे सांकेतिक हैं जो किसी बड़े यथार्थ को रेप्रज़ेन्ट करते हैं? आज के इस उत्तर-आधुनिक युग में जब जंग को खेल की तरह और खेल को जंग की तरह लेने की संस्कृति विकसित हो चुकी है, तो उलझन वाजिब है। 1990 में कुवैत-मुक्ति के लिए प्रारम्भ हुआ खाड़ी युद्ध। सितंबर 2001 में अपहृत विमानों के माध्यम से वर्ल्ड ट्रेड सेंटर और पेंटागन पर कथित अटैक और फिर उसके बाद तालिबानी अफगानिस्तान पर अमेरिकी हमला। 2003 में जैविक हथियारों की आड़ में इराक के विरुद्ध युद्ध और सद्दाम हुसैन को युद्धापराध का दोषी क़रार देकर फांसी की सज़ा। इज़्राइल-फिलिस्तीन के बीच सतत् झड़पें। ये तमाम जंग खेल ही तो थे/हैं। बल्कि खेल से कहीं ज़्यादा रोमांचक, ज़्यादा यथार्थ, बिल्कुल हाइपर-रियल। मुमकिन है, आपको उपरोक्त बातें हँसी-खेल जैसी लगें! लगनी भी चाहिए।

शुक्रवार, 20 मार्च 2015

उपभोक्तावाद की असंसदीय मुहिम

समझ का उम्र से रिश्ता है भी और नहीं भी है। वैसे ही जैसे उम्र और ज़िन्दगी के गुज़रने में फ़र्क़ होता है। हम जिस मुल्क में रहते हैं, वहाँ बड़ी आबादी की सिर्फ़ उम्र गुज़रती है, ज़िन्दगी नहीं। इसके विपरीत एक तबका ऐसा भी है, जिसकी ज़िन्दगी तो गुज़रती है, लेकिन उम्र है कि साठ में भी छब्बीसवें बसंत का मुखौटा चस्पाँ किए इतराती फिरती है। जलने वाले जलते हैं तो जलें, उनकी बला से! अतः उम्र का सम्बंध ज़िन्दगी से है भी और नहीं भी। आदर्श स्थिति तो यही है कि दोनों अन्योन्याश्रित हों! किन्तु ऐसा विरले ही हो पाता है क्योंकि उम्र का सम्बंध प्रकृति से है और ज़िन्दगी का भौतिक संसाधनों, लालसा और आत्मिक उल्लास से। भौतिक कारक अधिक अहमियत रखते हैं। अतः त्याग से आत्मिक उल्लास की प्राप्ति का मार्ग विकट भी है और संदिग्ध भी, क्योंकि लालसा मनुष्य की अनिवार्य दुर्गुण है। कबीर ने सही पहचाना था- माया महा ठगनी हम जानी/तिरगुन फांस लिए कर डोले/बोले मधुरे बानी।

रविवार, 8 मार्च 2015

‘डार्क रीऐलिटी’ के चितेरे हैं मधुर

20वीं सदी के अंतिम दशक में हिन्दुस्तान में जो कुछ घटित हुआ, उसने कम-अज़-कम बौद्धिक जगत में कुछ ऐसे पारिभाषिक शब्द प्रचलित किए, जो अब तक हमारे लिए बिल्कुल अनजान थे। भूमंडलीकरण और उदारीकरण को बतौर उदाहरण प्रस्तुत किया जा सकता है। जिन ग्रामीण बालाओं को बर्फ़ का गोला भी कभी-कभार ही नसीब हो पाता था, उन्हें रूप बदलकर गाँव पहुँचा बॉलीवुड का नायक, कुएँ से कोका कोला निकाल-कर पीने-पिलाने लगा। याराँ दा टशन का वो दौर अब भी जारी है। डीटीएच ने शहरी मध्य-वर्गीय स्त्रियों की ठसक और ऐंठ के साथ ही रुतबे पर भी बुरा असर डाला है। गर्मी की छुट्टियाँ बिताने या तीज-त्यौहार पर गाँव जाने वाली इन विदुषियों का प्रभामंडल छिन्न-भिन्न हो चुका है। अब न तो इनकी पहले-सी आवभगत होती है और न ही कोई सास भी कभी बहू थी की अकथ-कथा सुनने के लिए ख़ुशामदी अंदाज़ में इनके आगे-पीछे ही करती हैं। और तो और दूरदर्शन पर शुक्रवार के दिन आनेवाली फिल्मों का क्रेज़ भी खत्म हो चुका है। मार्शल मैक्लूहान के ग्लोबल विलेज़ का ग्लोबल बेचारा कब-का ग्लोकलद्वारा अपदस्थ किया जा चुका है। फिल्मों का नायक तो पहले ही बदल चुका था, अब तो कथानक भी बदल गया है। कुछ रामगोपाल वर्मा टाईप हो गए हैं तो कुछ ने ख़ुद को कपिल और राजू श्रीवास्तव की श्रेणी में फिट कर लिया है। फिल्मों में भूतिया दौर भले ही ढंग से कभी आ नहीं पाया हो, लेकिन टीवी सोप्स ने बॉलीवुड की इस कमज़ोरी को अपने अथक-परिश्रम से ढंक लिया है। भगवान कृष्ण ने बड़ा होने से मना कर दिया है और अब तो गणेश की भी उम्र नहीं बढ़ती क्योंकि दोनों का बाल-रूप ही बच्चों को अट्रैक्ट करता है। हाँ, एक महादेव हैं, जिन्हें अब तक बच्चा बनने का सौभाग्य नहीं मिला है। हनुमान और मूसकराज जैसे इनके सहयोगियों को भी अच्छा-ख़ासा फुटेज मिलने लगा है। नगरीय सभ्यता के कामकाजी-जीवन और परिवार के विघटन से जो धार्मिक और पौराणिक गैप पैदा हुआ था, उसे टीवी ने बख़ूबी भर दिया है। दिन-रात खट-खटकर बेहाल लोगों की सेहत का ख़्याल रखते हुए धर्म-दर्शन का पुण्य-लाभ भी वाया टीवी अथवा सिनेमा, घर बैठे ही प्राप्त किया जा सकता है।

रविवार, 22 फ़रवरी 2015

भरि-भरि मारै बान

हम जब भोजन बनाते हैं तो ध्यान उसके स्वाद पर ही होता है। चिकित्सक भले पौष्टिकता का आग्रह पालें। सामान्य व्यक्ति के लिए तो स्वाद भोजन की सबसे बड़ी विशेषता है। जिन लोगों को स्वाद में दिलचस्पी नहीं होती, वे वैसे लोग होते हैं जिन्हें किसी रोग अथवा व्याधी ने जकड़ रखा हो! उनके लिए सेहत अधिक अहम होती है। हालांकि स्वाद के प्रति आकर्षण तो वहाँ भी बना ही रहता है। भय भले हाथ पर अंकुश लगा दें, नेत्र और जीभ ललचते ही रहते हैं। मान लीजिए आप किसी के मेहमान हुए! मेज़बान के घर शाही पनीर बना। उसके रंग-सुगंध से ही आपकी क्षुधा का ग्राफ ऊपर चढ़ने लगा। लेकिन आपने पहला कौर मुँह में डाला और निगलने की बजाय उगल दिया। कारण यह कि रसोइया भोजन बनाते समय नमक डालना भूल गया था। नमक की अनुपस्थिति से शाही पनीर के रंग अथवा गंध पर तो फ़र्क़ नहीं पड़ा, लेकिन स्वाद बिगड़ गया। आपके सामने पड़ी प्लेट में वह अब भी उतना ही मनोहारी दिख रहा है। उसकी गंध जो आपके नथूनों तक पहुँच रही है, उसके जादू से अब भी आपके मुँह में पानी भरा है। लेकिन दूसरा कौर मुँह तक लाने की इच्छा नहीं हो रही। क्या ऐसी ही स्थिति तब भी नहीं आती, जब सब्ज़ी में नमक की मात्रा सामान्य से अधिक हो? व्यंग्य के नाम पर लिखे जा रहे अकूत साहित्य पर दृष्टिपात करें तो बहुत हद तक यही स्थिति नज़र आती है। वाक्य-वक्रता के बल पर व्यंग्य तो दूर हास्य भी उत्पन्न नहीं किया जा सकता। फिर भी किया जा रहा है। मंचाश्रयी कवियों का काम तो फिर भी शारीरिक-सांकेतिक पराक्रमों से चल सकता है, किन्तु लेखन के मामले में भाव के बिना साहित्य के भवसागर को पार करना, असम्भव है। यदि साहित्य आस्वाद का विषय है तो पढ़ते समय पाठक को स्वाद तो मिलना ही चाहिए। लेकिन कुछ-एक को छोड़ दें तो व्यंग्य की नैया के ज़्यादातर खेवनहार वाक्य-वक्रता की पतवार ही थामे नज़र आते हैं और व्यंग्य की नैया है कि न इस किनारे आती है, न उस किनारे जाती है, बस शब्दों के बीच भंवर में फंसी चकरघिन्नी की तरह बस गोल-गोल घूमती जाती है। पाठक को कुछ वाक्यों के बाद ही चक्कर आने शुरू होते हैं और फिर मितली से उल्टी तक की प्रक्रिया पूर्ण हो जाती है। इस प्रकार पाठक को आस्वाद के रूप में न तो हास्य की अनुभूति हो पाती है और न ही व्यंग्य का बोध। ऐसी परिस्थिति में शब्दों की मर्यादा खंडित होती है और शिल्पी की छवि भी।

मंगलवार, 17 फ़रवरी 2015

रेत की परतें

बाढ़ का पानी अब उतार पर था। जलमग्न धरती कहीं-कहीं अपना कूबड़ दिखाने लगी थी। छोटी-छोटी मछलियों की छलमलाहट बढ़ गई थी। वही जल-धारा, जो कल तक उन्मादिनी सी हिलोरें मार रही थी, आज सुस्त-सी नज़र आ रही थी। डूबता सूरज भी आज अनासक्त-सा पानी को बस छू-कर चला गया था। उसने डूबने में दिलचस्पी ही नहीं ली। सीमा की यह साध तो पुरानी ही थी, लेकिन आज ही दिल से ज़ुबाँ तक का सफ़र तय कर पाई थी। उसने सरजू की बाँह पर अपनी पकड़ थोड़ी मज़बूत करते हुए कहा- 'क्या हम सुबह फिर यहाँ आ सकते हैं? मैं देखना चाहती हूँ कि डूबी धरती, पानी से उबरने के तुरंत बाद कैसी लगती है?' सरजू ने हाँ में सिर हिलाया और फिर निगाहें पानी के बीच उभरे धरती के कूबड़ों पर टिका दीं। सीमा जैसा उल्लास-मिश्रित विस्मय, सरजू के चेहरे पर नहीं आ पाया था। वहाँ विषाद की एक और गहरी परत जम गई थी। ठीक वैसे ही, जैसे पानी उतरते समय उर्वर धरती पर बालू की एक मोटी अनुपजाऊ परत छोड़ जाता है। सरजू सोच रहा था- 'क्या बेग़म-बादशाहों की तरह ही फ़सलों की क़ब्रें भी आकर्षक हुआ करती हैं, कि लोग देखने को दौड़ पड़ते हैं!?'

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'साक्षी है इतिहास' तथा अन्य चार कविताएँ

1.      साक्षी है इतिहास ( मार्टिन नीमोलर को समर्पित) जानता हूँ आप जहमत नहीं उठाएँगे अपनी सलीब पर टँगे रहने का लुत्फ बेग़...